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क्या अविवाहित औरत अपने मां-बाप की प्रॉपर्टी से शादी का खर्च मांग सकती है?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इस बारे में सुनवाई चल रही है.

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कोर्ट ने कहा कि अविवाहित लड़की अपने पिता से शादी का खर्च मांग सकती है. (सांकेतिक तस्वीर )
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संध्या चौरसिया
3 अप्रैल 2022 (अपडेटेड: 4 अप्रैल 2022, 09:29 AM IST)
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर. यहां के हाई कोर्ट में एक अजब पिटीशन फाइल हुई है. पिटीशन एक 35 साल की औरत ने फाइल की है. महिला ने अपने पिता के रिटायरमेंट के पैसों यानी पेंशन बेनिफ़िट से हिस्सेदारी मांगी है. ये हिस्सा जायदाद में हिस्सेदारी जैसा नहीं, बल्कि शादी के खर्च का है. औरत अविवाहित है. उसने 22 फरवरी 2016 को फ़ैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसे खारिज कर दिया गया था.
अब हाई कोर्ट ने 21 मार्च 2022 के इस केस को मान्यता दे दी है. आगे की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट ने इस केस को फैमिली कोर्ट के पास वापस भेजा है. कोर्ट का कहना है कि एक अविवाहित बेटी 'हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम-1956' के प्रावधानों के तहत अपने माता-पिता से शादी में खर्च होने वाले रुपयों पर दावा कर सकती है. पूरा केस  मामला छत्तीसगढ़ के भिलाई ज़िले का है. 35 साल की एक महिला हैं राजेश्वरी. अविवाहित हैं. उन्होंने अपने पिता के रिटायरमेंट मनी में से अपनी शादी का खर्च क्लेम किया है. पिता भानु राम भिलाई स्टील प्लांट में कर्मचारी हैं. उन्हें रिटायरमेंट पर 75 लाख रुपये मिलने थे, जिसमें से बेटी राजेश्वरी ने 20 लाख की हिस्सेदारी का दावा किया है.
अपनी याचिका में राजेश्वरी ने लिखा कि उनके पिता भानु राम रिटायर होने जा रहे हैं और उन्हें अपनी कंपनी से पेंशन बेनिफिट के 75 लाख रुपये मिल चुके हैं और 25 लाख बाकी हैं. याचिका में कहा गया कि कोर्ट 'भिलाई स्टील प्लांट' को यह निर्देश दे कि वो भानु राम के पेंशन बेनिफिट के 25 लाख रुपये उनकी बेटी के नाम रिलीज करे.
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने केस पर आगे की सुनवाई के लिए मंज़ूरी दे दी है. (साभार : आजतक)

22 फरवरी 2016 को दुर्ग ज़िले के फैमिली कोर्ट ने राजेश्वरी की इस पिटीशन को खारिज कर दिया. इसके बाद राजेश्वरी इस केस को हाई कोर्ट ले गईं. राजेश्वरी के वकील ए. के. तिवारी ने बताया कि 21 मार्च 2022 को हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा लगाए प्रतिबंधों को हटाकर इसे मान्यता दे दी है. कोर्ट ने कहा,
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क्या कहता है कानून? हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956. अंग्रेज़ी में Hindu Adoptions and Maintenance Act. ये कानून मूलतः बच्चों और स्त्रियों के रख-रखाव से संबंधित है. अब बात आती है कि इस केस की, तो हिंदू अडॉप्शन और मेनटनेंस ऐक्ट की धारा-3(ख) के मुताबिक़, पिता के अपने बच्चों के भरण-पोषण में होने वाले खर्च में उसकी अविवाहित लड़की के शादी का खर्च भी आता है, जिसे वो लड़की 18 साल के बाद कभी भी क्लेम कर सकती है.
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यह अधिनियम लड़की की शादी में होने वाले खर्च पर उसकी दावेदारी सुनिश्चित करता है. (सांकेतिक तस्वीर)
पहले भी आ चुका है ऐसा केस राजेश्वरी ने अपनी याचिका में 1991 में मद्रास के आर. दुराईराज v/s सीतालक्ष्मी अम्मल मामले का हवाला दिया. हवाला देने से मतलब है ऐसा ही एक केस मद्रास में पहले भी दर्ज हुआ था. इस मामले को लेकर हमने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट अनंत मिश्रा से बात की. उन्होंने बताया,
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इस अधिनियम के तहत केस तो दर्ज हुआ लेकिन याचिकाकर्ता को रुपये नहीं मिले. यहां यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है कि ये कानून इस बात की गारंटी नहीं देता कि याचिकाकर्ता को क्लेम किए हुए रुपये मिलेंगे ही. केस की पूरी पड़ताल करने के बाद ही कोर्ट किसी फैसले पर पहुंचता है. जैसा कि 1991 के मद्रास केस में हुआ.
फिलहाल छतीसगढ़ के राजेश्वरी v/s भानु राम केस को (AFR) यानि कि अप्रूवल फॉर रिपोर्टिंग मिल गई है. अब इस केस की सुनवाई और अंतिम निर्णय से इस एक्ट से जुड़े अन्य पक्ष भी उजागर होंगे.

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