आगरा-झांसी पुलिस ने 20 दिन में ऐसा कारनामा किया कि तारीफ़ कम पड़ जाएगी
100 बच्चों की जान जोखिम में थी.
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Operation Muskan के तहत इस अभियान को अंजाम देने के लिए उन पुलिस कर्मचारियों को चुना गया, जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के लिए समर्पित थे. इसके लिए उनका इंटरव्यू लिया गया.
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उत्तर प्रदेश का वृन्दावन. यहां के प्रेम मंदिर के पास का सुनरख इलाका. एक मां की आंखों में खुशी के आंसू हैं. लगता है कि उसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी नसीब हुई है. वह मां अपने सामने खड़ी पुलिस टीम का बार-बार शुक्रियादा कर रही है. उस टीम का, जिसने दो साल से गायब उसके बच्चे को वापस घर पहुंचा दिया है. बच्चे का नाम सचिन है.
पुलिस टीम को सचिन फिरोजाबाद के बालगृह में मिला था. टीम ने जब उससे पूछताछ की तो उसने अपना पता वृन्दावन बताया. परेशानी यह थी कि इतने बड़े वृन्दावन में सचिन का घर कैसे खोजा जाए! टीम सचिन को अपने साथ ले गई. सैंकड़ों लोगों से पूछताछ के बाद तीसरे दिन सचिन के घर का पता चला.
यह काम पुलिस की जिस टीम ने किया वो उत्तर प्रदेश के आगरा और झांसी जिले की है. इसमें जीआरपी और सामान्य थानों के पुलिसकर्मी शामिल हैं. ऐसी और भी टीम हैं. इन टीमों ने पिछले 20 दिन में 100 से अधिक लापता बच्चों को उनके परिवार से मिलाया है. यह काम केंद्रीय गृह मंत्रालय की मुहिम 'ऑपरेशन मुस्कान' के तहत किया जा रहा है. क्या है यह पूरा अभियान? इस संबंध में हमने आगरा जीआरपी के एसपी मोहम्मद मुश्ताक से बात की. उन्होंने बताया,

एक रेलवे स्टेशन से बच्चों से जानकारी लेता उत्तर प्रदेश पुलिस का कर्मचारी.
पुलिस टीम को इस अभियान को अंजाम देने में काफी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा. कभी बच्चों को अपना घर ही नहीं याद था, तो कभी सबकुछ होने के बाद स्थानीय थानों का सहयोग मिलने में अड़चनें आईं.
गुमशुदा बच्चों का पता लगाने के लिए पुलिस टीमों ने बस स्टैंड से लेकर एनजीओ और शेल्टर होम, सबसे संपर्क किया.
अभी यह अभियान छोटे शहरों में ही चलाया गया है. इन शहरों में सफलता मिलने के बाद इसे दिल्ली, मुंबई, गुड़गांव, गाजियाबाद, भोपाल, जैसे बड़े शहरों में भी चलाने की तैयारी है.
एसपी मोहम्मद मुश्ताक ने बताया कि अभियान के पहले चरण में आगरा, मथुरा, एटा, हाथरस, कासगंज, फिरोजाबाद, अलीगढ़, मैनपुरी, इटावा, फर्रुखाबाद, बांदा, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, कानपुर, झांसी, महोबा और चित्रकूट में टीमों को भेजा गया.
इस अभियान के लिए पुलिस टीम ने टेक्नॉलजी से भी बहुत मदद ली. गूगल मैप से लेकर सी-प्लान जैसी एप्लिकेशन टीम के बहुत काम आई. बंद हो चुके नंबरों को सर्विलांस पर लेकर भी टीम ने बच्चों के माता-पिता का पता लगाया. कुछ प्रमुख मामले ऊपर हम आपको सचिन की कहानी बता ही चुके हैं. अब ऐसी ही कुछ कहानियां और जान लीजिए.
