The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Oddnaari
  • CJI SA Bobade Comments on Women Farmers here is why it is problematic to deny them their agency

सरकार को लपेटते वक़्त चीफ़ जस्टिस बोबडे भूल गए कि किसानों में महिलाएं भी होती हैं?

कम से कम कोर्ट में इस तरह की बात नहीं कही जानी चाहिए.

Advertisement
pic
12 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 12 जनवरी 2021, 02:35 AM IST)
Img The Lallantop
बाईं तरफ CJI SA बोबडे, और दाईं तरफ सिंघु बॉर्डर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेती महिला किसान.
Quick AI Highlights
Click here to view more
कहानी 200 साल से ज़्यादा पुरानी है. फ़्रांस के शहर पेरिस में भुखमरी जैसी नौबत थी और वहां के राजा को किसी भी चीज़ से ख़ास फर्क पड़ता नहीं दिखता था. जब इंसान राजाओं से त्रस्त हो उठता है तब क्रांति होती है और फ़्रांस में उन दिनों ऐसी ही हवा थी. महंगाई आसमान छू रही थी और लोगों की सारी कमाई बस किसी तरह पेट भरने में निकल रही थी. फिर ऐसा समय आया कि खाने को रोटी न बची.
ऐसी ही एक क्रुद्ध सुबह पेरिस की महिलाएं अपने घरों से निकलकर बाज़ार की सड़कों तक पहुंच गईं. फ्रांस के पुरुष राजा को संविधान से बांधने की जद्दोजहद में लगे हुए थे. मगर भूखे पेट रहकर कोई क्या करता भला? सड़क पर जमा हुई औरतों की संख्या बढ़ने लगी और इनमें कुछ क्रांतिकारी भी आ मिले. ये भीड़ हज़ारों की बन गई और पेरिस की औरतों के नेतृत्व में राजा के महल की ओर बढ़ने लगी.
पेरिस से 20 किलोमीटर दूर वर्साए में राजा लुई XVI का महल था. वर्साए एक भव्य जगह थी. बड़े-बड़े महल और ऐसे बाग़, ऐसी फुलवारियां जिन्हें देखो तो आंखों में न समाए. मगर मिट्टी से सने कपड़ों में महिलाएं आईं और 2,153 कमरों वाले इस महल में भीड़ बनकर घुस पड़ीं.
फ्रांसीसी समाज में औरतों को घर पर रहकर खाना बनाना और पुरुषों की बात मानना सिखाया गया था. मगर ठीक उस वक़्त उन औरतों को पता था कि उन्हें क्या करना है. घंटों चले संघर्ष के बाद राजा, रानी और उसके साथ रहने वाले लोगों को भव्य महल खाली करना पड़ा. और इस तरह फ्रांस की क्रांति ही नहीं, फ़्रांस के संपूर्ण इतिहास के सबसे बड़े दिनों में से एक घटा- वर्साए पर औरतों का कूच.
वो 1789 का फ्रांस था. ये 2021 का भारत है.
*
सर्वोच्च कोर्ट और देश के सर्वोच्च जज CJI बोबडे ने जज की कुर्सी पर बैठने से पहले पढ़ाई की होगी, कई इम्तेहान क्लियर किए होंगे. किताबों में फ़्रांस की क्रांति का चैप्टर भी ज़रूर पढ़ा होगा. इसके बावजूद उन्हें ये लगना कि विरोध प्रदर्शनों में औरतों की जगह नहीं होती, दुखद है.
11 जनवरी 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने किसान प्रोटेस्ट पर सरकार से जवाब तलब किया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया SA बोबडे, जस्टिस AS बोपन्ना, और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की बेंच ने सुनवाई की. इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने से पहले सरकार ने किन लोगों से सलाह ली, ये समझ नहीं आ रहा. कई राज्य विरोध प्रदर्शन में उठ खड़े हुए हैं.
