8 नवंबर को ट्रेलर आया आयुष्मान खुराना और वाणी कपूर की नई फिल्म 'चंडीगढ़ करेआशिक़ी' का. आपने भी शायद देखा हो. नहीं देखा हो तो बता दूं कि इस फिल्म मेंआयुष्मान ने एक जिम ब्रो का रोल किया है. वो नहीं होते, डोले शोले वाले, जो चलतेहैं तो लगता है कि द इनक्रेडिबल हल्क ने फिल्मों से निकलकर इंडिया में ही अवतार लेलिया है. खैर, आयुष्मान काफी जंच रहे हैं. क्लियरली, इस रोल के लिए उन्होंने बहुतमेहनत की है जो उनकी बॉडी में दिख भी रही है. आयुष्मान क्यूट तो बहुत हैं लेकिन येशो उनके बारे में नहीं है. इस फिल्म में वाणी कपूर एक ट्रांसवुमन का रोल कर रहीहैं. ट्रांसवुमन, यानी वो औरत जो पहले बायोलॉजिकली पुरुष कहलाती थी. फिर उसने औरतबनने का फैसला लिया.Everything is fair in AASHIQUI! ♥️ Promising to keep you on your toes with thismind-boggling love story #ChandigarhKareAashiqui, trailer out now. In cinemas on 10th Dec. https://t.co/dvI2zfWd6C@Abhishekapoor@ayushmannk@Vaaniofficial#BhushanKumar@pragyakapoor_— T-Series (@TSeries) November 8, 2021ट्रांसमैन, ट्रांसवुमन या ट्रांसजेंडर मल्लब क्या?हिजड़ा, छक्का, मीठा, नरम. कितनी सहजता से ये शब्द आप इस्तेमाल करते हैं. कोई पुरुषकोई ऐसी हरकत करे जो औरतों वाली मानी जाती है, तो इनमें से कोई एक शब्द बिना सोचेसमझे आपके मुंह से सरक आएगा बाहर.मोटे तौर पर आप ट्रांसमैन या ट्रांसवुमन या ट्रांसजेंडर शब्द को कैसे समझते हैं.ऐसे कि आप सिग्नल पर अपनी गाड़ी में या ऑटो में या कैब में बैठे होंगे और एक व्यक्तिआपसे पैसे मांगने आएगा, जो आपकी नज़र में न औरत दिखता होगा, न पुरुष. या फिर आपकेघर में बच्चा होगा और शगुन लेने के नाम पर गाजे बाजे के साथ एक किन्नरों का ग्रुपआएगा जो आपसे हजारों रुपये ऐंठकर ले जाएगा.मगर क्या आपने कभी सोचा कि स्कूल में आपकी टीचर एक ट्रांसवुमन हो. या आप जिस डॉक्टरको दिखाने जाएं वो ट्रांसजेंडर हो. या दफ्तर में आपका बॉस ट्रांसजेंडर हो. नहींसोचा न. इसलिए नहीं सोचा क्योंकि ट्रांस समुदाय को उनकी सेक्स चॉइस की वजह से हमेशासमाज के लिए एक शाप, एक खतरा, एक बुरा इन्फ्लुएंस माना जाता रहा. और इसी वजह सेट्रांसजेंडर समुदाय भी सिग्नल पर पैसे मांगने वाले दुश्चक्र से बाहर निकलने काप्रयास करता रहा है.फोटो क्रेडिट - 'चंडीगढ़ करे आशिक़ी' ट्रेलरखैर, हम लौटते हैं एक बार फिर फिल्म के ट्रेलर पर. फिल्म में वाणी कपूर यानी मानवीके किरदार को देखकर मनु यानी आयुष्मान को पता ही नहीं पड़ता कि मानवी ट्रांस हो सकतीहै. क्योंकि वो बिलकुल आम महिला सी दिखती है. वो प्रेम में पड़ जाते हैं और फिर शुरूहोती है कॉमेडी. अब ये कॉमेडी क्या ट्रांस इशूज़ को सेंसिटिव तरीके से ट्रीट करेगी?ये फिल्म रिलीज़ होने के बाद ही पता चलेगा. लेकिन हमने खुद कुछ ट्रांसजेंडर्स सेबात की. ताकि हम आपको बता सकें कि उनकी लाइफ असल में कोई कॉमेडी नहीं है. बल्किकॉमेडी से बहुत, बहुत दूर है.लोगों की आपबीती -क्या होता है जब एक लड़का महसूस करता है कि अब वो और लड़का नहीं कहलाना चाहता? कैसामहसूस होता है उस यंग उम्र में. और फिर कितना मुश्किल होता है उस शरीर को छोड़ने काफैसला लेना. ये समझा हमने ज़ोया से. ज़ोया मुंबई में रहती हैं और एक फोटो-जर्नलिस्टहैं. "शरीर एक ही है, आत्मा भी एक ही है. बस भाव अलग है. और यही जो भाव हैं एकपुरुष से महिला में कन्वर्ट होने का, उसे समाज को स्वीकार करने में वक्त लगता है.