The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Work from home vs work from office: Why are employees winning the battle of the 'hybrid model'?

वर्क फ्रॉम होम vs ऑफिस की बहस में ‘हाइब्रिड मॉडल’ क्यों बन रहा कर्मचारियों की पहली पसंद

'वर्क फ्रॉम होम' और 'वर्क फ्रॉम ऑफिस' की छिड़ी जंग में अब हाइब्रिड मॉडल ही असली सिकंदर है. जानिए क्यों बड़ी टेक कंपनियों के सख्त फरमान के बाद भी कर्मचारी नौकरी छोड़ने को तैयार हैं पर दफ्तर आने को नहीं. क्या वाकई ऑफिस जाने से प्रोडक्टिविटी बढ़ती है या यह सिर्फ माइक्रो-मैनेजमेंट का नया बहाना है? Gen Z और मिलेनियल्स के बदलते रुख का पूरा लेखा जोखा इस खबर में मिल जाएगा.

Advertisement
Work From Home
वर्क फ्रॉम होम vs वर्क फ्रॉम ऑफिस (फोटो- विकिपीडिया)
pic
दिग्विजय सिंह
13 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 11:57 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

मार्च का महीना है. हवा में गुलाल से पहले 'अप्रेजल' और 'इंक्रीमेंट' की खुशबू (या कभी-कभी डर) तैरने लगती है. लेकिन इस साल कॉर्पोरेट गलियारों में चर्चा सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि 'कुर्सी' की हो रही है. 

वो कुर्सी जो ऑफिस के किसी केबिन में रखी है, और वो सोफा जहाँ बैठकर पिछले तीन-चार सालों से करोड़ों भारतीयों ने पूरी दुनिया का काम निपटा दिया.

बड़ी टेक कंपनियों ने 'सख्त फरमान' जारी कर दिए हैं-"ऑफिस आओ, वरना रास्ता देखो." लेकिन जवाब में कर्मचारी कह रहे हैं-"रास्ता देख लेंगे, पर ऑफिस नहीं आएंगे." 

आखिर ये जिद क्यों है? क्या ये सिर्फ आलस है या इसके पीछे कोई गहरा गणित है? चलिए, इसे लल्लनटॉप स्टाइल में विस्तार से समझते हैं.

कंपनियों की 'घर वापसी' वाली जिद और कर्मचारियों का 'विद्रोह'

कोरोना काल में जब दफ्तरों पर ताले लगे, तो लगा कि दुनिया रुक जाएगी. लेकिन लैपटॉप खुले, वाई-फाई कनेक्ट हुआ और काम चलता रहा. बल्कि कई डेटा बताते हैं कि काम पहले से ज्यादा हुआ. 

अब जब सब कुछ सामान्य है, तो गूगल, अमेजन और टीसीएस जैसी दिग्गज कंपनियां कर्मचारियों को वापस डेस्क पर देखना चाहती हैं.

NASSCOM के मुताबिक कंपनियों का तर्क है कि 'कोलाबरेशन' (साथ मिलकर काम करना) और 'कल्चर' (कंपनी की संस्कृति) सिर्फ आमने-सामने बैठकर ही बन सकती है. लेकिन कर्मचारी इसे 'माइक्रो-मैनेजमेंट' का नया रूप मान रहे हैं. 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 10 में से 8 कर्मचारी हाइब्रिड मॉडल (कुछ दिन घर, कुछ दिन ऑफिस) को प्राथमिकता दे रहे हैं.

'कॉर्पोरेट मज़दूर' की असली समस्या: ट्रैफिक और टिफिन का गणित

एक औसत भारतीय प्रोफेशनल के लिए ऑफिस जाने का मतलब सिर्फ 9 से 6 की ड्यूटी नहीं है. इसका मतलब है बेंगलुरु के सिल्क बोर्ड या दिल्ली-गुड़गांव बॉर्डर के ट्रैफिक में अपनी जिंदगी के बेशकीमती 3 घंटे होम करना. 

