पुष्पा गनेडीवाला: वो जज जिन्हें ऊपर-ऊपर से छूना और पैंट खोलना POCSO के तहत यौन अपराध नहीं लगता
जज साहिबा के दूसरे ऐसे ही विवादित फैसले भी जान लीजिए.
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Justice Pushpa Ganediwala ने अभी एक और विवादित फैसला सुनाया है. उन्होंने कहा कि बिना हाथापाई किए युवती का मुंह दबाना, कपड़े उतारना और फिर रेप करना असंभव लगता है.
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जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला. बॉम्बे हाई कोर्ट की जज हैं. नागपुर बेंच में पोस्टेड हैं. आजकल इनकी चर्चा हर जगह है. कानूनी दुनिया से लेकर सोशल मीडिया तक. वजह है बीते दिनों इनके द्वारा सुनाए गए कुछ फैसले. इनमें से दो फैसले उन्होंने पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में सुनाए हैं. पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए लाया गया था. जरूरी बात यह है कि इन फैसलों में जज साहिबा ने निचली अदालत के आदेश को पलट दिया. आइए, जरा नजर डालते हैं.
Justice Pushpa Ganediwala के विवादित फैसले
जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला के विवादित फैसलों की जानकारी पाने के लिए हमने लीगल माइंड्स की मदद ली.
15 जनवरी को जस्टिस पुष्पा ने पहला विवादित फैसला सुनाया. 50 साल के एक शख्स पर पांच साल की एक बच्ची के यौन शोषण का आरोप था. बच्ची की मां ने अपनी शिकायत में कहा था कि आरोपी बच्ची को पकड़कर एक कमरे में ले गया. इस समय उसके पैंट की चेन खुली हुई थी. इस मामले में सेशन कोर्ट ने उस शख्स को पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी माना था. इस फैसले को पलटते हुए जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने कहा कि बच्चों का हाथ पकड़ते समय पैंट की चेन खुला होना पॉक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत यौन अपराधों की श्रेणी में नहीं आता. हालांकि, उन्होंने आरोपी को IPC की धारा 354 (1) (i) के तहत बच्ची की गरिमा भंग करने और पॉक्सो एक्ट की धारा 12 के तहत दोषी पाया.
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दूसरा फैसला 19 जनवरी को उन्होंने दिया. उनका यही फैसला सबसे ज्यादा चर्चा में आया था. एक शख्स पर आरोप था कि उसने 12 साल की बच्ची के स्तन दबाए. यहां भी निचली अदालत ने आरोपी को पॉक्सो के तहत दोषी पाया था. लेकिन जस्टिस गनेडीवाला ने कहा कि आरोपी ने पीड़िता के कपड़े के अंदर हाथ डालकर उसके स्तन नहीं दबाए. स्किन टू स्किन टच नहीं हुआ, इसलिए यह पॉक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत यौन हमला नहीं है. इस मामले में भी जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने आरोपी को आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत दोषी पाया, लेकिन पॉक्सो की धारा हटा ती. धारा के तहत दोषी पाया. विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस फैसले पर रोक लगा दी.
अब उन्हीं जस्टिस का एक और फैसला सामने आया है. ये भी रेप से जुड़ा मामला है. इस मामले में भी निचली अदालत ने 26 साल के आरोपी को रेप का दोषी पाया था. लेकिन जस्टिस पुष्पा ने उन्हें बरी कर दिया. जस्टिस पुष्पा ने तर्क दिया, "बिना हाथापाई किये युवती का मुंह दबाना, कपड़े उतारना और फिर रेप करना एक अकेले आदमी के लिए बेहद असंभव लगता है." जज ने कहा कि इस मामले में सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की बात सही लगती है. युवती ने आरोप लगाया था कि उसका पड़ोसी सूरज कसारकर जबरन उसके घर में घुस आया था. फिर उसने जबरदस्ती की.
पढ़ाई में अव्वल रहीं Justice Pushpa Ganediwala
जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला का जन्म साल 1969 में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के परतवाड़ा में हुआ. उनका पूरा नाम पुष्पा वीरेंद्र गनेडीवाला है. शुरुआत से ही पढ़ाई में तेज थीं. उन्हें बीकॉम, एलएलबी और एलएलएम के दौरान गोल्ड मेडल मिले. उन्होंने पहले ही प्रयासों में नेट और सेट की परीक्षाएं पास कर लीं. साल 2007 में जिला जज बनीं. बाद में वे नागपुर में मुख्य जिला और सेशन जज बनीं. इसके बाद जल्द ही वो बॉम्बे हाई कोर्ट की रजिस्ट्रार जनरल नियुक्त हुईं.
