भारत के मुसलमान यहूदियों से इतनी नफरत क्यों करते हैं?
डायरेक्टर अब्बास टायरवाला कहते हैं, 'मुस्लिम बनिए, मूर्ख नहीं.'
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प्रतीकात्मक इमेज.
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एक साहब हैं. अब्बास टायरवाला. 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' और 'मक़बूल' जैसी फिल्मों के लेखक. 'जाने तू या जाने ना' जैसी हिट फिल्म को डायरेक्ट भी किया है उन्होंने. अब्बास ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर एक पोस्ट लिखी है. जो यकीनन विचार करने लायक है. भारतीय मुसलमानों से उन्होंने कुछ कहा है. जो कहा है वो सेंसिबल है. पहले उसे ही पढ़ लेते हैं.

अब्बास टायरवाला.
अब्बास टायरवाला ने जो अपने फेसबुक प्रोफाइल पर अंग्रेज़ी में लिखा है, हम उसका अनुवाद दे रहे हैं. वो लिखते हैं"

ये बहुत सेंसिबल बात है लेकिन डर है कि इसकी वजह से अब्बास टायरवाला साहब को गालियां न पड़ जाए. उन तमाम भारतीय मुसलमानों के लिए ये पोस्ट यकीनन सोच का विषय होना चाहिए, जो दुनिया के हर एक यहूदी को अपना दुश्मन मानते हैं. आधार वही फलिस्तीन-इजराइल विवाद है. जिसके चक्कर में तमाम यहूदियों की कंपनियों के प्रॉडक्ट्स का बॉयकॉट करने की बातें होती हैं.
यहां दो बातें हैं. फ़लिस्तीनियों की बदहाली के लिए हर संवेदनशील इंसान के दिल में हमदर्दी होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन इस हमदर्दी का आधार अगर मज़हब है तो ये गड़बड़ सिचुएशन है. सिर्फ फलिस्तीनी ही नहीं, दुनिया के हर हिस्से के शोषितों के लिए हमदर्दी का जज़्बा होना चाहिए. चाहे वो जाफना के शरणार्थी हो, सीरिया के निर्वासित या कश्मीरी पंडित. मानवता सिलेक्टिव नहीं हो सकती. अगर सिलेक्टिव है तो वो मानवता नहीं कुछ और है.

ऐसी तस्वीरें आपने खूब देखी होगी.
यहूदियों से अंधी नफरत तो और भी बड़ी जहालत है. एक मुल्क से नाराज़गी पूरी कौम से घृणा की वजह कैसे हो सकती है? ऐसे तो अगर आईसीस से खफ़ा दुनिया तमाम मुसलमानों को ही दुश्मन मान ले तो? बुरा लगेगा न? ऐन यही बात है. जब भारत का मुसलमान यहूदियों से नफरत की सरेआम घोषणा करता है, तो वो इसी मानसिकता को खाद-पानी दे रहा होता है. कोई भी कौम मुकम्मल तौर पर ख़राब नहीं हो सकती. इस दुनिया को समृद्ध बनाने में हर एक का योगदान है.
मार्क जुकरबर्ग को ही ले लीजिए. वो भी यहूदी हैं लेकिन उनका बनाया फेसबुक भारतीय मुसलमानों समेत पूरी दुनिया के मुसलमान धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. कहने का मतलब ये कि किसी भी कौम से अंधी नफरत कहीं से कहीं तक सही नहीं है. भारतीय मुसलमानों को तो ख़ास तौर से इससे बचना चाहिए. यहूदियों से बेतुकी नफरत का कुछ लाभ तो होता नहीं उल्टे कौम की छवि ही बिगड़ती है.
अब्बास टायरवाला की संजीदा अपील भारत के मुसलमानों की समझ आ जाए बस. वरना सर्कस तो मुल्क में चल ही रहा है.
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अब्बास टायरवाला.
अब्बास टायरवाला ने जो अपने फेसबुक प्रोफाइल पर अंग्रेज़ी में लिखा है, हम उसका अनुवाद दे रहे हैं. वो लिखते हैं"
"मैं चाहता हूं कि भारतीय मुसलमान (इस पोस्ट का) कोई जवाब देने से पहले बहुत सावधानी से सोचें.ये देखिए पोस्ट:
हम अरब नहीं हैं. हम फलिस्तीनी भी नहीं हैं. हमारा मिडल ईस्ट के साथ कोई भी सांस्कृतिक गठबंधन नहीं है. वो लोग हमें अफ़्रीकी-यूरेशियन इतिहास का हिस्सा तक नहीं मानते. और किसी मुगालते में न रहिए, हम हिस्सा हैं भी नहीं.
हम सब लोग एक ही खुदा की इबादत करते हैं इसका सिर्फ इतना ही मतलब है कि हम एक खुदा की इबादत करते हैं. इससे ज़्यादा कुछ नहीं.
तो आपको ऐसा क्यों लगता है कि हर जगह के, ख़ास तौर से इजराइल के, यहूदी किसी भी तरह आपके दुश्मन हैं? मुस्लिम बनिए, मूर्ख नहीं.
#BeMuslimDontBeStipid. इस हैशटैग के साथ ये मेरी पहली पोस्ट है. मैं और लिखूंगा. अगर कोई मुझे मार देता है तो ऑलिव और स्नो से कहना, मैंने उनसे बहुत प्यार किया है."

