चेस के इतिहास में नाम दर्ज करने वाली चार लड़कियां कौन हैं?
चेस ओलंपियाड में भारत की महिला टीम ने पहली बार कोई मेडल जीता है.

तमिलनाडु का मामल्लपुरम. यहां शतरंज का ओलिंपिक कहे जाने वाले चेस ओलिंपियाड का आयोजन 28 जुलाई से 10 अगस्त तक हुआ. पहली बार इसकी मेज़बानी भारत ने की. ख़ास बात ये रही कि भारत की महिला चेस टीम ने पहली बार चेस ओलंपियाड में कोई मेडल जीता है. 44वें Chess Olympiad में भारतीय महिला टीम ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता है. इस टीम में कोनेरू हम्पी, आर वैशाली, तान्या सचदेव और भक्ति कुलकर्णी शामिल थे. चलिए इनके बारे में थोड़ा जानते हैं.
कोनेरू हम्पीविजयवाड़ा की रहने वाली कोनेरू हम्पी महज़ 15 की उम्र में ग्रैंडमास्टर बनीं. इतनी कम उम्र में ये खिताब हासिल करना अपने आप में एक रिकॉर्ड था. इस रिकॉर्ड को 2008 में चीन की हाउ यीफैन ने तोड़ा. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वो सालों तक इसलिए जीतती रही क्योंकि उनमें आत्मविश्वास है. उन्होंने ये भी कहा कि महिला खिलाड़ी को कभी भी अपना खेल छोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.
आर वैशालीआर वैशाली जब 14 साल की थीं तब उन्होंने नेशनल विमैन चैलेंजर्स का खिताब जीता था. आर वैशाली के परिवार में शतरंज खेलने का माहौल शुरू से ही रहा. उनका छोटा भाई आर प्रज्ञानंद दुनिया के सबसे कम उम्र के ग्रैंड मास्टर्स में से एक है. वैशाली अंडर-11 और अंडर-13 नैशनल चैंपियनशिप्स भी जीत चुकी हैं.
तान्या का जन्म दिल्ली में हुआ. तान्या की मां अंजू खुद भी शतरंज खिलाड़ी रही हैं. बचपन से ही तान्या की भी अपनी मां की ही तरह शतरंज में दिलचस्पी रही है. तान्या जब आठ साल की थीं तब उन्होंने अपना पहला अंतराष्ट्रीय खिताब जीता था.
भक्ति कुलकर्णीभक्ति कुलकर्णी गोवा की रहने वाली हैं. भक्ति बचपन से ही चेस खेल रही हैं. भक्ति सिर्फ ग्यारह साल की थी जब उन्होनें पुरूष वर्ग की सीनियर चैंपियनशिप जीती थी.
चेस ओलंपियाड में युद्ध ग्रस्त यूक्रेन की महिला टीम ने गोल्ड मेडल जीता है. युद्ध के बीच यहां आकर खेलने और जीतने के चलते यूक्रेन की टीम भरसक तारीफ हो रही है. कई लोग इसे एक उम्मीद की तरह देख रहे हैं.
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