किताबवाला के इस साप्ताहिक एपिसोड में, सौरभ द्विवेदी ने गजेंद्र हल्दिया के जीवनऔर मूल्यों के आधार पर प्रकाशित पुस्तक में उन पर लिखे निबंधों के लेखकों से बातचीतकी है. श्री अशोक लवासा, प्रोफेसर सेबेस्टियन मॉरिस और गजेंद्र हल्दिया के भाई श्रीपृथ्वी हल्दिया ने इस बातचीत में अपनी हिस्सेदारी दी और गजेंद्र हल्दिया के बारेमें अपने अनुभवों को साझा किया है. वे एक ऐसे नौकरशाह थे जिन्होंने अपनी शानदारपोस्टिंग और सेवानिवृत्ति संपत्तियों को छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें दृढ़ता सेसार्वजनिक कल्याण के लिए काम करना था. सिविल सेवकों, पत्रकारों के एक समूह द्वारालिखित, गजेंद्र हल्दिया होने की कठिनाई के निबंध न केवल भारत के बुनियादी ढाँचे केकई क्षेत्रों में उनके योगदान के दृष्टिकोण के साथ आते हैं, बल्कि नीति प्रशासन,सार्वजनिक निजी साझेदारी के कार्यों में भी उनकी साझेदारी (पीपीपी) की बात भी करतेहैं. उनके योगदान में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (फेमा) का मसौदा तैयारकिया गया है, जिसमें बिजली अधिनियम, 2003, साथ ही विभिन्न बुनियादी ढांचेपरियोजनाओं के लिए कई मॉडल समझौते भी शामिल हैं. यह किताब विभिन्न सरकारीपरियोजनाओं की सफलता सुनिश्चित करने के लिए हल्दिया के असाधारण जुनून का खुलासाकरती है। यह रोजमर्रा की ताकत की एक अंतर्दृष्टिपूर्ण कहानी है. इस पुस्तक मेंसिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थान लबासना में 30 से अधिक वर्षों के लिए स्वर्ण पदक केलिए उनकी जंग की दास्तान है. आप इस बातचीत में गजेंद्र हल्दिया के निजी व्यक्तित्वमें भी दाखिल होते हैं कि वे बतौर इंसान चीजों को लेकर कितनी विशेष दृष्टि रखते थे,मसलन होटल में अपने लिए हमेशा कम्बल और बेडशीट लेकर जाना, काम के प्रति भरपूरअनुशासन से भरे ब्यूरोक्रेट गजेंद्र हल्दिया के ब्यौरे. देखिए वीडियो.