गोवा के CM प्रमोद सावंत ने बीते दिन कहा कि वो ऐसा विचार कर रहे हैं कि औरतों केसाथ हो रहे क्राइम को रोकने के लिए वो एक पिंक फ़ोर्स बनाएं. बेहद नेक विचार है.औरतों के साथ हो रहे क्राइम्स बहुत ज्यादा हैं और उसके लिए अगर डेडिकेटेड फ़ोर्सबनाई जाती है तो ये औरतों के हक़ में लिया गया एक अच्छा कदम होगा. तो खबर ख़तम, बातख़तम.नहीं, अभी ख़तम नहीं! क्राइम मास्टर गोगो, आया हूं, कुछ तो लेकर जाऊंगा वाले इमोशनको आगे बढ़ाते हैं. तो भाई औरतों के लिए लिया जाने वाला हर स्टेप बढ़िया है लेकिन हरबार ये पिंक कलर क्यों! मॉल जाओ तो आधे कपड़े गुलाबी दिखते हैं. अपनी शादी की शॉपिंगमें तो मैंने इतना पिंक देख लिया कि अब वो मेरी आंखों में ऐसे चुभता है जैसे कानोंमें एक बड़ी फेमस एक्ट्रेस हैं, उनकी आवाज़. ऑफिस जाने के लिए लेडीज को मिलता है पिंकऑटो. बसों में मिलती है पिंक सीट, या फिर पिंक टैक्सी, पिंक ट्रेन, पिंक स्कूटी,पिंक बाथरूम, पिंक पिंक पिंक पिंक. भाई साब पिंक का इतना ओवरडोज है कि कुछ दिनोंमें अगर रेस्टोरेंट वगैरह में औरतों को लेडीज स्पेशल पिंक रोटियां सर्व होने लगें,तो चौंकिएगा मत.पिंक औरतों का रंग है, ये कब डिसाइड हुआ?एनिवे, तो हमने बैठकर सोचा कि यार ऐसा कब हुआ होगा कि लोगों ने तय किया कि पिंकऔरतों का कलर होगा और ब्लू लड़कों का. थोड़ी पढ़ाई करने पर पाया कि ये मामला ज्यादापुराना नहीं है. बल्कि मीडियम डॉटकॉम पर छपे एक आर्टिकल के मुताबिक़, पिंक कलरपुरुषों के ज्यादा करीब माना जाता था क्योंकि वो लाल बेस से निकला हुआ कलर था. औरलाल रंग आज की तरह पहले सेक्सी रंग नहीं माना जाता था बल्कि पुरुषों की यूनिफार्मलाल रंग की बनती थी. बड़ा मैस्कुलिन कलर मानते थे क्योंकि ये लाउड, ब्राइट,स्ट्रॉन्ग और आकर्षक होता है और आप तो जानते हो, how men have loved being thecentre of attraction always! :pखैर, रंगों पर वापस आते हैं. कोरा पर मौजूद एक आर्टिकल के मुताबिक़, ये शिफ्ट दूसरेविश्व युद्ध के आस-पास आया. उस समय पुराने परसेप्शन बदल रहे थे, पुराने बिलीफ बदलरहे थे. पढ़ने में आता है कि उस वक़्त टॉयलेट्स पर जो साइन्स बन रहे थे, उसमें फीमेलके लिए पिंक और मेल के लिए ब्लू यूज़ हो रहा था.लेकिन हर एक चीज, हर बिलीफ के इतिहास में एक ऐसा पल होता है जिसे मार्केट पकड़ लेताहै. और पिंक के इतिहास में भी ऐसे मोमेंट थे. आपने मैरिलिन मोनरो का नाम सुना होगा.नहीं सुना होगा तो कम से कम उनकी ये तस्वीर ज़रूर देखी होगी."द सेवन ईयर इच" की फिल्मिंग के समय मेर्लिन मुनरो की तस्वीर.अब ये ड्रेस सफ़ेद है लेकिन इन्होंने 1953 में पहनी थी एक गुलाबी ड्रेस, फिल्म'जेंटलमेन प्रिफर ब्लॉन्ड्स' में, जो लोगों के मन में बस गई. मोनरो उस वक़्त से लेकरआने वाले समय में - यहां तक आज भी - सेक्सीनेस, फीमेल सेक्शुअल एक्सप्रेशन औरस्त्रीत्व का दूसरा नाम मानी जाती हैं. लेकिन ऐसा स्त्रीत्व नहीं जो लाचार, बेचाराया किसी पर निर्भर हो. बल्कि एक मॉडर्न लड़की जिसको सेक्सी दिखने से, अपने मन केकपड़े ओढ़ने-पहनने से ताकतवर महसूस होता है.