महिलाओं के बैंक खाते बढ़े, लिंग अनुपात सुधरा... राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में और क्या-क्या है?
देश में महिलाओं की स्थिति को लेकर सर्वे में कई जानकारियां दी गई हैं.
देश में महिलाओं की स्थिति के बारे में राष्ट्रीय सर्वे से अहम जानकारियां सामने आई हैं. (सांकेतिक फोटो)
मुरारी
17 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 17 दिसंबर 2020, 12:45 PM IST)
हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े जारी हुए हैं. इन आंकड़ों में महिलाओं की स्थिति को लेकर कुछ बड़े खुलासे हुए हैं. साल 2019-20 के लिए ये पांचवां राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया. आइए, इस सर्वे के महिलाओं से जुड़े कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं.
महिलाओं के बैंक खातों में बढ़ोतरी
लगभग सभी राज्यों में महिलाओं के मालिकाना हक वाले बैंक खातों में बढ़ोतरी हुई है. राज्यों की अगर बात करें तो बिहार में ऐसे खातों में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है. 2015-16 में यहां केवल 26.4 प्रतिशत महिलाओं के पास अपने बैंक खाते थे, वहीं 2019-20 में यह संख्या बढ़कर 76.7 फीसदी हो गई. बिहार के बाद सबसे बड़ी बढ़ोतरी मणिपुर में हुई. 2015-16 में मणिपुर में ऐसे खातों का हिस्सा 34.8 फीसदी था, 2019-20 में यह बढ़कर 74 फीसदी हो गया.
इसी तरह आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे खातों में क्रमश: 15, 33, 22 और 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. पश्चिम बंगाल में जहां 2015-16 में 43.5 फीसदी महिलाओं के पास बैंक खाते थे, वहीं 2019-20 में यह संख्या बढ़कर 76.5 फीसदी हो गई. तेलंगाना की बात करें तो यहां 2015-16 के 59.5 फीसदी के मुकाबले 2019-20 में 77 फीसदी वृद्धि हुई.
जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई. जम्मू कश्मीर में 2015-16 के 60 फीसदी से बढ़कर ये 2019-20 में 85 फीसदी हो गया. इसी तरह कर्नाटक में भी करीब 29 फीसदी की वृद्धि हुई. केवल लक्षद्वीप में ही ऐसे खातों की संख्या में कमी दर्ज की गई. लक्षद्वीप में जहां 2015-16 में 74.4 फीसदी महिलाओं के पास अपने स्वामित्व के बैंक खाते थे, 2019-20 में इनका हिस्सा घटकर 66.9 फीसदी हो गया.
जनवरी 2020 में जारी हुई रिजर्व बैंक की वित्तीय समावेश की रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं का वित्तीय मामलों से जुड़ना सशक्तिकरण के लिए बेहद जरूरी है.
17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सुधरा लिंग अनुपात
इस बार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण खुलासा लिंग अनुपात को लेकर भी हुआ है. 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसमें सुधार आया है. हालांकि, जन्म के समय लिंग अनुपात अभी भी ज्यादातर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामान्य स्तर पर ही बना हुआ है. यह अभी 952 है. तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, गोवा और दमन दीव में यह 900 के नीचे है.
राज्यों की अगर बात करें तो असम में जहां 2015-16 में 1,000 पुरुषों के मुकाबले 993 स्त्रियां थीं, वहीं 2019-20 में यह अनुपात बढ़कर 1,017 हो गईं. जन्म के समय लिंग अनुपात में भी राज्य की हालत सुधरी है. पिछले के 929 के मुकाबले अब यह आंकड़ा 964 है.
हिमाचल प्रदेश ने इस मामले में सबसे खराब प्रदर्शन किया है. 2019-20 में यहां 1,000 लड़कों के मुकाबले मात्र 835 लड़कियों ने ही जन्म लिया. इसी तरह गोवा के लिए यह आंकड़ा 838 रहा. 2015-16 में दोनों राज्यों के लिए यह आंकड़ा क्रमश: 937 और 966 था.
