इंस्टाग्राम फोटो को 'अश्लील' बता यूनिवर्सिटी ने जिस महिला प्रोफेसर को निकाला, उनकी पूरी कहानी
'मेरी छवि यौनिकता की आग में जलने वाली महिला के रूप में पेश की गई.. मेरी पहचान को घटाकर एक सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर पेश किया गया.'

कोलकाता की सेंट ज़ेवियर्स यूनिवर्सिटी (St. Xaviers University) की एक 'पूर्व' असिस्टेंट प्रोफेसर हाल में ख़बरों में आ गईं. 'पूर्व क्यों?' और 'क्या ख़बर?', दोनों आपस में जुड़े हुए हैं. दरअसल, सेंट ज़ेवियर्स की इस महिला प्रोफ़ेसर ने आरोप लगाया था कि उनके इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई एक फोटो के चलते उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. साथ ही संस्थान ने विश्वविद्यालय की छवि को नुक़सान पहुंचाने का आरोप लगाकर उनसे 99 करोड़ रुपये का मुआवजा भी मांगा था.
मामला मोरल पुलिसिंग का है. बैचलर डिग्री के एक छात्र के पिता ने यूनिवर्सिटी में शिकायत दी थी कि उनका बेटा अपनी प्रोफेसर की तस्वीरें देख रहा था. पिता ने तस्वीरों को ‘अश्लील’ बताया और अपनी शिकायत में लिखा था कि एक 18 साल के छात्र के लिए ये कतई अनुचित है कि वो अपने प्रोफ़ेसर को 'कम कपड़े पहने हुए देखे'. इसके बाद कथित तौर पर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफ़ेसर को समन जारी किया और उनसे इस्तीफ़ा देने के लिए कहा.
प्रोफ़ेसर की आपबीती सुन दंग हो जाएंगेमामला सामने आने के बाद से ही प्रोफ़ेसर लगातार अपना वर्ज़न, अपनी टिप्पणियां पब्लिक डोमेन में रख रही हैं. अपने पक्ष में तर्क दिए, कि एक तो वो तस्वीरें तब की हैं जब उन्होंने यूनिवर्सिटी जॉइन भी नहीं की थी. और, दूसरे ये कि उनका इंस्टाग्राम अकाउंट प्राइवेट है. यानी जब तक कोई उन्हें रिक्वेस्ट न भेजे, कोई उनकी फोटोज़ देख नहीं सकता. हालांकि, यूनिवर्सिटी ने तर्क को कोई ख़ास तरजीह नहीं दी.
18 अगस्त को इसी महिला ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक ओपीनियन पीस लिखा है. टाइटल है, 'My witch trial in Kolkata'. इस पीस में उन्होंने शुरू से लेकर अभी तक की सारी घटनाओं के बारे में बताया है. जो उनका वर्ज़न है.
उन्होंने अपनी एजुकेशन और नौकरी लगने तक की यात्रा के बारे में बताया. कोलकाता के ही सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से अंग्रेज़ी में BA किया. फिर जादवपुर यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में MA. फिर उन्हें यूरोपीय यूनियन के एक प्रोग्राम के तहत फेलोशिप मिल गई, तो 2015 में वो Ph. D के लिए भारत से बाहर चली गईं. 2020 में अपनी डॉक्टरेट पूरी की और कोरोना पैंडेमिक के दौरान ही वापस आईं. कोरोना की वजह से हालात मुश्किल थे. पर्सनली और प्रोफ़ेशनली, दोनों तरह से. एक तरफ़ अपने आस-पास के लोगों के जाने का दुख था. दूसरी ओर, ज़्यादातर शैक्षणिक संस्थानों में भर्ती रोक दी गई थी. उन्होंने लिखा है,
"कुछ महीनों के संघर्ष के बाद, कोलकाता के एक निजी विश्वविद्यालय में कॉन्ट्रैक्चुअल बेसिस पर नौकरी मिली. विज़िटिंग लेक्चरर के तौर पर. और कुछ बेहतर नहीं था, तो वहीं जॉइन कर लिया. फिर मई 2021 के आसपास, मुझे हैदराबाद में एक यूनिवर्सिटी से नौकरी का प्रस्ताव मिला. पर्मानेंट पोस्ट थी, लेकिन ये नौकरी लेना मतलब कोलकाता छोड़ना. और, डेल्टा वायरस की आमद और पापा की मेडिकल कंडीशन की वजह से कोलकाता छोड़ना मुश्किल था. तभी मुझे (कोलकाता की) सेंट ज़ेवियर्स यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की पोज़िशन का इश्तेहार दिखा."
जून 2021 में अप्लाई किया और कुछ ही समय बाद इंटरव्यू हो गया. इंटरव्यू के तीन ही दिन बाद उन्हें सेलेक्ट कर लिया गया. उन्होंने लिखा कि ये उनके लिए बहुत अच्छा मौक़ा था. फुल-टाइम नौकरी और माता-पिता के साथ रहना.
9 अगस्त, 2021 को सेंट ज़ेवियर्स यूनिवर्सिटी के अंग्रेज़ी विभाग में उन्होंने बतौर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जॉइन किया. वो ख़ुश थीं. वो वो कर रही थीं, जो हमेशा से चाहती थीं. लिखा कि छात्र ईमानदार और तेज़-तर्रार थे और वो डे-टु-डे क्लासेज़ को इंजॉय कर रही थीं.
