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CAA प्रोटेस्ट के बाद गिरफ्तार हुई थीं पिंजरा तोड़ एक्टिविस्ट नताशा नरवाल, क्यों नहीं मिली बेल?

UAPA के तहत गिरफ्तारी हुई थी.

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29 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 29 जनवरी 2021, 05:32 PM IST)
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नताशा नरवाल Pinjara Tod की सदस्य हैं. Pinjara Tod दिल्ली के हॉस्टल और पीजी में लड़कियों के ऊपर लगने वाले प्रतिबंध को कम करने की दिशा में काम करता है.
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पिछले साल की बात है. फरवरी का महीना चल रहा था. देश के कई हिस्सों में खासतौर पर राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन हो रहे थे. CAA-NRC के विरोध और समर्थन, दोनों में. CAA यानी नागरिकता संशोधन एक्ट और NRC माने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स. फरवरी के आखिरी हफ्ते के बात है. दोनों तरफ के प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा हुई, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए और कई लोग घायल हुए.
इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की. मार्च में कोरोना की वजह से देशभर में लॉकडाउन लग गया और तभी पुलिस ने नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में हिंसा भड़काने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. इसी क्रम में मई में पुलिस पहुंची नताशा नरवाल के पास. 23 मई को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. नताशा JNU की स्टूडेंट हैं और 'पिंजरा तोड़' ग्रुप की मेंबर हैं. ये महिलाओं का वो ग्रुप है, जो दिल्ली के हॉस्टल और पीजी में लड़कियों के ऊपर लगने वाले प्रतिबंध को कम करने की दिशा में काम करता है. साल 2015 में ये ग्रुप बना था.
'इंडिया टुडे' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिंजरा तोड़ ग्रुप पर आरोप लगा कि उन्होंने 22-23 फरवरी के बीच नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के ज़ाफराबाद मेट्रो स्टेशन में करीब 500 प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा किया था, जिनमें से ज्यादातर औरतें थीं. धरना दिया गया था, CAA-NRC के खिलाफ. और अगले दिन यानी 24 फरवरी को इस इलाके में हिंसा हो गई. जमानत खारिज करते हुए कोर्ट ने क्या कहा? इस हिंसा की कथित साजिश रचने के आरोप में ही नताशा को गिरफ्तार किया गया. उनके साथ पिंजरा तोड़ की एक और सदस्य देवांगना कलीता को भी गिरफ्तार किया गया था. पहले IPC की धारा 186 और 353 के तहत गिरफ्तारी हुई थी, जिसमें इन्हें बेल भी मिल गई थी, लेकिन नताशा बेल पर रिहा होकर घर लौट पातीं, उसके पहले UAPA के तहत उनके खिलाफ केस दर्ज हो गया. और 30 मई को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उसके बाद से ही नताशा जेल में बंद हैं. देवांगना को ज़मानत मिल गई है, लेकिन नताशा को नहीं मिली. 28 जनवरी को एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत ने इस मामले की सुनवाई की. और ज़मानत याचिका खारिज कर दी. 'बार एंड बेंच' के मुताबिक, कोर्ट ने कहा,
"यहां कई सारे तर्कसंगत आधार हैं, प्राइमा-फेसी ये लगता है कि नताशा नरवाल के ऊपर लगे आरोप सही हैं. इसलिए UAPA की धारा 43डी यहां लागू होती है. और इस मामले में नताशा की मौजूदा याचिका को खारिज किया जाता है."
दिल्ली पुलिस की तरफ से चार्जशीट फाइल करने के बाद नताशा की ये पहली बेल याचिका थी. जज अमिताभ रावत ने कहा कि जब मामला इतनी बड़ी साजिश से जुड़ा हुआ होता है, तो वीडियो सबूत होना ज्यादा अहम नहीं होता, क्योंकि सामान्य तौर पर इस तरह की साजिश गुप्त तरीके से ही रची जाती है, और ऐसे मामलों में वीडियो का न होना संदेह की नहीं, ज़ाहिर बात है. खैर, सीधे तौर पर मामला यही है कि UAPA के तहत हुई गिरफ्तारी में नताशा को ज़मानत नहीं दी गई है. क्या होता है UAPA, ये जानने के लिए हमने बात की वकील अन्वेश से.
वकील अन्वेश क्राइम से जुड़े कई मामले लड़ चुके हैं. उन्होंने बताया कि UAPA आतंकवाद जैसी गतिविधियों के खिलाफ कड़ा एक्शन लेने के लिए बनाया गया है.
वकील अन्वेश क्राइम से जुड़े कई मामले लड़ चुके हैं. उन्होंने बताया कि UAPA आतंकवाद जैसी गतिविधियों के खिलाफ कड़ा एक्शन लेने के लिए बनाया गया है.

अन्वेश क्राइम से जुड़े कई मामले लड़ चुके हैं. उन्होंने बताया कि टेरर जैसी गतिविधियों के खिलाफ कड़ा एक्शन लेने के लिए इसे बनाया गया था. उन्होंने कहा,
"देश की संप्रभुता की बात आती है या कोई आतंकी गतिविधी होती है, जैसे 26/11 को जो हुआ, उसके बाद डिमांड थी पब्लिक की, ये ज़रूरत थी कि कठोर प्रावधान बनाए जाएं. जैसे कसाब को दोषी करार दिया गया, फांसी की सज़ा सुनाई गई और फांसी दे भी दी गई. बेसिकली ये  कानून इसलिए बनाया गया है कि देश में जो शांति और कानून व्यवस्था है, उसमें दिक्कत न आए, कोई आतंकी गतिविधि न हो. गैर-कानूनी गतिविधि न हो. उन सब चीज़ों में ये प्रावधान लगता है."
UAPA के तहत गिरफ्तार हुए आरोपी को ज़मानत भी बहुत मुश्किल से मिलती है. ऐसा क्यों, इसका जवाब भी वकील अन्वेश ने हमें दिया. उन्होंने कहा-
"इस एक्ट का 43डी बेल को कर्टेल (कम करना) है. जैसे 43डी में लिखा है कि 438 के तहत अग्रिम ज़मानत नहीं ले सकते. इसी तरह से रेगुलर बेल इस एक्ट में प्रावधान तो है, लेकिन बिना प्रोसिक्यूटर को सुने बेल नहीं दिया जाएगा. लेकिन प्राइमा-फेसी आप इस ओपिनियन पर आते हो, या ये ओपिनियन कोर्ट बनाती है कि जिस आदमी के खिलाफ ये धाराएं लगी हैं, वो प्राइमा-फेसी सही है, तो बेल नहीं मिलेगी. इस केस में भी यही हुआ."
नताशा JNU में PhD की स्टूडेंट हैं. वो लगातार अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज कर रही हैं. खैर, मामले में आगे क्या होगा, ये कोर्ट ही बता सकता है.

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