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  • Delhi high court says Rape by HIV positive man not attempt to murder and did not amount to the offence under Section 307 of IPC

HIV पॉज़िटिव आदमी के रेप करने पर हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

निचली अदालत ने 'हत्या की कोशिश' का दोषी माना था आदमी को.

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दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के एक फैसले में बदलाव किया. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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लालिमा
9 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 9 दिसंबर 2020, 08:33 AM IST)
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दिल्ली हाई कोर्ट ने 8 दिसंबर को एक रेप मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी दी. कोर्ट ने कहा कि HIV पॉज़िटिव व्यक्ति द्वारा किए गए रेप को हत्या की कोशिश नहीं माना जा सकता है. जस्टिस विभु बाखरू की सिंगल बेंच ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए ये बात कही.

क्या है पूरा मामला?

'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2012 में एक निचली अदालत ने एक फैसला सुनाया था. एक आदमी को उसकी सौतेली बेटी के रेप के मामले में IPC के सेक्शन 376 के तहत 10 साल की सज़ा, सेक्शन 313 (बिना महिला की सहमति के गर्भपात करना) के तहत पांच साल की सज़ा और सेक्शन 307 (मर्डर की कोशिश) के तहत 10 साल की सज़ा सुनाई थी. निचली अदालत ने इस तथ्य के आधार पर आदमी को 'हत्या की कोशिश' का दोषी पाया था कि वो HIV पॉज़िटिव था और उसे इस बात की जानकारी भी थी, और वो ये भी जानता था कि उसकी हरकत से सामने वाले पक्ष यानी लड़की भी इस बीमारी से संक्रमित हो सकती है.

निचली अदालत के इसी फैसले के खिलाफ रेप के दोषी ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. इसी मामले पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने रेप की सज़ा को बरकरार रखते हुए 'हत्या की कोशिश' के मामले में मिली सज़ा को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने कहा कि अगर निचली अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया गया, तो इसका ये मतलब भी होगा कि किसी भी HIV पॉज़िटिव व्यक्ति का किसी भी सेक्शुअल एक्टिविटी में शामिल होना, फिर भले ही वो पार्टनर की मर्ज़ी से हो, IPC के सेक्शन 307 के तहत दंडनीय होगा.

'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने ये भी कहा कि इस फैसले को स्वीकार करने का ये भी मतलब होगा कि कोई स्वस्थ व्यक्ति, अपनी मर्ज़ी से HIV पॉज़िटिव व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाता है और इस बीमारी से संक्रमित हो जाता और जो कि फिर घातक साबित होती, तो क्या उसे आत्महत्या कहा जाएगा? ऐसे में अगर HIV पॉज़िटिव पार्टनर मर्डर का दोषी नहीं होता, तो IPC के सेक्शन 307 के तहत 'आत्महत्या के लिए उकसाने' का दोषी हो जाता.

और क्या कहा कोर्ट ने?

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को वैज्ञानिक डाटा पर आधारित न होकर, अनुमान और विचार पर आधारित होना बताया. कहा-

"ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर प्रोसीड किया कि HIV पॉज़िटिव व्यक्ति द्वारा सेक्शुअल इंटरकोर्स करने से इस बात की संभावना है कि पार्टनर की मौत हो सकती है. ये दो धारणाओं पर आधारित है. पहला, इस तरह के सेक्शुअल इंटरकोर्स से हेल्दी पार्टनर को रोग फैलने की सबसे अधिक संभावना है. दूसरा, कि इस बीमारी के संक्रमण से पार्टनर इतना ज्यादा संक्रमित हो जाए कि उसके मरने की संभावना बन जाए. हालांकि, दोनों ही धारणाएं, बिना किसी आधार और बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हैं."

आखिर में हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने ये माना कि इस मामले में IPC की धारा 270 (जान-बूझकर या लापरवाही से संक्रामक बीमारी फैलाने के लिए सज़ा) लागू नहीं होगी, ऐसा करके कोर्ट ने गलती की. कोर्ट ने कहा, HIV पॉज़िटिव व्यक्ति, जिसे मालूम है कि वो HIV पॉज़िटिव है और फिर भी वो असुरक्षित यौन संबंध बनाता है, तो उसे IPC के सेक्शन 270 के तहत सज़ा दी जा सकती है.

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