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नदी पार कर उस गांव में कोरोना का टीका लगा आईं जहां सड़क भी नहीं जाती

नक्सलियों के खतरे के बीच अपना फ़र्ज़ निभाने वाली डॉक्टर से मिलिए.

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डॉक्टर सरिता मनहर छत्तीसगढ़ के ताकीलोड गांव पहुंचने वाली पहली महिला डॉक्टर हैं. (फोटो- एस करिमुद्दीन)
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लालिमा
24 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 24 अप्रैल 2021, 01:14 PM IST)
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कोरोना के हाहाकार की तस्वीरें बहुत आ रही हैं. हर तस्वीर अपने आप हज़ार शब्द बयां कर रही है. लेकिन इन सबके बीच हमें कुछ ऐसी कहानियां भी सुनने को मिल रही हैं, जो दिल को थोड़ी तसल्ली देती हैं. विश्वास दिलाती हैं कि इंसानियत अभी भी ज़िंदा है. ऐसी ही एक कहानी हमारे पास आई छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ इलाके से. ये इलाका घने जंगलों से, नदी-नालों से घिरा हुआ है. यहां बसे कई छोटे-छोटे गांव तो ऐसे हैं, जहां तक प्रशासन पहुंच ही नहीं पाता. ऐसा ही एक गांव है ताकीलोड़. बीजापुर ज़िले के भैरमगढ़ ब्लॉक में आता है. गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है. नदी पार करके जाना पड़ता है. रास्ता कठिन है. ऐसे में यहां रहने वाले लोगों को वैक्सीन लगाना एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी. जिसे पूरा किया डॉक्टर सरिता मनहर ने. ये भैरमगढ़ CHC यानी कम्युनिटी हेल्थ सेंटर मेडिकल ऑफिसर के पोस्ट पर तैनात हैं.

क्या किया डॉक्टर सरिता ने?

'इंडिया टुडे' से जुड़े पत्रकार एस. करिमुद्दीन की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर सरिता हाल ही में ताकीलोड़ गांव पहुंची. अपनी टीम के साथ. उन्होंने ये सफ़र बाइक, नाव और पैदल तय किया. सुबह ही वो इस गांव तक पहुंचने के लिए निकल गई थीं, लेकिन पहुंचते-पहुंचते दोपहर के 11-12 बज गए थे. वहां जाने के बाद उन्होंने गांव के लोगों को कोरोना वायरस के बारे में और ज्यादा जानकारी दी. फिर वैक्सीन के बारे में बताया. शुरू में तो गांव वालों ने वैक्सीन लगवाने से मना किया, लेकिन डॉक्टर सरिता और उनकी टीम के समझाने पर आखिरकार वो मान गए. करीब 60 गांववालों को कोरोना का पहला टीका लगाया गया. अब छह-सात हफ्ते बाद, जब दूसरे डोज़ की बारी आएगी, तब भी डॉक्टर सरिता वहां जाएंगी और टीका लगाएंगी.

चूंकि ताकीलोड़ गांव जिस इलाके में आता है वहां नक्सलियों का खतरा भी हमेशा बना रहता है. ऐसे में डॉक्टर सरिता का वहां जाना वाकई हैरानी और गर्व की बात है. वो पहली महिला डॉक्टर हैं, जो ताकीलोड़ गांव में गईं. 'ऑडनारी' ने डॉक्टर सरिता से इस मुद्दे पर बात की, जाना कि वो कैसे गांव तक पहुंचीं और वहां मौजूद लोगों का रिएक्शन क्या रहा. उन्होंने बताया-

"हम आठ बजकर दस मिनट पर CHC से निकले. एंबुलेंस से इंद्रावति नदी के पास तक गए थे. यहां से दस किलोमीटर दूर है. नदी तो नांव से पार किए. आगे जाने का कोई साधन नहीं था. कुछ टीचर्स हमारे साथ में थे, जो बाइक में थे. उनकी बाइक को हमने नाव से पार कराया. हमने कैंप के लिए जो ज़रूरी सामान था, उसे बाइक से वर्कर्स के साथ पहुंचा दिया. फिर हम लोग दो-तीन किलोमीटर तक जंगल की पगडंडी में पैदल चले. फिर बाइक वापस आई, उससे हम गांव पहुंचे. ताकीलोड़ गांव के लोग काफी भोले हैं. साक्षरता दर भी बहुत कम है. गिने-चुने लोगों को ही हिंदी आती है. गोंडी में बात करते हैं ज्यादातर लोग. शुरू हमें जब हमने टीका लगाने के लिए बोला, तो वो डरे. लेकिन जैसे-जैसे उन्हें बताया गया कि उसके फायदे क्या हैं, तो वो समझ गए. 45 से 60 के उम्र के लोगों को वैक्सीन लगानी थी. इस एज ग्रुप के 60 लोगों को हमने वैक्सीन लगाई."


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नाव से नदी पार करके गांव पहुंची थीं डॉक्टर सरिता. (फोटो- एस करिमुद्दीन)

डॉक्टर सरिता बताती हैं कि गांव के लोगों ने कोरोना का नाम तो सुना था, लेकिन उन्हें केवल यही पता था कि सर्दी-ज़ुकाम जैसी बीमारी होती है. इस वायरस का असल चेहरा उन्हें नहीं पता था. इसलिए वैक्सीन लगाने के पहले गांववालों को प्रॉपर जानकारी दी गई. टीकाकरण के लिए औरतें, पुरुषों की तुलना में जल्दी मान गई थीं. डॉक्टर सरिता के साथ उनकी पूरी टीम थी. गांव की आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता भी थीं. सभी ने मिलकर काम किया और दूर-दराज इलाके में मौजूद इस गांव को कोरोना की चपेट में आने से रोकने के लिए पहला कदम उठाया. डॉक्टर सरिता ने बताया कि दोपहर का खाना भी गांव में कैंप में उन्होंने खाया था. जिस इलाके में सरिता गई थीं, वहां न तो ठीक से बिजली आती है और न ही फोन का नेटवर्क. ऐसे में इस इलाके तक जाकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाना वाकई बड़ी बात है.


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