बिहार और महाराष्ट्र में भी लिंग अनुपात में कमी आई. बिहार में जहां 2015-16 में 1,000 पुरुषों पर 934 स्त्रियां थीं, वहीं 2019-20 में यह आंकड़ा घटकर 908 हो गया. महाराष्ट्र में भी आंकड़ा 924 से घटकर 913 हो गया.
लिंग अनुपात में सबसे अप्रत्याशित कमी केरल में हुई है. 2015-16 के सर्वे के मुताबिक राज्य में 1,000 पुरुषों के मुकाबले 1,047 स्त्रियां थीं. पिछले पांच सालों में यह आंकड़ा घटकर 951 हो गया. मेघालय में भी ये 1,009 से घटकर 989 पर आ गया.
60 फीसदी महिलाओं ने कभी इंटरनेट यूज नहीं किया
इस सर्वे में पाया गया है कि 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 60 प्रतिशत महिलाओं ने कभी इंटरनेट का प्रयोग नहीं किया. सूचना प्रद्यौगिकी के इस तेज तर्रार दौर में यह आंकड़े काफी हैरान करने वाले हैं. सर्वे के अनुसार बिहार में केवल 20.6, आंध्र प्रदेश में 21 और त्रिपुरा में 22.9 फीसदी महिलाएं ही इंटरनेट का यूज कर रही हैं.
इसी तरह असम में 28.2, गुजरात में 30.8, कर्नाटक में 35, महाराष्ट्र में 38, मेघालय में 34.7, तेलंगाना में 26.5, पश्चिम बंगाल में 25.5, दादर और नगर हवेली में 36.7 और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 34.8 फीसदी महिलाएं ही इंटरनेट का प्रयोग करती हैं.
अगर महिलाओं की साक्षरता की बात करें तो आंध्र प्रदेश, बिहार और तेलंगाना में सबसे कम महिलाएं शिक्षित हैं. इन राज्यों में महिलाओं की साक्षरता दर क्रमश: 68.6, 57.8 और 66.6 प्रतिशत है. केरल, लक्षद्वीप और मिजोरम में यह दर सबसे अधिक है. इन राज्यों यह दर क्रमश: 98.3, 96.5 और 94.4 फीसदी है. यहां यह बात ध्यान देने लायक है कि सर्वे में केवल उन महिलाओं को ही शिक्षित माना गया है, जो नौवें दर्जे या उससे आगे तक पढ़ाई कर चुकी हैं और जो पूरा वाक्य या उसका कोई हिस्सा पढ़ सकती हैं.
बिहार, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सबसे अधिक बाल विवाह
सर्वे के मुताबिक, पिछले पांच सालों में देश में बाल विवाह के सबसे अधिक मामले बिहार, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में रिकॉर्ड हुए. इन राज्यों में 40 फीसदी से अधिक लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में ही हो गई. सर्वे में पाया गया कि आंध्र प्रदेश में 12.6, असम में 11.7, बिहार में 11, त्रिपुरा में 21.9 और पश्चिम बंगाल में 16.4 फीसदी, 18 वर्ष की कम उम्र वाली लड़कियों की या तो शादी हो गई या फिर वे गर्भवती पाई गईं.
सर्वे में यह भी पता लगा है कि परिवार नियोजन के स्थाई समाधानों को अपनाने में महिलाओं की दिलचस्पी बढ़ी है. पिछले सर्वे के मुकाबले इसमें 32 फीसदी की वृद्धि हुई है. इसी तरह कंडोम का इस्तेमाल करने वालों की संख्या में भी 4 गुणा की बढ़ोतरी हुई है. महिलाओं की नसबंदी में भी पहले के मुकाबले 18.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. फिलहाल, 41.1 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन के आधुनिक साधनों का इस्तेमाल कर रही हैं.