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मां ने दो महीने की बच्ची का मुंह टेप से लपेटकर मार डाला, शव नाले में फेंक दिया

पुलिस का कहना है कि महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार हो सकती है.

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29 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 29 जनवरी 2020, 05:56 AM IST)
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घटना कोलकाता की है. महिला दो हफ्ते से बच्ची को मारने की प्लानिंग कर रही थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर- Pixabay)
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कोलकाता में 35 साल की एक महिला ने अपनी दो महीने की बच्ची को मार डाला. महिला ने पहले बच्ची का चेहरा सेलोटेप से लपेटा, जिससे दम घुटने से उसकी मौत हो गई. बाद में उसने बच्ची के शव को घर के पास बने नाले में डाल दिया. महिला इस वक्त पुलिस की गिरफ्त में है. पुलिस का कहना है कि हो सकता है कि महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार हो. इस बात की अभी जांच की जा रही है.

क्या है पूरा मामला?

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला अपने परिवार के साथ कोलकाता के CIT रोड पर एक अपार्टमेंट में रहती थी. 26 जनवरी के दिन बच्ची के नामकरण का कार्यक्रम होना था. महिला के पति और सास मंदिर गए थे, ताकि पूजा के लिए किसी पंडित को बुलाया जा सके. महिला का नौ साल का बेटा भी उनके साथ गया था. उसके ससुर भी किसी काम से बाहर गए थे. महिला ने मेड को किसी काम से बालकनी में भेज दिया. वो बच्ची के साथ घर पर अकेली थी. उसी वक्त उसने बच्ची के मुंह पर टेप लपेटकर उसे मारा और शव को नाले में फेंक दिया.

महिला का पति जब घर आया, तो देखा कि वो बेहोशी की हालत में पड़ी हुई है और बच्ची घर से गायब है. पुलिस को बुलाया गया. महिला ने पुलिस को बताया कि एक अज्ञात आदमी ने घर का दरवाजा खटखटाया था. जब उसने दरवाजा खोला, तो आदमी ने उसे धक्का दिया, जिससे वो बेहोश हो गई.

पुलिस ने CCTV फुटेज खंगाले, तो कोई भी अज्ञात व्यक्ति नहीं दिखाई दिया. महिला से दोबारा पूछताछ की गई, तो उसने बताया कि उसने ही अपनी बच्ची को मारा है. ये भी जानकारी दी कि बच्ची को मारने की प्लानिंग वो पिछले दो हफ्ते से कर रही थी. हत्या का कारण ये बताया कि वो बच्ची से थक चुकी थी, उसे आराम नहीं मिल रहा था और न वो ठीक से सो पा रही थी.

पुलिस का कहना है कि हो सकता है कि महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार हो या फिर गर्ल चाइल्ड नहीं चाहती हो. कोई और कारण भी हो सकता है. साथ ही महिला की मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है. वहीं बच्ची के शव को नाले से बरामद कर लिया गया है.

अब पुलिस ने जिस पोस्टपार्टम डिप्रेशन का जिक्र किया, वो होता क्या है, ये भी जान लीजिए-

प्रेग्नेंसी और डिलेवरी के दौरान महिलाओं के शरीर में बहुत से फिज़िकल (शारीरिक), मेंटल (मानसिक) और हॉर्मोनल बदलाव होते हैं. इंडोक्राइन सिस्टम में हॉर्मोनल बदलावों के कारण महिलाओं को पोस्टपार्टम इमोशंस हो सकते हैं. इसमें किसी को एंज़ाइटी, तनाव, बार-बार रोना आना, गिल्टी महसूस करना और भी कई तरह की डिप्रेस करने वाली भावनाएं महसूस हो सकती हैं. ये अगर बढ़ जाता है, तो डिप्रेशन भी हो सकता है.


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दो हफ्तों से ज़्यादा पोस्टपार्टम इमोशंस रहने पर ये डिप्रेशन भी हो सकता है. फोटो क्रेडिट- Getty Images

लगभग 15% औरतों को पोस्टपार्टम डिप्रेशन होता है. अगर इसका इलाज न कराया जाए, तो ये तीन साल तक बना रह सकता है. हममें से बहुत-सी महिलाओं ने इसे महसूस किया होगा. आमतौर पर लोग इस पर ध्यान ही नहीं देते. हमने साइकॉलोजिस्ट एकता सोनी से बात की, तो उन्होंने बताया कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन काफी खतरनाक हो सकता है.

प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के समय महिलाओं को अपने लिए बहुत कम समय मिल पाता है. वो ठीक से सो भी नहीं पातीं. औरतों के शरीर में कई तरह के हॉर्मोनल बदलाव होते हैं, जिसके कारण मूड स्विंग्स होने लगते हैं. महिलाओं का अपने बच्चे के प्रति गुस्सा, बहुत अधिक रोना, उन्हें यहां तक लगने लगता है कि वो अब बंध गई हैं और जो भी कुछ परेशानी है, वो नवजात बच्चे की वजह से ही है. ये कई दफ़ा इतना बढ़ जाता है कि औरतें अपने बच्चे को नुकसान तक पहुंचाने के बारे में सोचने लगती हैं.

इन महिलाओं को इस बात का गिल्ट भी हो जाता है कि वो अपने बच्चे के बारे में ऐसा कैसे सोच सकती हैं. बच्चे उनकी ज़िम्मेदारी हैं, उन्हें चोट पहुंचाने के बारे कैसे सोच सकती हैं. अगर इस तरह के विचार एक-डेढ़ हफ्ते तक रहते हैं, तो ये बेबी ब्ल्यूज़ होते हैं, जो खत्म हो जाते हैं. लेकिन दो हफ्तों से ज़्यादा इस तरह के विचार और डिप्रेशन रहने पर डॉक्टर से इलाज कराना बहुत ज़रूरी है. सही इलाज और परिवार की देखभाल से इसे ठीक किया जा सकता है.



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