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हिजाब विवाद को लेकर अफगानिस्तान से तुलना करने वाले ये पढ़ लें

बात-बात पर पाकिस्तान जाने की बात कहने वालों के लिए ज़रूरी सूचना. जनहित में जारी.

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अफगानिस्तान में हालात बहुत खराब हैं और भारत में उसे उदाहरण की तरह पेश नहीं किया जा सकता है. लेफ्ट फोटो- कर्नाटक में जारी प्रोटेस्ट( PTI), राइट फोटो- काबुल पर कब्जे के बाद तालिबान (AP)
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कुसुम
11 फ़रवरी 2022 (अपडेटेड: 11 फ़रवरी 2022, 03:22 PM IST)
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कर्नाटक का हिजाब विवाद. मामला क्या है आपको पता ही होगा. फिर भी ब्रीफ में बता देती हूं. उडूपी जिले के कुंडापुर स्थित सरकारी इंटर कॉलेज की छह लड़कियां दिसंबर, 2021 से प्रोटेस्ट कर रही हैं कि उन्हें हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने दिया जाए. उनका कहना है कि हिजाब पहनना उनके धर्म की स्वतंत्रता के दायरे में आता है. प्रशासन का कहना है कि हिजाब यूनिफॉर्म का हिस्सा नहीं है और इसलिए लड़कियों को हिजाब के साथ क्लास में बैठने नहीं दिया जा सकता. दोनों अपनी-अपनी जगह सही लग रहे हैं. मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में है. इस पूरी कवायद में लड़कियों की पढ़ाई का हर्जा हो रहा है. कथित धर्मरक्षक इन लड़कियों को टारगेट कर रहे हैं. और अब तो पाकिस्तान चले जाओ, अफगानिस्तान चले जाओ वाला कुतर्क भी सामने आने लगा है.
कर्नाटक में हिजाब को लेकर जारी बहस के बीच अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों का नाम खींचा जाने लगा है. एक्ट्रेस कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम पर स्टोरी लगाई. उसमें लिखा,

"ताकत दिखानी है तो अफगानिस्तान में बुर्का न पहनकर दिखाओ, आज़ाद होना सीखो, खुद को कैद करना नहीं."

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कंगना की इंस्टाग्राम स्टोरी (तस्वीर : इंस्टाग्राम)

बीजेपी विधायक बासनगौड़ा पाटिल यत्निल ने मैसूर में कहा,
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अब कंगना और विधायक महोदय दोनों ये बात भूल रहे हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जो संविधान में तय नियमों से चलता है. संविधान ये सुनिश्चित करता है कि यहां रहने वाले हर धर्म के व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मिले. संविधान हर नागरिक को आज़ादी देता है कि वो कानून के दायरे में रहते हुए अपने अधिकारों की मांग के लिए प्रोटेस्ट कर सकता है. और रही बात भारतीय संस्कृति की तो इसकी परिभाषा से गंगा-जमुनी तहज़ीब का चैप्टर कब और कैसे गायब कर दिया गया मैं जानना चाहूंगी? संविधान और संस्कृति की दुहाई देना काफी नहीं है, उन्हें पढ़ना और समझना भी उतना ही ज़रूरी है. अफ़गानिस्तान और तालिबान से की तुलना इस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान का शासन है. तालिबान एक आतंकवादी संगठन है. अगस्त, 2021 में जब भारत अपनी आज़ादी के 75वें साल में प्रवेश कर रहा था तब अफगानिस्तान में तालिबान औरतों को तालों में बंद कर रहा था. उनकी नौकरियां छीन रहा था. उनका बलात्कार किया जा रहा था, हक की आवाज़ उठाने पर उनकी हत्या कर दी जा रही थी. वहां के हालात बहुत खराब हैं, डराने वाले हैं, वहां औरतों के लिए किसी भी चीज़ से ज्यादा ज़रूरी इस वक्त ज़िंदा रह पाना है. और उसके लिए भारत या भारतीय महिलाएं जिम्मेदार नहीं हैं. तो एक रिग्रेसिव सिस्टम में हो रहे अत्याचार को भारत की करेंट सिचुएशन से जोड़कर, भारत को 'रिग्रेसिवता' की तरफ मत धकेलिए.
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(तस्वीर : ग्लोबल फोटो गैलेरी)