पुलिस टीम ने 9 साल के गणेश को डेढ़ साल बाद उसके परिवार से मिलाया. गणेश मथुरा के एक शेल्टर होम में रह रहा था. उसे केवल अपने गांव का नाम 'चाचली' याद था. पुलिस टीम ने गूगल की मदद से उसके लोकल थाने की जानकारी हासिल की. वहां कॉन्टैक्ट कर गणेश के परिजनों के बारे में जानकारी हासिल की गई. जानकारी सही पाए जाने पर जब पुलिस टीम गणेश को उसके माता पिता के सामने ले गई, तो माता-पिता अपने बच्चे से लिपटकर रोने लगे. माता पिता ने बताया कि उन्होंने गणेश से मिलने की उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी.
इसी तरह पुलिस टीम को मथुरा में ही 13 साल का अजय भी मिला. उसने अपना पता उदल गुड़ी, असम बताया. टीम ने लोकल थाने से संपर्क करके उसके माता पिता की जानकारी ली. बाद में बच्चे को उसके घर छोड़ दिया गया. माता-पिता बहुत खुश हुए. उनका बच्चा एक साल बाद उन्हें मिला.
13 साल के ही विशाल को फरीदाबाद से उसके घर गोरागांव पहुंचाया गया. वह भी एक साल बाद अपने परिवार से मिला. एक सफर के दौरान विशाल अपने पिता से बिछड़ गया था.
बड़े शहरों में खो गए बच्चों को भी उनके परिवार से मिलाया गया. 9 साल के राहुल सिंह को पुलिस टीम ने मानखुर्द चाइल्ड होम, मुंबई से वाराणसी पहुंचाया. टीम उसको वाराणसी लेकर आई और उसकी बताई गई बस्ती में पूछताछ की गई. जल्द ही उसके माता-पिता का पता चल गया. सात महीने बाद अपने बच्चे को वापस पाकर दोनों बहुत खुश हुए.
इसी तरह 6 महीने से लापता कान्हा फिरोजाबाद के एक चाइल्ड होम में रह रहा था. पूछताछ में उसने अपना पता एत्मादपुर बताया. उसे अपने गली और मोहल्ले का नाम याद नहीं था. टीम कान्हा को लेकर एत्मादपुर गई. वहां पूछताछ करने के बाद उसके मम्मी-पापा को खोज लिया गया. जब कान्हा की मम्मी ने अपने इकलौते बेटे को अपनी आंखों के सामने देखा, तो वे उससे लिपटकर जोर-जोर से रोने लगीं.

लापता बच्चे को उसके मां-बाप से मिलाने के बाद पुलिस टीम.
सौरभ को भी फिरोजाबाद से फर्रुखाबाद पहुंचाया गया. उसे अपने माता-पिता का नाम याद नहीं था. हालांकि, अपने पापा का फोन नंबर उसे जरूर याद था. पुलिस टीम ने जब उस नंबर पर फोन मिलाया, तो वह स्विच ऑफ था. फिर सर्विलांस पर डालकर पिता का नाम और घर का पता खोजा गया. सी-प्लान ऐप से उस इलाके में रहने वाले दूसरे लोगों की जानकारी भी हासिल की गई. पता चला कि सौरभ सात महीने पहले लापता हो गया था. बाद में पुलिस सौरभ को उसके घर ले गई.
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि पुलिस टीम ने उन बच्चों को भी उनके घर पहुंचाया, जिनकी रिपोर्ट पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज कराई गई थी. ऐसे मामलों में 14 साल की एक बच्ची को ढाई साल के बाद बांदा और 17 साल की एक किशोरी को पांच महीने के बाद झांसी पहुंचाया गया.
टीम को फरीदाबाद रेलवे स्टेशन पर टहलती हुई एक किशोरी मिली. उसने अपना नाम प्रियंका और उम्र 16 वर्ष बताई. उसने बताया कि वह अपने घर का पता भूल गई है. पुलिस टीम प्रियंका को लेकर फरीदाबाद के सेक्टर 78 ले गई. जहां कई घंटों की पूछताछ के बाद उसके माता पिता को खोज लिया गया. प्रियंका को ठीक-ठाक पाकर उसके माता पिता ने चैन की सांस ली.
इसी तरह पुलिस और जीआरपी ने 100 बच्चों को उनके परिवार से वापस मिलवाया है. वाकई में इस कदम के लिए पुलिस की जितनी तारीफ की जाए वो कम है.