साल 2018 में जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला को बॉम्बे हाई कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्त करने के लिए रेकमेंड किया गया. हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसपर आपत्ति जताई थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की आपत्ति का संज्ञान लेते हुए जस्टिस गनेडीवाली की नियुक्ति आगे बढ़ा दी. साल 2019 में एक बार फिर से उनके नाम पर विचार हुआ. इस बार उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट में अतिरिक्त जज के तौर पर नियुक्त कर दिया गया.
कुछ दूसरे फैसले
साल 2019 में जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला बॉम्बे हाई कोर्ट की उस बेंच में शामिल थीं, जिसने पैरोल को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था. इस फैसले में कहा गया था कि पैरोल कैदियों का एक सीमित अधिकार है, न कि प्रशासन की तरफ से की जाने वाली कोई कृपा. इस फैसले में उस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया, जो किसी कैदी को एक साल में कई बार पैरोल के लिए आवेदन करने से रोकता था. पैरोल का मतलब यह होता कि सजा पाया हुआ कोई कैदी अपने अच्छे व्यवहार के चलते कुछ समय के लिए जेल से बाहर रह सकता है.
2019 में एक लड़की के प्रेमी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ संबंध बनाए. लड़की प्रेग्नेंट हुई तो वो उसे छोड़कर चला गया. इस केस में लड़की बच्चा अबॉर्ट करना चाहती थी. लेकिन प्रेग्नेंसी के 20 हफ्ते बीत चुके थे. ऐसे में उसने कोर्ट से इजाजत मांगी थी. इस मामले में जस्टिस पीएन देशमुख और पुष्पा गनेडीवाला की बेंच ने विक्टिम से कहा था कि वो मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस को देखते हुए किसी अच्छे गायनेकोलॉजिस्ट को संपर्क करे. साथ ही उसे विकल्प दिया गया था कि वो बच्चा पैदा करके उसे अडॉप्शन के लिए दे सकती है. बेंच ने कहा था कि उसकी पहचान कभी भी सामने नहीं आएगी.
इसी तरह 2019 में ही जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने दो और जजों के साथ मिलकर सुनाए गए दो फैसलों में फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था. ये दोनों मामले हत्या से जुड़े हुए थे.
अक्टूबर 2020 में उन्होंने सरकारी अस्पतालों को एक पैनल बनाने का आदेश दिया था. उन्होंने कहा था कि यह पैनल उन गर्भवती महिलाओं को इलाज और डॉक्टरी सलाह की सुविधा उपलब्ध कराएगा, जिन्हें कोविड 19 पॉजिटिव होने के कारण अस्पतालों में घुसने तक नहीं दिया जा रहा है. जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने कोरोना पॉजिटिव इन गर्भवती महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को दलित और अछूत समुदाय के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के बराबर बताया था.
साल 2019 में जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने एक ऐसी महिला पर तीन लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसने एक लड़की की कस्टडी लेने के लिए झूठे कागजात जमा किए थे. इस महिला ने खुद को उस लड़की की बॉयोलॉजिकल मां बताया था. लड़की को कुछ समय पहले ही एक वेश्यालय से बचाकर लाया गया था. जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने पाया कि वह महिला फिर से उस लड़की को वेश्यालय में ले जाना चाहती है. महिला ने फर्जी आधार और पैन कार्ड जमा किए थे.
जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला फैमिली कोर्ट में मामलों को कम करने की वकालत भी लगातार करती रही हैं. इस मुद्दे को लेकर वे कई बार महाराष्ट्र पुलिस की आलोचना भी कर चुकी हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस ढंग से जांच नहीं करती. इसलिए आरोपियों का दोष सिद्ध नहीं हो पाता.
यानी विवादित फैसलों के इतर जस्टिस गनेडीवाला ने कुछ अच्छे फैसले भी दिए हैं. हालांकि, रेप और यौन शोषण के मामलों में, खासकर छोटे बच्चों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को लेकर उनसे संवेदनशीलता की उम्मीद की जाती है. स्किन टू स्किन टच वाले उनके फैसले के बाद सोशल मीडिया पर कई लड़कियों ने यौन शोषण की अपनी आपबीती शेयर की थी.

