भारत की आजादी के ठीक बाद की बात है. भारत और पाकिस्तान दोनों, रियासतों को लुभानेकी कोशिश में थे. ये प्रक्रिया चल ही रही थी कि सरदार पटेल को लक्षद्वीप का ख्यालआया. आधिकारिक तौर पर लक्षद्वीप मद्रास प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था. इसलिए भारतका लक्षद्वीप पर जायज हक़ था. लेकिन जिन्ना की सोच अलग थी. लक्षद्वीप की बहुसंख्यकजनता मुस्लिम थी. इसलिए उन्हें लग रहा था कि उसे पाकिस्तान के हिस्से में आनाचाहिए. उन्होंने पाकिस्तानी नेवी का एक फ्रिगेट शिप लक्षद्वीप की ओर रवाना किया.पाकिस्तानी फौज पहुंची तो उन्होंने देखा कि वहां भारत का झंडा लहरा रहा था. भारतपाकिस्तान से पहले ही लक्षद्वीप पर अपना हक जमा चुका था. लेकिन मामला बिलकुल उन्नीसबीस था. उस समय अगर सही वक्त पर सरदार पटेल ने भारत की नेवी शिप को लक्षद्वीप केलिए रवाना नहीं किया होता तो संभव था कि लक्षद्वीप पाकिस्तान के हिस्से में आ जाता.लक्षद्वीप की ही तरह अण्डमान-निकोबार का सवाल भी था. लेकिन यहां कमान संभालने वालेथे सरकार में सरदार पटेल के साथी, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू. पाकिस्तानअण्डमान-निकोबार को छोड़ने की फिराक में कतई नहीं था. उसका कहना था कि बंगाल की खाड़ीमें होने के चलते अण्डमान-निकोबार उसे दिया जाना चाहिए, लेकिन फिर नेहरू की चाल नेपाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर दिया. अण्डमान-निकोबार कैसे भारत का हिस्सा बने.इसी से जुड़ी है हमारी आज की कहानी.