तो लाल और उससे निकले हुए कलर जो पहले पुरुषों के रंग माने जाते थे, उसे महिलाओं नेपहना और ये ज़ाहिर किया कि वे भी आकर्षण का केंद्र हो सकती हैं. लेकिन समय के साथपिंक के लाइट शेड्स पर भी फोकस गया. जो आंखों के लिए आकर्षक से ज्यादा उन्हें सुकूनदेने वाला होता है. ऐसा ही सॉफ्ट पिंक सूट जॉन ऍफ़ केनेडी की पत्नी जैकी केनेडी नेपहना था. उस दिन, जिस दिन केनेडी की हत्या की गई. कुछ ही समय में उनका ये पिंक सूटअपने पति के खून से सना हुआ था. लोगों के ज़हन में ये एक बुरी याद की तरह दर्ज हैलेकिन उन्हें ये भी याद है कि ये पिंक सूट जैकी को बेहद पसंद था और इसे वे कई बारपहन चुकी थीं.पिंक के सुकून भरे शेड्स औरतों का पर्याय बन गए. क्यों? क्योंकि मार्केट कोस्त्रीत्व की परिभाषा तय करने का बड़ा फायदा मिलता है. परिभाषाएं तय होने के बादऔरतों को स्पेसिफिकली टारगेट करते हुए शेड्स बेचे जा सकते हैं.आज मार्केट किस जगह है, आप देख ही सकते हैं. लड़कियों के जुड़ी हर चीज गुलाबी है.क्योंकि कलेक्टिव मेमोरी में लड़कियों की कल्पना भी गुलाबी है. वे हंसेंगी तो फूलझड़ेंगे, वो जुल्फें खोलेंगी तो रात हो जाएगी. लड़की घर में खुशियां भर देगी, आपकेआंसू पोंछ लेगी, बहके हुए पुरुष को संभाल लेगी, मां बनकर त्याग करेगी, सबके दुख हरलेगी, वगैरह-वगैरह. पिंक एक हैपी कलर है. मगर हमारे देश में, हमारे कल्चर में क्यालड़कियों के हाल उतने ही गुलाबी हैं जितने फिल्मों में उनके गाल गुलाबी हैं. आपसोचियेगा. लेकिन मुझे पर्सनली, एक लड़की के तौर पर, सिर्फ एक रंग से जोड़े जाने सेप्रॉब्लम होती है.पिंक से प्रॉब्लम क्या है?तो क्या पिंक कलर बुरा है? बिलकुल नहीं. यही गुलाबी रंग जब ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेसका रंग बनता है, तो कितना खूबसूरत लगता है. आप क्रिकेट फॉलो करते हैं तो आपकोऑस्ट्रेलिया के वेटेरन खिलाड़ी ग्लेन मेकग्रॉ उनकी पत्नी जेन के बारे में ज़रूर पताहोगा. जेन ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं. 2008 में वे दुनिया से चली गईं लेकिन उसकेपहले दुनिया को दे गईं एक उम्दा ब्रेस्ट कैंसर केयर सिस्टम. आज मेकग्रॉ फाउंडेशन उननर्सेज़ को फंड करता है जो ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों का खयाल रखती हैं. गुलाबी रंगइनकी पहचान है. पिंट टेस्ट इनकी पहचान है.सिंबल और प्रतीक हमेशा ख़राब हों ये ज़रूरी नहीं. लेकिन जब ये प्रतीक हमें बांटनेलगें तब ये खतरनाक हो जाते हैं. बच्चे के पहले होने के पहले ही उसे गुलाबी और नीलेमें बांटना, फिर उनके कपड़े बांटना, फिर उनके खिलौने बांटना. जब हम बच्चों को उनकेरंग असाइन कर देते हैं तो वो आपस में समानताओं से ज्यादा भेद पहचानते लगते हैं.तो भाई. मैं लड़की हूं, मुझे स्ट्रॉबेरी का खेत मत बनाइए. हर जगह खुद के लिए गुलाबीरंग देखकर लगता है कि हमें बाकी सबसे अलग कर दिया गया है. आपकी क्या राय है? कमेंटबॉक्स में बताइएगा.