पुलिस टीम को सचिन फिरोजाबाद के बालगृह में मिला था. टीम ने जब उससे पूछताछ की तो उसने अपना पता वृन्दावन बताया. परेशानी यह थी कि इतने बड़े वृन्दावन में सचिन का घर कैसे खोजा जाए! टीम सचिन को अपने साथ ले गई. सैंकड़ों लोगों से पूछताछ के बाद तीसरे दिन सचिन के घर का पता चला.
यह काम पुलिस की जिस टीम ने किया वो उत्तर प्रदेश के आगरा और झांसी जिले की है. इसमें जीआरपी और सामान्य थानों के पुलिसकर्मी शामिल हैं. ऐसी और भी टीम हैं. इन टीमों ने पिछले 20 दिन में 100 से अधिक लापता बच्चों को उनके परिवार से मिलाया है. यह काम केंद्रीय गृह मंत्रालय की मुहिम 'ऑपरेशन मुस्कान' के तहत किया जा रहा है. क्या है यह पूरा अभियान? इस संबंध में हमने आगरा जीआरपी के एसपी मोहम्मद मुश्ताक से बात की. उन्होंने बताया,
"सबसे पहले आगरा और झांसी के सामान्य थानों और जीआरपी थानों में दर्ज गुमशुदा बच्चों का डेटा निकाला गया. कुल 231 ऐसे बच्चों का पता लगा. इसके बाद उनकी फोटो का एल्बम बनाया गया. फिर सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित पुलिसकर्मियों का इंटरव्यू करके टीम बनाई गई. इनमें जीआरपी और UP पुलिस के कर्मचारी शामिल थे. कुल चार टीम बनीं. इन टीमों को जरूरी ट्रेनिंग दी गई. बच्चों से संबंधित कानूनों की जानकारी दी गई."इन लापता बच्चों में ज्यादातर बच्चे वे थे, जो कहीं सफर करते हुए अपने माता-पिता से बिछड़ गए. या डांट से नाराज होकर अपना घर छोड़कर चले गए और फिर वापस ही नहीं आए. इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्हें लेकर पॉक्सो एक्ट के तहत मामले दर्ज कराए गए.

एक रेलवे स्टेशन से बच्चों से जानकारी लेता उत्तर प्रदेश पुलिस का कर्मचारी.
पुलिस टीम को इस अभियान को अंजाम देने में काफी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा. कभी बच्चों को अपना घर ही नहीं याद था, तो कभी सबकुछ होने के बाद स्थानीय थानों का सहयोग मिलने में अड़चनें आईं.
गुमशुदा बच्चों का पता लगाने के लिए पुलिस टीमों ने बस स्टैंड से लेकर एनजीओ और शेल्टर होम, सबसे संपर्क किया.
अभी यह अभियान छोटे शहरों में ही चलाया गया है. इन शहरों में सफलता मिलने के बाद इसे दिल्ली, मुंबई, गुड़गांव, गाजियाबाद, भोपाल, जैसे बड़े शहरों में भी चलाने की तैयारी है.
एसपी मोहम्मद मुश्ताक ने बताया कि अभियान के पहले चरण में आगरा, मथुरा, एटा, हाथरस, कासगंज, फिरोजाबाद, अलीगढ़, मैनपुरी, इटावा, फर्रुखाबाद, बांदा, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, कानपुर, झांसी, महोबा और चित्रकूट में टीमों को भेजा गया.
इस अभियान के लिए पुलिस टीम ने टेक्नॉलजी से भी बहुत मदद ली. गूगल मैप से लेकर सी-प्लान जैसी एप्लिकेशन टीम के बहुत काम आई. बंद हो चुके नंबरों को सर्विलांस पर लेकर भी टीम ने बच्चों के माता-पिता का पता लगाया. कुछ प्रमुख मामले ऊपर हम आपको सचिन की कहानी बता ही चुके हैं. अब ऐसी ही कुछ कहानियां और जान लीजिए.