ये बहुत सेंसिबल बात है लेकिन डर है कि इसकी वजह से अब्बास टायरवाला साहब को गालियां न पड़ जाए. उन तमाम भारतीय मुसलमानों के लिए ये पोस्ट यकीनन सोच का विषय होना चाहिए, जो दुनिया के हर एक यहूदी को अपना दुश्मन मानते हैं. आधार वही फलिस्तीन-इजराइल विवाद है. जिसके चक्कर में तमाम यहूदियों की कंपनियों के प्रॉडक्ट्स का बॉयकॉट करने की बातें होती हैं.
यहां दो बातें हैं. फ़लिस्तीनियों की बदहाली के लिए हर संवेदनशील इंसान के दिल में हमदर्दी होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन इस हमदर्दी का आधार अगर मज़हब है तो ये गड़बड़ सिचुएशन है. सिर्फ फलिस्तीनी ही नहीं, दुनिया के हर हिस्से के शोषितों के लिए हमदर्दी का जज़्बा होना चाहिए. चाहे वो जाफना के शरणार्थी हो, सीरिया के निर्वासित या कश्मीरी पंडित. मानवता सिलेक्टिव नहीं हो सकती. अगर सिलेक्टिव है तो वो मानवता नहीं कुछ और है.

ऐसी तस्वीरें आपने खूब देखी होगी.
यहूदियों से अंधी नफरत तो और भी बड़ी जहालत है. एक मुल्क से नाराज़गी पूरी कौम से घृणा की वजह कैसे हो सकती है? ऐसे तो अगर आईसीस से खफ़ा दुनिया तमाम मुसलमानों को ही दुश्मन मान ले तो? बुरा लगेगा न? ऐन यही बात है. जब भारत का मुसलमान यहूदियों से नफरत की सरेआम घोषणा करता है, तो वो इसी मानसिकता को खाद-पानी दे रहा होता है. कोई भी कौम मुकम्मल तौर पर ख़राब नहीं हो सकती. इस दुनिया को समृद्ध बनाने में हर एक का योगदान है.
मार्क जुकरबर्ग को ही ले लीजिए. वो भी यहूदी हैं लेकिन उनका बनाया फेसबुक भारतीय मुसलमानों समेत पूरी दुनिया के मुसलमान धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. कहने का मतलब ये कि किसी भी कौम से अंधी नफरत कहीं से कहीं तक सही नहीं है. भारतीय मुसलमानों को तो ख़ास तौर से इससे बचना चाहिए. यहूदियों से बेतुकी नफरत का कुछ लाभ तो होता नहीं उल्टे कौम की छवि ही बिगड़ती है.
अब्बास टायरवाला की संजीदा अपील भारत के मुसलमानों की समझ आ जाए बस. वरना सर्कस तो मुल्क में चल ही रहा है.
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