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यतीन्द्र मिश्र: किताबें उसी तरह हैं जैसे जीने के लिए सांसें

'द लल्लनटॉप' से ख़ास बातचीत.

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लल्लनटॉप
9 नवंबर 2016 (Updated: 9 नवंबर 2016, 01:14 PM IST)
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यतीन्द्र मिश्र कवि हैं. संपादक हैं. संगीत और कला में गहरी रूचि रखते हैं. इनके अब तक तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. 'ड्योढ़ी पर आलाप' ख़ासा चर्चित रहा. संगीत पर कई किताबें लिख चुके हैं. हाल ही में उन्होंने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के ऊपर किताब लिखी है. लता सुर-गाथा. इसके अलावा शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर एक किताब लिखी है. प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मान सिंह पर इनकी एक पुस्तक देवप्रिया प्रकाशित हुई है. इसके अलावा यतीन्द्र मिश्र भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार और हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं.  'द लल्लनटॉप'  ने बात की यतीन्द्र से: 1. आपने लता जी पर एक खूबसूरत किताब लिखी है: लता सुर-गाथा. उनसे अपनी मुलाक़ात के बारे में कुछ बताइए. लता जी से तकरीबन 15-20 सालों से पारिवारिक संबंध है. मैं व्यक्तिगत तौर पर उनसे बहुत प्रभावित हूं. वे किसी गंधर्व का पुनर्जन्म लगती हैं. 2. लता जी के व्यक्तित्व के बारे में आपका क्या कहना है? मानवीय गरिमा के जितने रूपक हो सकते हैं वो उनमें मौजूद हैं. वो खुद संगीत का एक शास्त्र हैं. चाहे गीत हों, भजन हों सबमें वो सुरों से खेलती हैं. वो कहा जाता है न कि मुख में सरस्वती का विराजमान होना. ऐसा ही कुछ उनके साथ है. 3. वर्तमान संगीत को उनके दौर के संगीत की तुलना में कहां पाते हैं? मुझे लगता है किसी भी तरह की तुलना गलत होगी. इस दौर के संगीत में भी बहुत से प्रयोग हो रहे हैं. जिनके बारे में आने वाले समय में अच्छे से मूल्यांकन किया जा सकता है. जैसे आज हम लता जी के बारे में अच्छे से बात कर पा रहे हैं. हो सकता है इस दौर के बारे में आगे बात की जाए और कहा जाए ये दौर प्रयोगधर्मी था. लेकिन फिर भी आजकल लता जी के दौर वाली बात कहीं तो मिसिंग है. 4. कहा जाता है आजकल किताबों का स्पेस कम हो रहा है. घरों में किताबों का कोना कम ही दिखाई देता है. किताबों के बारे में आपका क्या मानना है? किताबें उसी तरह हैं जैसे जीने के लिए सांसें. किताबें खुद को खोजने, टटोलने में मदद करती हैं. लिखने के तरीके बदल गए हैं. वेब की दुनिया में लिखा जा रहा है. सोशल मीडिया, वेबसाइट्स पर काफी कुछ मौजूद है. माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन छपे हुए शब्दों की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी. 5. सोशल मीडिया पर बहुत सा साहित्य लिखा जा रहा है. इस पर बहस है कि ये साहित्य के मानकों पर खरा नहीं उतरता. आपका क्या कहना है ? सोशल मीडिया पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसे सेंसर तो नहीं किया जा सकता और किया भी नहीं जाना चाहिए. एक चीज जरूर है कि लेखक खुद ही समझे कि उसे क्या लिखना चाहिए और क्या नहीं. यही बात पाठकों पर भी लागू होती है. उन्हें भी ये जानना चाहिए कि क्या पढ़ने लायक है और क्या नहीं. उन्हें अच्छे और बुरे की पहचान होनी चाहिए. 6. आपको किन किताबों और लेखकों ने प्रभावित किया? आपके पसंदीदा लेखक या कवि कौन हैं? मुझे लेखकों में निर्मल वर्मा बहुत पसंद हैं. इसके अलावा कृष्णा सोबती को पढ़ता हूं. राजनीतिक लोगों में राममनोहर लोहिया को पढ़ना पसंद है. कवियों में श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, मुक्तिबोध पसंद हैं. तुलसीदास, मीराबाई को पढ़ना अच्छा लगता है. 7. अंत में, आज के दौर कविताओं की प्रासंगिकता पर क्या कहना चाहेंगे? कविताएं तो हमारी उदात्त अभिव्यक्ति हैं. कुछ भी जो हम महसूस करते हैं उसे आसानी से अभिव्यक्त करने के लिए कविता की ज़रुरत होती है. फिर चाहे वो गीत के रूप में बाहर आए, ग़ज़ल के रूप में या कविता के रूप में. जब भी किसी भाव को शब्दों की ज़रुरत होती है कविता हमारा साथ देती है.

ये स्टोरी निशान्त ने की है.


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