मनीषा श्री, नाम, काम और नेचर से घोर देसी हैं. ऐसा दावा करती हैं लेकिन परिवार औरकाम के फेर में देश से दूर हैं. मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में रहती हैं. पढ़ाईटेक्निकल थी लेकिन दिल साहित्यिकल, सो नौकरी की गाड़ी में ब्रेक लगाया और दिल सेदोस्ती निभाते हुए सिर्फ लिख रही हैं. नोट बंदी के जमाने से पहले ही 'ज़िंदगी कीगुल्लक' नाम की एक किताब लिख डाली. लेखन के खाते में वही बड़ा नोट है. अब वो न तोकाव्य संग्रह है और ना कहानियां. मनीषा की मानें तो कविताओं की कहानियां है. ये वोजिद्दी कविताएं हैं जो कहानियों के साथ आई हैं. हमारे बीच का कोई दूर रहता है तोअपना हाल लिख भेजता है. वहां का हाल भेजता है. ये खिड़की होती है, जिससे हम भी थोड़ीसी दुनिया देखने की कोशिश करते हैं. मनीषा जो भेजेंगी वो 'यादों की रेजगारी'कहाएगी. हम आपके लिए लाते रहेंगे, आज पहली किस्त पढ़िए.--------------------------------------------------------------------------------जियोलॉजिस्ट बाय चांस पता नहीं यह ज़िंदगी का दस्तूर है, ज़रूरत या फ़िर हर बार बिना भूला हुआ कोई इत्तेफ़ाकमगर जब भी कोई नया काम शुरु किया है तो घर के अंदर और बाहर सब जगह एक ही सवाल गूंजाहै, ऐसा करके क्या उखाड़ लोगी? स्कूल के बाद जब दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेजमें जियोलॉजी ऑनर्स में एडमिशन लिया तो भी सब लोग चकित से ज्यादा या तो परेशान थे,नहीं तो उदास. कारण इस सब्जेक्ट के बारे में लोगों की कम जागरूकता कह लें जो बिनाजांच-पड़ताल के उसे साइंस सब्जेक्ट्स की लिस्ट में थोड़ा डाउन मार्केट बना देता है.खैर जो भी, हमने तो जियोलॉजी ऑनर्स कर लिया मगर घर और बाहर वाले अभी भी हम परविश्वास से ज्यादा सब्जेक्ट्स का स्कोप ढूंढ़ रहे थे, मगर डायरेक्टली कभी भी किसी नेखुलकर नहीं पूछा कि बीएससी के बाद क्या इरादा है? हमने भी कभी नहीं समझाया क्योंकिख़ुद भी ठीक से नहीं जानती थी बस साल दर साल पढ़े जा रही थी. बस यह पता था किडिस्कवरी चैनल वाले हमारे सब्जेक्ट को बहुत पसंद करते हैं और हर दूसरा प्रोग्रामअर्थ साइंस से जुड़ा होता है. स्पेशली वॉल्कैनिक इरप्शन वाला. ज़िंदगी आगे बढ़ी औरहमने भी यार दोस्तों और सीनियर्स के इंस्ट्रक्शन को फॉलो करते हुए आईआईटी का एक्जामदिया. और रुड़की ने अपना विशाल शताब्दी द्वार हमारे लिए खोल दिया. क़िस्मत हमारीमेहनत की हमेशा रिस्पेक्ट करती है. अब सब ख़ुश थे. घर वाले भी और बाहर वाले भी. कलतक का डाउन मार्केट सब्जेक्ट अचानक अपमार्केट हो गया था. लोग हमसे अपने बच्चों केफ्यूचर को डिस्कस करने लगे. जो ख़ुद अभी तक समझ नहीं पाई थी की जियोलॉजी पढ़कर उसकाकरना क्या होगा. मगर आईआईटीयन होने के अलग फायदे हैं. समाज आपको रातोंरात चाणक्यबना देता है. चलिए रुड़की के दिन भी बीतने लगे. अब