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कोर्ट ने मना किया था, फिर भी बिलकिस बानो के बलात्कारियों को छोड़ दिया गया!

गुजरात सरकार ने बताया उन्होंने ट्रायल कोर्ट की सलाह के खिलाफ जाकर दोषियों को क्यों रिहा किया?

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19 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 19 अगस्त 2022, 04:16 PM IST)
Bilkis Bano Case Convict
दोषियों के स्वास्थ्य, जेल में उनका व्यवहार और मानसिक स्थिति जैसी चीजों को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया है.
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गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो केस के 11 दोषियों को रिहा करने का जो फैसला लिया है वो मुंबई ट्रायल कोर्ट के विचार के खिलाफ है. मुंबई ट्रायल कोर्ट ने ही साल 2008 में इन दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी.

स्क्रॉल पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जेल एडवाइज़री समिति के एक सदस्य ने बताया कि मुंबई की ट्रायल कोर्ट ने माफी नीति के तहत लगाई याचिका (Remission plea) पर रज़ामंदी नहीं दी थी. इस बारे में गुजरात सरकार से सवाल किया गया.पूछा गया कि उन्होंने ट्रायल कोर्ट की सलाह के खिलाफ जाकर दोषियों को क्यों रिहा किया? गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राज कुमार ने कहा,

"गुजरात सरकार ने जेल एडवाइज़री बोर्ड के सुझावों के साथ जाने का फैसला किया था. बोर्ड ने कहा था कि दोषियों को रिहा किया जाना चाहिए. जेल एडवाइज़री कमिटी ने दोषियों के स्वास्थ्य, जेल में उनका व्यवहार और मानसिक स्थिति जैसी चीजों को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया है. वहीं ट्रायल कोर्ट के जज ने सुनवाई के दौरान जो देखा-सुना उस आधार पर अपनी राय बनाई होगी."

ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी की अहमियत क्या थी?

गुजरात दंगों से जुड़ा बिलकिस बानो केस पहला ऐसा मामला था जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इसकी जांच गुजरात के बाहर ट्रांसफर की जाए. मुंबई की विशेष अदालत में इस मामले की सुनवाई हुई थी. 2008 में कोर्ट ने 11 आरोपियों को मर्डर और रेप का दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी.

14 साल बाद अप्रैल, 2022 में एक दोषी ने माफी नीति के तहत सज़ा कम करने की अर्ज़ी डाली थी.

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर के सेक्शन 432 (2) के मुताबिक,

"सरकार दोषियों की अर्ज़ी मानने या खारिज करने के लिए उस जज की राय ले सकती है जिसने उस केस में फैसला सुनाया था"

स्क्रॉल में छपी खबर के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस गोविंद माथुर का कहना है कि "जज की राय ले सकते हैं" को "जज की राय लेना अनिवार्य नहीं है" की तरह नहीं समझा जाना चाहिए. ये  नियम ये बताने के लिए है कि इन मामलों में जज की राय बेहद महत्वपूर्ण है. अगर कोई उनकी राय को अनदेखा कर रहा है तो इसकी वजह या इसके पीछे के तर्क को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए.

इसी साल एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट के प्रीसाइडिंग ऑफिसर (यहां जज) की राय 'सेफगार्ड' की तरह है. रिहाई पर फैसला लेते हुए जज की राय को सरकार बस एक विकल्प की तरह लेती है तो बहुत संभव है कि सेक्शन 432 (2) बस एक औपचारिकता बनकर रह जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने सन 2000 में गाइडलाइंस जारी करते हुए कहा था कि केवल वही दोषी समय से पहले रिहाई के हकदार होंगे जिनका  अपराध पूरे समाज को प्रभावित नहीं करता.

जेल से रिहा होने के बाद 11 दोषियों का मिठाई खिलाकर स्वागत किया गया. 
दोषियों की रिहाई में भाजपा नेताओं का हाथ

जेल एडवाइज़री कमिटी का गठन गुजरात की भाजपा सरकार ने किया था. इसमें 10 सदस्य थे जिनकी अध्यक्षता पंचमहल के कलेक्टर सुजल मायात्रा ने की थी.इन 10 में से 5 सदस्य भाजपा के अधिकारी हैं. इसमें दो भाजपा विधायक और एक सांसद भी शामिल थे.

सुजल मायात्रा (पंचमहल कलेक्टर)
सी. के. राउलजी (गोधरा से भाजपा विधायक)
सुमनबेन  चौहान (कलोल से भाजपा विधायक)
सवंत सिंह राठोड़ (पंचमहाल के भाजपा सांसद)

इनके अलावा तीन और लोग थे जिन्हें 'सोशल वर्कर' के तौर पर कमिटी में शामिल किया गया.ये तीनों लोग भी भाजपा से जुड़े हैं.

पवन सोनी ( भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य)
सरदारसिंह बरिया पटेल (भाजपा गोधरा तालुका अध्यक्ष)
विनीतबेन लेले ( गोधरा महिला विंग उपाध्यक्ष)

बाकी चार पंचमहल के एसपी, गोधरा जेल के सुपरिटेंडेंट, गोधरा के सोशल वेलफेयर ऑफिसर और गोधरा कोर्ट के सेशन जज शामिल थे. इस कमिटी में शामिल बीजेपी विधायक सीके राउलजी का एक वीडियो एक दिन पहले सामने आया था. इसमें वो दोषियों के बचाव में कह रहे थे,

वो ब्राह्मण थे और ब्राह्मण अच्छे संस्कार के लिए जाने जाते हैं. हो सकता है कि किसी ने जानबूझकर उन्हें फंसाया हो.

इस मामले पर जब आजतक की गोपी घांघर ने सीके राउलजी से बात की तो उन्होंने कहा,

दोषियों में ब्राह्मण के अलावा भी कई जातियों के लोग थे. उनमें आदिवासी भी थे. ये कहना गलत है कि ब्राह्मण थे इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया. उन्हें सरकार द्वारा बनाई सुप्रीम कोर्ट कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर रिहा किया गया है. उन्होंने 14 साल से ज्यादा जेल में काटे हैं. और जेल में उनके आचरण को देखते हुए ये फैसला लिया गया.

हालांकि, राउलजी अपनी बात को एक फिर दोहराते नजर आए. उन्होंने कहा कि दंगे-फसाद में जानबूझ कर फंसा दिया जाता है. इस केस में भी ऐसा हो सकता है.

वीडियो: बिलकिस बानो की सरकार से मांग!

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