लेकिन फिर आया वो दिन..7 अक्टूबर, 2021. वीसी के साथ मीटिंग के बहाने से उन्हें यूनिवर्सिटी बुलाया गया. मीटिंग के बारे में फोन पर उन्हें कुछ भी नहीं बताया गया था. उन्होंने बताया कि वो मीटिंग, मीटिंग के नाम पर 'विच ट्रायल' का एक मॉडर्न वर्ज़न जैसी थी. उन्हें उनकी इंस्टाग्राम फोटोज़ के लिए इंटेरोगेट किया गया, स्लट शेम किया गया. उनकी कुछ इंस्टाग्राम फोटोज़, जो प्रशासन के एजेंडे को सूट करती थीं, उनका प्रिंट-आउट निकाला गया और उनके चरित्र पर सवाल उठाए.
"उस शिकायत ने मेरे आचरण पर सवाल उठाए. मेरी छवि यौनिकता की आग में जलने वाली महिला के रूप में पेश की गई. इसमें मेरे शरीर पर मेरे अधिकार पर सवाल उठाए गए और एक मेरी पहचान को घटाकर एक सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर पेश किया गया. जिसके चलते पितृसत्ता की नैतिकता मुझ पर थोपी गई. अगर आपको लग रहा है कि शिकायत अजीब थी, तो यूनिवर्सिटी का ऐक्शन कल्पना से भी परे था.
कुछ चुनिंदा लोगों के साथ अपनी तस्वीरें शेयर करने के लिए मुझे एक घंटे तक नैतिकता का हवाला देकर परेशान किया गया. इतना ही नहीं, मुझे अपना इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया. और, इस पूरे मामले में पांच महिलाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने मुझे वाक़ई अपमानित किया है, दर्द पहुंचाया है. मुझे धमकी भी दी गई कि अगर मैंने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा नहीं लिखा, तो मेरे ख़िलाफ़ एक आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा."
'शर्म, डर और घृणा'. बीते 10 महीनों को वो इन तीन लफ़्ज़ों से ही डिस्क्राइब करती हैं. इस प्रकरण के बाद कई दिनों तक, न वो ठीक से सोईं, न ठीक से खाना खाया. उन्होंने लिखा कि तनाव इतना असहनीय था कि उनकी इम्यूनिटी कमज़ोर हो गई और उन्होंने दूसरी बार कोविड हो गया. मां-पिता का ध्यान उनके ही जिम्मे था और इस प्रसंग का उन पर भी बुरा असर पड़ा. उन्होंने लिखा,
"मैं ये बातें सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं लिख रही हूं. मैं ये बताने के लिए लिख रही हूं कि अधिकारियों के मनमाने फैसले, किस तरह से किसी को आहत करते हैं, उन्हें इसका अंदाज़ा ही नहीं. बहुत लोगों ने मुझसे पूछा कि उनके निकालने के पहले ही मैं क्यों नहीं निकल गई? तो मैं उन लोगों से पूछती हूं, क्या आप अपने आप को मेरी स्थिति में रख सकते हैं? क्या आपको लगता है मेरे लिए एक फ़ुल-टाइम पद ठुकराना आसान था? लेकिन क्या आप ऐसी जगह पर काम कर सकते हैं, जहां प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जाता है? जहां सबसे ऊंचे पद पर बैठे लोग खुली धमकियां देते हैं? जहां एक भी सहयोगी ने मेरे लिए स्टैंड नहीं लिया?"
प्रोफ़ेसर ने बताया कि पिछले दस महीनों से उनका जीवन एक बुरे सपने के जैसा हो गया है. हालांकि, उन्होंने ये भी लिखा कि इस सब के बीच, एक चीज़ थी जो नहीं बदली, न्याय पाने की इच्छा.
"इस पूरे कोलाहल के दौरान मैंने कभी भी ख़ुद पर और अपनी सच्चाई पर सवाल नहीं उठाया. हालांकि मैं लोगों की व्यक्तिगत राय का पूरा सम्मान करती हूं. एक इंसान अपने निजी जीवन में ख़ुद को कैसे रखता है, क्या कपड़े पहनता है, शिकायत करने वाले की इस पर भी राय हो सकती है. हालांकि, ये सही नहीं है, लेकिन मुझे इससे भी कोई दिक़्क़त नहीं. ये मेरा अटल विश्वास है की एक व्यक्ति की नैतिकता, देश के कानून से ऊपर नहीं हो सकती.
भारत के नागरिक और एक वयस्क के रूप में मेरे पास कुछ अधिकार हैं, जो मुझसे कोई नहीं छीन सकता. अपनी मर्जी के कपड़े पहनने का अधिकार. और, जो मैंने पहना है, उसकी तस्वीर खींचकर दुनिया को दिखाना, मेरा संवैधानिक हक़ है.
मेरा मानना है कि मेरे काम मेरे लिए बोलेगा, न कि ये कि मैं कौन से कपड़े पहन रही हूं. पूरा बवाल मेरी स्विमसूट वाली तस्वीरों पर हुआ, लेकिन इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मैंने स्विमसूट पहना था या साड़ी. कपड़े नैतिकता के टैग के साथ नहीं आते. न उन्हें पहनने वाले के मूल्यों के बारे में बताते हैं. मैं अपनी शारीरिक और नारीवादी एजेंसी के लिए लड़ रही हूं, कि जो मेरे साथ हुआ वो किसी और के साथ न हो."
हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनकी कहानी को इतना अटेंशन मिलेगा. वो कहती हैं कि वो अपनी स्वायत्तता, अपने अधिकार और अपनी गरिमा के लिए ये लड़ाई जारी रखेंगी. महिला ने यूनिवर्सिटी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कलकत्ता हाई कोर्ट में केस करने का फ़ैसला किया है.
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