पुलिस टीम ने 9 साल के गणेश को डेढ़ साल बाद उसके परिवार से मिलाया. गणेश मथुरा के एक शेल्टर होम में रह रहा था. उसे केवल अपने गांव का नाम 'चाचली' याद था. पुलिस टीम ने गूगल की मदद से उसके लोकल थाने की जानकारी हासिल की. वहां कॉन्टैक्ट कर गणेश के परिजनों के बारे में जानकारी हासिल की गई. जानकारी सही पाए जाने पर जब पुलिस टीम गणेश को उसके माता पिता के सामने ले गई, तो माता-पिता अपने बच्चे से लिपटकर रोने लगे. माता पिता ने बताया कि उन्होंने गणेश से मिलने की उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी.
इसी तरह पुलिस टीम को मथुरा में ही 13 साल का अजय भी मिला. उसने अपना पता उदल गुड़ी, असम बताया. टीम ने लोकल थाने से संपर्क करके उसके माता पिता की जानकारी ली. बाद में बच्चे को उसके घर छोड़ दिया गया. माता-पिता बहुत खुश हुए. उनका बच्चा एक साल बाद उन्हें मिला.
13 साल के ही विशाल को फरीदाबाद से उसके घर गोरागांव पहुंचाया गया. वह भी एक साल बाद अपने परिवार से मिला. एक सफर के दौरान विशाल अपने पिता से बिछड़ गया था.
बड़े शहरों में खो गए बच्चों को भी उनके परिवार से मिलाया गया. 9 साल के राहुल सिंह को पुलिस टीम ने मानखुर्द चाइल्ड होम, मुंबई से वाराणसी पहुंचाया. टीम उसको वाराणसी लेकर आई और उसकी बताई गई बस्ती में पूछताछ की गई. जल्द ही उसके माता-पिता का पता चल गया. सात महीने बाद अपने बच्चे को वापस पाकर दोनों बहुत खुश हुए.
इसी तरह 6 महीने से लापता कान्हा फिरोजाबाद के एक चाइल्ड होम में रह रहा था. पूछताछ में उसने अपना पता एत्मादपुर बताया. उसे अपने गली और मोहल्ले का नाम याद नहीं था. टीम कान्हा को लेकर एत्मादपुर गई. वहां पूछताछ करने के बाद उसके मम्मी-पापा को खोज लिया गया. जब कान्हा की मम्मी ने अपने इकलौते बेटे को अपनी आंखों के सामने देखा, तो वे उससे लिपटकर जोर-जोर से रोने लगीं.

लापता बच्चे को उसके मां-बाप से मिलाने के बाद पुलिस टीम.
सौरभ को भी फिरोजाबाद से फर्रुखाबाद पहुंचाया गया. उसे अपने माता-पिता का नाम याद नहीं था. हालांकि, अपने पापा का फोन नंबर उसे जरूर याद था. पुलिस टीम ने जब उस नंबर पर फोन मिलाया, तो वह स्विच ऑफ था. फिर सर्विलांस पर डालकर पिता का नाम और घर का पता खोजा गया. सी-प्लान ऐप से उस इलाके में रहने वाले दूसरे लोगों की जानकारी भी हासिल की गई. पता चला कि सौरभ सात महीने पहले लापता हो गया था. बाद में पुलिस सौरभ को उसके घर ले गई.
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि पुलिस टीम ने उन बच्चों को भी उनके घर पहुंचाया, जिनकी रिपोर्ट पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज कराई गई थी. ऐसे मामलों में 14 साल की एक बच्ची को ढाई साल के बाद बांदा और 17 साल की एक किशोरी को पांच महीने के बाद झांसी पहुंचाया गया.
टीम को फरीदाबाद रेलवे स्टेशन पर टहलती हुई एक किशोरी मिली. उसने अपना नाम प्रियंका और उम्र 16 वर्ष बताई. उसने बताया कि वह अपने घर का पता भूल गई है. पुलिस टीम प्रियंका को लेकर फरीदाबाद के सेक्टर 78 ले गई. जहां कई घंटों की पूछताछ के बाद उसके माता पिता को खोज लिया गया. प्रियंका को ठीक-ठाक पाकर उसके माता पिता ने चैन की सांस ली.
इसी तरह पुलिस और जीआरपी ने 100 बच्चों को उनके परिवार से वापस मिलवाया है. वाकई में इस कदम के लिए पुलिस की जितनी तारीफ की जाए वो कम है.