इसी सुनवाई के दौरान CJI बोबडे ने एक स्टेटमेंट दी जिस पर बहस छिड़ गई है. सुनवाई के दौरान किसानों की एक यूनियन का प्रतिनिधित्व करते हुए सीनियर एडवोकेट HS फूलका से CJI बोबडे ने कहा,
मिस्टर फूलका, लोग उत्तेजित हैं. लेकिन आप उनसे वापस जाने को कहिये. ठण्ड है. COVID है. वृद्ध लोगों का प्रोटेस्ट की जगह पर होना ज़रूरी नहीं. आप उन्हें वापस जाने के लिए मनाइए. हो सकता है आने वाले समय में हम ये ऑर्डर में कहें कि बूढ़े लोग और महिलाएं प्रोटेस्ट की जगह पर मौजूद न रहें.
LiveLaw के ट्वीट के अनुसार CJI ने कहा,
‘हमें ये समझ नहीं आ रहा कि बूढ़े लोगों और महिलाएं को प्रोटेस्ट्स में क्यों रखा गया है’.
'रखा' किन्हें जाता है?
CJI बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे. आंदोलन के जारी रहने को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं. लेकिन इन्हीं बातों के बीच भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वेसर्वा ने ये भी तो पूछा है कि महिलाओं और वृद्ध लोगों को प्रोटेस्ट की साइट पर ‘रखा’ क्यों गया है. गोया वो लोग न हों, मिट्टी के खिलौने या कठपुतलियां हों. जिन्हें जहां मर्जी रख दिया गया, जहां से मर्जी उठा लिया गया.
जब CJI ने कहा,
मैं ये रिस्क लेना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि आप उन्हें बताएं कि CJI ने उनसे वापस जाने को कहा है. उन्हें मनाने की कोशिश करिए.
CAA प्रोटेस्ट के दौरान योगी आदित्यनाथ का दिया एक बयान याद आता है. जिसमें उन्होंने कहा था,
‘प्रोटेस्ट करने वालों ने महिलाओं को सड़क पर बिठाना शुरू कर दिया है. बच्चों को बिठा दिया है. ये इतना बड़ा अपराध है कि मर्द तो रजाई में सो रहे हैं और महिलाएं सड़कों पर बिठा दी गई हैं. ये कितना शर्मनाक है’.
CAA-NRC के विरोध में चल रहे प्रोटेस्ट्स में महिलाओं की संख्या देखने लायक रही थी. ख़ास तौर पर शाहीन बाग़ में मौजूद महिलाओं का विरोध खूब सुर्ख़ियों में रहा. लेकिन भारत देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का मानना है कि महिलाएं अपनी मर्जी से विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बन ही नहीं सकतीं. उनके पति/पिता/घर के पुरुष उन्हें भेजेंगे, तब ही वो कहीं जाएंगी.
इस बयान में एक विश्वास छिपा था. कि किसी पुरुष से ये कहना कि वे तो घर बैठे हैं जबकि उनकी पत्नियां बाहर हैं, पुरुषों के पौरुष को चोट पहुंचाएगा. उनके लिए शर्मिंदगी की बात बनेगा.
*
बात एक बार फिर से CJI की. CJI ने सरकार से तीखे सवाल पूछे. तमाम जिम्मेदारियों के साथ न्यायपालिका का एक फ़र्ज़ ये भी है कि वो सरकार के साथ चेक एंड बैलेंस का सिस्टम बनाकर रखे. सुप्रीम कोर्ट का सरकार से तीखे सवाल पूछना काबिल-ए-तारीफ़ है.
लेकिन इससे इस बात पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि जस्टिस बोबडे को लगता है औरतों और वृद्ध अपनी मर्ज़ी से नहीं. बल्कि किसी के कहने से प्रोटेस्ट में बैठे हैं.
CJI बोबडे के इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी वकील इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट करके कहा,
