10 बजे तक सो रही हो, ससुराल में जब 7 बजे से किचन में लगना पड़ेगा तब पता चलेगा.कुछ पापा की परियों को छोड़ दें तो लगभग हर मिडिल क्लास लड़की को ये वाक्य बोलकरजगाया जा चुका है. और जिन्हें नहीं जगाया गया, उनसे मुझे बहुत जलन है. लेकिन उनकेघर वालों के लिए बहुत सम्मान है. एक बड़ी प्यारी लाइन मैंने कहीं पढ़ी थी. और मेरेबिल्ले ने इसपर मेरा भरोसा बढ़ाया- if you love someone, let them sleep. अगर किसीसे प्रेम करते हो तो उन्हें सोने दो. पंखा बंद करके झाड़ू मत लगाओ यार उस कमरे में. खैर ये सब तो हैं बेकार की बातें. झाड़ू कमरे में समय से लगना ज़रूरी है, चाहे आपअपने लैपटॉप में तीन फ़िल्में निपटाकर सुबह 6 बजे सोये हों. अपने बच्चों को समय सेजगाने के लिए आप कुछ भी कर लें. बड़ी होती बेटियों को दुनिया के तौर तरीके सिखानेज़रूरी हैं, आप सिखाएं. घर के काम सिखाएं, बैंक के काम सिखाएं, गाड़ी का टायर बदलनासिखाएं. मगर कुछ बातें ऐसी हैं जो आपको बिलकुल नहीं बोलनी चाहिए. पहली बात अरे आप अपनी बेटी को सभी तरह के शऊर सिखाइए. मगर इसलिए सिखाइए क्योंकि उसे एक दिनघर से बाहर निकलना होगा, पढ़ाई के लिए, नौकरी के लिए. ऐसा क्यों है कि 'एडल्टवर्ल्ड' की परिभाषा आपने लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग गढ़ रखी है. आपको ऐसाक्यों लगता है कि ससुराल जाकर ही आपकी बेटी दुनिया भर के स्ट्रगल सीख पाएगी. आपउससे ये क्यों नहीं कहते कि खाना बनाना सीख लो, वरना मेस का का खाना खाना पड़ेगा. दूसरी बात सुनना सीखो, सहना सीखो. पीरियड क्रैंप्स हैं, थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो.आगे चलकर बच्चा करोगी तब तो और दर्द होगा. भाई ये कैसी बात हुई कि फ्यूचर में पेनहोगा तो मैं अभी पेन किलर न खाऊं. क्या आप अपने बेटे को बोलते हैं कि अभी फ्रैक्चरहै तो इलाज मत करवा, 50 की उम्र के बाद तो हड्डियां कमज़ोर हो ही जाएंगी. और बातकेवल फिजिकल दर्द सहने की नहीं. पड़ोसी से न लड़ो, सड़क पर उल्टा-सीधा चलने वालों सेमत लड़ो, दुकानदार से मत लड़ो, क्लास के लड़कों से मत लड़ो, किसी रिश्तेदार ने कुछउल्टा-सीधा बोल दिया है तो चुप रहकर सुन लो, दादी की दकियानूसी बकवास सुन लो. थोड़ाएडजस्ट करना सीखो. चुप रहना सीखो. काश इसके बजाय अपनी बेटियों को बोलना सिखाते तोकभी ऑफिस में, कभी पराये शहर में मकानमालिक के यहां, कभी किसी सीनियर के द्वारा,कभी फेसबुक पर किसी फ्रॉड के द्वारा उसे बेवकूफ न बनाया जा रहा होता. चुप रहने कीजगह अगर आप अपनी बेटी को सवाल पूछना सिखाएंगे तो वो देश की बेहतर नागरिक बनेगी.बशर्ते आप उसे खुद एक नागरिक मानते हों, दान में दी जाने वाली भेड़-बकरी नहीं. तीसरी बात मम्मी मैं ऋषिकेश चली जाऊं. नहीं. पति के साथ जाना. ये सब कपड़े पति केसामने पहनना. ये शौक पति पूरे करवाएगा. पति खिलाने ले जाएगा तुम्हें उम्हारी पसंदका सब चटर पटर. और कमाल की बात तो है ये कि ये सब बात कहते हुए मम्मियां मन ही मनक्यूट भी फील कर लेती हैं. आपको लिटरली कोई आईडिया नहीं है कि पति कैसा व्यक्तिहोगा. एक लड़की को हम सक्षम बनने के लिए क्यों नहीं कहते कि वो खुद कमाकर अपने शौकपूरे कर ले. क्यों हमें उसके पति और पति की इनकम को बीच में लेकर लाना ज़रूरी है. इससे ये पता चलता है कि आज के दौर में भी लड़कियों के करियर और प्रोफेशन को हम बसउनके साइड काम की तरह देखते हैं. और प्राइमरी काम आज भी बीवी और बहू की भूमिका कोमानते हैं. वो एक गाना है न, मैनू लैंगा लै दे मैंगा, या फिर चिट्टियां कलाइयांजिसमें लड़की कहती है कि तू मुझे