मैं जब पांच साल की थी, सभी बच्चों की तरह मैं सारे खिलौनों से खेलती थी. लेकिन कुछबच्चे होते हैं न, जो थोड़ा गर्ली खेल खेलते हैं, लड़कियों के साथ ज़्यादा खेलतेहैं. उनका बोलने का लहजा थोड़ा गर्ली हो जाता है. अब ऐसे बच्चों के साथ सबसे बड़ीसमस्या ये है कि वो अपने आप को स्वीकार नहीं कर पाते. कभी 11 साल की उम्र में करपाते हैं, कभी 15 और कभी तो 20 के पार.मुझे भी बहुत दिक्कत हुई अपने सच को स्वीकारने में. मुझे मेरी उम्र के लड़के बहुतचिढ़ाते थे, बुली करते थे. उस वक्त मेरी बड़ी बहन सबसे बड़ी स्पोर्ट रही. वो मेरेलिए उनसे लड़ती थी. फिर 11 साल की उम्र में मैंने ये स्वीकार किया कि मैं लड़कों केप्रति ज़्यादा आकर्षित हूं. मुझे मेकअप करना अच्छा लगता है." ट्रांसवुमन बनने केप्रोसेस में सेक्स री-असाइनमेंट सर्जरी से गुजरना पड़ता है. सेक्स चेंज का येप्रोसेस कैसे अनुभव लेकर आता है, ये भी समझिए ट्रांसवुमन सोनाली से.. सबसे पहले तोहम ये कहना चाहते हैं कि हम किसी गलत शरीर में नहीं फंसे थे. हम एक गलत समाज मेंफंसे हैं, जो अंग्रेज़ों ने हम पर थोपा था. मेरे अंदर से हमेशा हमें लगता था कि हमएक औरत हैं और एक औरत बनना चाहते हैं. तो जैसे कहते हैं न जो ईश्वर नहीं कर सकता,डॉक्टर कर सकता है. फिर हमने जेंडर री-असाइनमेंट सर्जरी करवाने का फैसला किया.हम जब लड़कों के बीच जाते थे या लड़कियों के बीच जाते थे, तो हमारे साथ भेदभाव होताथा. फिर जैसे जैसे हम बड़े हुए, हमें समझ आया है कि हम अलग हैं. समाज ने हमेशा हमेंबताया था कि तुम लड़की नहीं हो, लड़का हो. लेकिन हमें हमेशा लगता था कि हम लड़कीहैं.सर्जरी के समय न समाज सपोर्ट करता है, न परिवार. फिर बहुत सारे ट्रांसजेंडर, ख़ासकर ट्रांसवुमन, किसी किसी तरह पैसे जुटाती हैं. भीख मांगती हैं, सेक्स वर्क करतीहैं. ट्रांसपरसन होने के चलते और किस तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है, ये भीहमें ज़ोया ने बताया. "परिवार का बिलकुल सपोर्ट नहीं मिलता. ज़्यादातर,ट्रांसजेंडर्स को घर से निकाल दिया जाता है. परिवार वालों को हमारी आइडेंटिटी कीवजह से शर्मिंदगी महसूस होती है. इस वजह से ट्रांसजेंडर्स को न प्रॉपर एजुकेशनमिलती है, न माहौल. परिवार का अपनापन भी नहीं मिलता, जैसे परिवार के अन्य बच्चों कोमिलता है.अब जैसे हम कहीं रह रहे हैं या कहीं गए और वहां एक कॉमन टॉयलेट है. अब हम अपने आपको पूरी तरह से वुमन ही रिकग्नाइज़ करते हैं, स्वाभाविक है कि हम फीमेल टॉयलेट मेंजाएंगे. लेकिन अगर कोई औरत बाहर आ कर खटखटाए और हम बोल दें कि हम अंदर हैं, तोहमारी बोल्ड आवाज़ की वजह से वो भड़क जाती है.अब जैसे हम किसी पब्लिक प्लेस पर जाते हैं, किसी रेस्त्रां में जाते हैं तो हमेंस्वीकार नहीं किया जाता. गेट से ही निकाल दिया जाता है. लोगों की नज़र में आज भीयही है कि ट्रांस केवल नाच गाना करते हैं, ट्रैफिक सिग्नल पर पैसे मांगने जाते हैं.आखिर, हम भी इंसान है. हमारी भी इच्छाएं हैं. हमने भी मेहनत कर के पैसे कमाए हैं.हमें भी सामान्य तौर पर देखा जाना चाहिए." तो उम्मीद है कि म्याऊं का ये एपिसोडआपके लिए कुछ नॉलेज लेकर आया होगा. कुछ पॉज़िटिव महसूस करवा पाया होगा. और आपकोट्रांस समुदाय के प्रति कुछ और सेंसिटिव बना पाया होगा. तो इस फिल्म का ट्रेलरदेखकर अपनी राय दीजिये. और ट्रांस पर्सन्स के लिए हम सोशल और लीगल स्तर पर क्याबदलाव ला सकते हैं, ये भी सुझाइए. हमें आपके रिस्पॉन्स का इंतजार रहेगा.