‘चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, मैं एक महिला हूं, ‘उम्रदराज’ हूं, लॉयर हूं लेकिन मैं प्रोटेस्ट में जाऊंगी अगर वो सही वजहों से हो रहा है तो’.
CPI (ML) की नेता कविता कृष्णन ने भी CJI के इस बयान को आड़े हाथों लिया. ट्वीट करके लिखा,
जो महिलाएं CJI को जवाब देना चाहती हैं, मैंने उनसे कुछ बेहद ही रंगीले और क्रिएटिव शब्द सुने पंजाबी में.
जब एक यूजर ने पूछा इसके पीछे की वजह क्या है तो कविता कृष्णन ने ट्वीट किया,
क्योंकि महिलाओं की जगह प्रोटेस्ट्स में है, सड़कों पर है. और महिला किसानों को ये बताना कि प्रोटेस्ट्स में शामिल होने के लिए ठण्ड बहुत है केवा उनको नीचा दिखाने की कोशिश है. ये बेवकूफी है, क्योंकि वही महिला किसान पंजाब के इससे भी ज्यादा ठंडे खेतों में काम करती हैं.
न्यूरोसाइंटिस्ट और लेखक डॉक्टर सुमैया शेख ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए लिखा,
आप सोचेंगे कि इतने पढ़े लिखे इंसान को लेबर क्लास में होने वाले जेंडर डाइनेमिक्स की थोड़ी समझ होगी. केवल मिडल, अपर मिडल क्लास और उससे ऊपर के लोग परम्परा और धर्म के नाम पर अपनी महिलाओं को घर में बंद रखने की बात कर सकते हैं.
याद रहे कि औरतों के साथ होने वाले हर तरह के अन्याय की सूरत में वो इसी न्यायपालिका की ओर देखती हैं.
विरोध करने वाली महिलाएं 
ऑक्सफैम (Oxfam) की साल 2018 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में जितनी भी महिलाएं आर्थिक रूप से सक्रिय हैं (पैसों का लेन देन, उत्पादों/सुविधाओं की खरीद-बिक्री इत्यादि करना). उनमें से 80 फीसद कृषि के क्षेत्र में हैं. ग्रामीण भारत की 85 फीसद महिलायें किसी न किसी रूप में कृषि के क्षेत्र में काम कर रही हैं. इकॉनोमिक सर्वे 2017-2018 के मुताबिक जैसे जैसे पुरुष आजीविका के लिए शहरों की तरफ जा रहे हैं, गांवों की खेती-बाड़ी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है.
Women Farmers At Tikri 2 टिकरी बॉर्डर पर विरोध में हिस्सा लेतीं महिला किसान. (तस्वीर: PTI)

यही नहीं. महिला किसानों की भी शिकायतें हैं. साल 2020 में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में महिला किसानों ने बताया कि उन्हें किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. एक किसान गुरमेल कौर ने बताया ग्रामीण किसान महिलाओं को कई तरह की असमानताओं का सामना करना पड़ता है. खेती से जुड़े कामों में उनसे पूरा काम करवाया जाता है, लेकिन पैसों, बैंक अकाउंट्स के मामलों में उन्हें भागीदार नहीं बनाया जाता. वहीं हरिंदर कौर नाम की किसान ने बताया कि काम भले ही वो कुटना भी कर लें, उन्हें किसानों को मिलने वाले बेनेफिट्स से वंचित रहना पड़ता है, क्योंकि आधिकारिक कागजों में उनका पेशा किसानी नहीं लिखा होता.
महिलाएं भी किसान हैं. किसानों की बेटी/बहू/मां/बहन/रिश्तेदार भर नहीं हैं. देश की नागरिक हैं. प्रोटेस्ट में उन्हें ‘रखे’ जाने की बात उनकी फैसले लेने की क्षमता पर, उनके स्वतंत्र भागीदारी करने, अपनी समस्याओं को आवाज़ देने के हक़ का अपमान है.

Advertisement

Advertisement

()