दिल्ली आबकारी नीति मामले से जुड़ा विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. अरविंद केजरीवालने घोषणा की है कि वह अब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश नहीं होंगे.उन्होंने कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उनकी उम्मीद नहीं है. आज काशो इसी मामले पर केंद्रित है कि आखिर यह मामला है क्या? हम हालिया विवाद और इतिहासके पन्नों को खंगालेंगे. क्या न्यायपालिका के इतिहास में यह पहला ऐसा मामला है, जबकिसी मुवक्किल ने किसी जज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया हो? क्या पहले भी ऐसे मामलेसामने आए हैं, जब किसी जज पर अविश्वास जताया गया हो? क्या न्यायिक व्यवस्था किसीमुवक्किल को अपना जज बदलवाने की इजाज़त देती है? इसके कानूनी पहलू क्या हैं?