हाई टाइम था भइया. मस्ती बहुत होगई. बिना नौकरी घर लौटने का ऑप्शन आईआईटियंस के लिए नहीं बना है. यहां रसगुल्लाखाने के लिए गिस्सू बनाना पड़ता है जो बाहर वालों को नहीं दिखता. सब सोचते हैं, JAMऔर JEE के रैंक के साथ ही जॉब ऑफर लेटर मिलता है. अम्मा हमें भी रिसेशन की मार सहनीपड़ती है. एक तो वैसे ही सब्जेक्ट स्कोप को लेकर कॉन्फिडेंस नहीं बन रहा था. बस येपता था की विदेशी ऑयल कंपनी काफ़ी तगड़ा पैकेज देती है. इसलिए बीटेक की एक से बढ़कर एकलड़कियों को अर्थ साइंस के फालतू लड़कों में भी काफी दिलचस्पी होती है. मगर ऑयलप्राइस के धड़ल्ले से क्रैश होते नंबर्स ने रही सही कसर भी पूरी कर दी. ले दे करमुकेश अंबानी को हम पर तरस आया और RIL प्लेसमेंट के लिए आई. मगर उनको फील्ड वर्क केलिए कैंडिडेट्स चाहिए थे. पहली बार लड़की होने का दुःख हुआ. और फिर यह दुःख कई बारहुआ है. मगर मां के 21 वैभव लक्ष्मी के व्रत काम कर गए और मेरा प्लेसमेंट सीधामिनिस्ट्री ऑफ ऑयल एंड गैस में हुआ. काम करते-करते काम का मक़सद, उसका स्कोप और उससेहमारी मोहब्बत का आगाज़ हुआ. छोटे में समझाऊं तो जियोलॉजी से प्यार नहीं अरेंज मैरेजहुआ. इसलिए पहले रिश्ता, फिर शादी और बाद में प्यार हुआ. यह बात सच है की जियोलॉजीमें लडकियां कम हैं. क्यों कम हैं इसपर मैं अभी रिसर्च कर रही हूं. जैसे ही पताचलेगा, आपको बता दूंगी. पिछले 16 सालों में मुझे एक भी ऐसा कारण समझ नहीं आया जो येबताए कि लड़कियां इस सब्जेक्ट के लिए मुनासिब नहीं हैं. मेरी क्लास में 22 लड़कों पर4 लड़िकयां थी. इस वक़्त एक मणिपुर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है. एक 'शेल' में 10 सालसे काम कर रही है. उसने भी शुरूआत में फील्ड पर काम किया है. तीसरी दुनिया की सबसेबड़ी सर्विस प्रोवाइडर 'Schlumberger' के साथ फील्ड इंजीनियर रह चुकी है. और मैं.खुद के मुंह से खुद की क्या तारीफ करूं. प्रत्यक्ष को प्रमाण चाहिए क्या? तो कुलमिलाकर सार यह निकलता है की पढ़ाई और काम को लिंग भेद से न जोड़ें. और किसी भी चीज़में बेस्ट होने के लिए पहले उसे करना पड़ता है. करते-करते हर चीज़ गुड, बेटर, बेस्टहो ही जाती है. चांस से जियोलॉजिस्ट बने और चमत्कार पर यक़ीन हो गया. सबको कहांमिलता है चांस और वो भी लड़कियों को.--------------------------------------------------------------------------------मनीषा की किताब खरीदने के लिए यहां जाएं. ज़िंदगी की गुल्लक --------------------------------------------------------------------------------विदेशों से हमारे दोस्त और बहुत कुछ लिख भेजते हैं, पढ़िए.भाषण में कुछ भी बोलने से पहले प्रेसिडेंट ट्रंप को ये पढ़ लेना चाहिएकैसे होता है, कैसे बढ़ता है, कैसे ठीक होता है: कैंसर के बारे में सब कुछकौन कितना कलाबाज: अमरीकी चुनावी सर्कस की अटकलें