और ये पहली बार नहीं है. जब भी औरतें अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती हैं. खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले लोग तुरंत ऐसे देशों का नाम लेने लगते हैं जहां महिला अधिकारों की बहस भारत जितनी आगे भी नहीं बढ़ पाई है. पसंद के कपड़े पहनने हैं? पाकिस्तान में ये बोलकर देखो. संसद में बराबर रिप्रेजेंटेशन चाहिए? मिडिल ईस्ट में जाकर देखो, वहां तो रेप का आरोप भी बिना पुरुष गवाह के औरत नहीं लगा सकती. और देशों से तुलना क्यों नहीं होती  तो भाईयों और बहनों, इट्स हाईटाइम कि हम थोड़ा अपने दायरे को बढ़ाएं. और भी देश हैं दुनिया में पाकिस्तान, अफगानिस्तान के सिवा. UN की लिस्ट के मुताबिक, 195 टू बी प्रिसाइस. इनमें से ऐसे देशों से अपनी तुलना करें जो जेंडर के मुद्दों पर हमसे कहीं आगे खड़े हैं. उनकी तरह बनने की कोशिश करें.
- नीदरलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न अविवाहित हैं. एक बच्चे की मां हैं. प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने छह महीने की मैटरनिटी लीव भी ली थी. वहां पब्लिक और प्राइवेट लाइफ के अंतर को रिस्पेक्ट करना जनता बखूबी जानती है. और भारत में क्या होता है? नुसरत जहां को ट्रोल किया जाता है क्योंकि उन्होंने शादी के बाहर बच्चा पैदा किया. उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ रही महिला उम्मीदवारों की बिकिनी वाली फोटोज़ और डांस वीडियो वायरल किए जाते हैं, ये मैसेज देने कि लिए कि ये क्या कुर्सी संभालेंगी.
- रवांडा, क्यूबा, UAE,कोस्टा रिका, फिनलैंड, स्वीडन, साउथ अफ्रीका, मेक्सिको जैसे देशों की संसद में 45 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं. भारत में आपको पता है केवल 11 प्रतिशत औरतें हैं. संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग वाला बिल 25 साल से अटका हुआ है. पहली बार ये बिल 1996 से में लोकसभा में पेश किया गया था, तब से अब तक इस बिल में कई संशोधन हुए लेकिन संसद में ये पास नहीं किया जा सका है.
- दुनिया के 150 देशों में मैरिटल रेप अपराध है. भारत उन 150 देशों में शामिल नहीं है. भारत में मैरिटल रेप की बहस में जनता और जिम्मेदार तर्क देते हैं कि ये पश्चिम की हवा का असर है, पतियों को जेल में डालने का एक और रास्ता मिल जाएगा, शादी की संस्था के लिए खतरनाक, हमें ये नहीं मानना चाहिए कि सारी शादियों में हिंसा होती है और सारे पुरुष रेपिस्ट होते हैं.आदि. उनको समझ ही नहीं है कि शादी के अंदर होने वाली ज़बरदस्ती एक महिला के लिए उतना ही डरावना है जितना रेप.
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गया एयरपोर्ट के 'GAY' कोड से भी किलस जाते हैं लोग

- ह्यूमन राइट्स कैम्पेन की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में 29 देश ऐसे हैं जहां समलैंगिक शादियां लीगल हैं. क्या इनमें भारत है? नहीं. यहां तो गया एयरपोर्ट का कोड GAY होने तक पर लोगों को आपत्ति है. लोगों को ये संस्कृति का अपमान लगता है. आर्टिकल 377 हटने के बाद भारत में समलैंगिक जोड़े साथ रह तो सकते हैं, लेकिन उनको वो अधिकार नहीं मिलते जो एक हेटरोसेक्शुअल शादी में किसी की पत्नी या पति होकर उन्हें मिलते. न प्रॉपर्टी राइट्स, न इंश्योरेंस.
उनके पास तो दो वक्त का खाना भी नहीं है, वो तो फटे जूतों में स्कूल आता है, अप्रिशिएट वाट यू हैव. नैतिक शिक्षा की क्लास में ये पढ़ाया जाता है. उसी क्लास में ये भी बताया जाता है कि हमारे खुद के ग्रोथ के लिए ज़रूरी है कि हम अपने से बेहतर कर रहे लोगों को देखें और उनसे सीखें. खुद से पीछे चल रहे शख्स की तुलना में हम आगे हैं, इसका ये मतलब नहीं कि हम जहां हैं वहीं रुक जाएं. या उसका साथ देने के लिए पीछे की तरफ कदम बढ़ाएं. बल्कि हमें आगे बढ़ते हुए पीछे वाले को खींचने की कोशिश पर ज़ोर देना चाहिए.

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