शॉपिंग करा दे. फ्रैंकली, उस हिरोइन के पेरेंट्स नेअगर उसे खुद कमाने के लिए लिए ट्रेन किया होता तो वो पति के भरोसे नहीं होती. चलोबहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई. ये वो वाक्य है जो बेटी के लिए दूल्हा फाइनल करने केबाद कही जाती है. जबसे बेटी पैदा होती है, उसकी शादी की टेंशन आप सर पर ले लेतेहैं. ये वही देश है जहां आज भी लोग बेटों की चाह में बेटियों को गर्भ में मार रहेहैं और उसके पीछे यही मानसिकता है. इस बात से आप ऑफेंड होंगे. कहेंगे हम अपनी बेटीको बोझ समझें, ऐसा हो ही नहीं सकता. लेकिन जिस दिन आप उसकी शादी को अपने जीवन कालक्ष्य बना लेते हैं, उसी दिन आप अनकहे तौर पर बेटी को बोज बना लेते हैं. एकप्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर दो, शादी में काम आएगी. यहां पैसा लगा दो, बेटी की शादीमें निकालना. कमाल की बात है कि अधिकतर परिवारों में बेटी के पैदा होते ही ख़यालउसकी शादी का आता है, उसके करियर का नहीं. और उससे भी कमाल की बात ये है कि उसकीशादी की टेंशन के बीच आप अपना खुद का रिटायरमेंट भी प्लान नहीं करते. चौथी बातइसी से जुड़ी है वो चौथी बात जो आपको बेटियों से कहनी बंद कर देनी चाहिए- "आगे चलकरशादी भी करनी है". हर परिवार आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं होता कि अपने बच्चों कीहर डिमांड पूरी करे. मां-बाप हमें बड़ा करते हैं तो खुद अपनी इच्छाओं का गला घोंटदेते हैं. तब जाकर हमारे लिए सेव करते हैं. मगर बच्चों की डिमांड को आप क्या कहकरनकारते हैं, ये भी सोचने वाली बात है. लड़का हो तो कहते हैं, इतनी हमारी हैसियत नहींहै, बहन की शादी भी करनी है. लड़की से कहते हैं, या तो तुम्हारे शौक पूरे कर पाएंगे,या तुम्हारी शादी करवा पाएंगे. लड़के के ऊपर एक अनकहा बोझ रहता है कि वो जल्दी कमानाशुरू करे जिससे बहन की शादी अच्छे से हो सके. यकीन मानिए, कोई भी बेटी ये नहींचाहेगी कि आप अपने शौक पूरे नहीं कर पाए क्योंकि आपको अपनी बेटी की शादी करनी थी. पांचवी बात अब आती हूं पांचवीं और उस फाइनल बात पर. जो मुझे लगता है बेटियों से कभीनहीं कही जानी चाहिए. अक्सर मम्मी या फिर पापा मम्मी के ज़रिये बेटियों को येकहलवाते हैं कि वज़न घटा ले, शादी करनी है. या वेट बढ़ा ले, शादी करनी है. लासिकऑपरेशन करवाकर इसका चश्मा हटवा दो, वरना शादी में दिक्कत होगी. बाल छोटे मत रखो,शादी में दिक्कत होगी. दांतों को तार बंधवाकर सीधा कर लो, वरना शादी में दिक्कतहोगी. अब बड़ी हो रही हो, ठीक से रहा करो. जवान होती कोई भी लड़की सबसे ज्यादा अपनीबॉडी को लेकर कॉन्शियस रहती है. उसकी बॉडी में बदलाव आ रहे हैं. बाज़ार और टीवी केविज्ञापन उसके लिए पहले ही सुन्दरता के ऐसे मानक तय कर चुके हैं जिनके बराबर वो खुदको नहीं पा रही है. उसमें आप ही बेटी को उसकी बॉडी के बारे में कॉन्शियस कर देंगेतो तो उसके कॉन्फिडेंस का क्या होगा? आप एक्चुअली अपनी बेटी को एक ऐसी चीज़ के लिएतैयार कर रहे हैं जो उसके व्यस्क होने के भी कई साल बाद होने वाली है. इन फैक्ट आपउसको नुमाइश के लिए तैयार कर रहे हैं, कि ग्राहक उससे निराश न हो. आप अगर खुद हीअपनी बेटी को एक सुंदर गुडिया में तब्दील कर देंगे तो अगले के लिए भी वो एक वस्तुही रह जाएगी. तो आप सोचिएगा इन पांच बातों के बारे में. और ये भी सोचिएगा कि अगरआप अपनी बेटी से सचमुच प्रेम करते हैं तो क्या आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य उसकीशादी और उसे अच्छी बहू बनाना होना चाहिए. अपनी राय लिखिए कमेंट बॉक्स में.