जब कर्मचारी घर से काम करता है, तो वो ये 3 घंटे या तो ज्यादा सोने में बिताता है या अपने परिवार के साथ.

इसके अलावा, 'लंच ब्रेक' का सुकून भी अलग है. ऑफिस में कैंटीन का ठंडा खाना और घर पर मां या पत्नी के हाथ का गर्म खाना-ये चॉइस बहुत छोटी दिखती है, लेकिन मेंटल हेल्थ के लिए बहुत बड़ी है. 

टॉम टॉम ट्रैफिक इंडेक्स’ (TomTom Traffic Index 2025/26) के मुताबिक मिलेनियल्स (Millennials) और जेन्जी (Gen Z) अब अपनी 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं. उनके लिए काम जिंदगी का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं.

क्या ऑफिस जाने से वाकई प्रोडक्टिविटी बढ़ती है?

मैनेजमेंट का सबसे बड़ा डर यही है कि "घर पर लोग सो रहे होंगे." लेकिन डेटा कुछ और ही कहानी कहता है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के मुताबिक, घर से काम करने वाले कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी में 13% की बढ़ोतरी देखी गई. 

इसकी वजह थी-कम शोर-शराबा, कम ब्रेक और ऑफिस की फालतू राजनीति से दूरी.

वहीं, ऑफिस में 'वॉटर कूलर गपशप' और लंबी मीटिंग्स में काफी समय बर्बाद होता है. जेन्जी कर्मचारी मानते हैं कि अगर काम समय पर और सही क्वालिटी के साथ हो रहा है, तो ये मायने नहीं रखना चाहिए कि वो पजामे में बैठकर किया गया है या फॉर्मल शर्ट में. 

कंपनियों को अब 'इनपुट' (कितने घंटे ऑफिस में बैठे) के बजाय 'आउटपुट' (कितना काम किया) पर ध्यान देना होगा.

 हाइब्रिड मॉडल: बीच का वो रास्ता जो सबको पसंद है

अब सवाल ये है कि क्या ऑफिस पूरी तरह खत्म हो जाएंगे? जवाब है-नहीं. इंसानी जुड़ाव जरूरी है. इसीलिए 'हाइब्रिड मॉडल' इस जंग का विजेता बनकर उभरा है. हफ्ते में 2 या 3 दिन ऑफिस और बाकी दिन घर. इससे कंपनी का रेंट और बिजली का बिल बचता है और कर्मचारी का पेट्रोल और मानसिक शांति.

लिंक्डइन वर्कप्लेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स 2026’ (LinkedIn Workplace Confidence Index 2026) के मुताबिक आजकल की नई जनरेशन यानी जेन्जी के लिए 'फ्लेक्सिबिलिटी' (लचीलापन) सैलरी से भी ज्यादा जरूरी हो गई है. 

कई सर्वे बताते हैं कि अगर किसी कंपनी में वर्क फ्रॉम होम की सुविधा नहीं है, तो टैलेंटेड लोग वहां जॉइन करने से कतरा रहे हैं. यानी अब ताकत कंपनियों के हाथ से निकलकर कर्मचारियों के हाथ में आ गई है.

लैपटॉप तो खुल गया, पर क्या ऑफिस जाना मजबूरी है या जरूरी?

अंत में बात आती है उस सवाल पर जो हर कर्मचारी खुद से पूछ रहा है. अगर आपका काम पूरी तरह डिजिटल है, आपकी टीम अलग-अलग शहरों में बैठी है और आप ऑफिस जाकर भी 'जूम कॉल' ही कर रहे हैं, तो ऑफिस जाना एक 'मजबूरी' से ज्यादा कुछ नहीं है.

‘फॉर्ब्स एडवाइजर’ की रिपोर्ट के मुताबिक अगर आपको नई चीजें सीखनी हैं, नेटवर्किंग करनी है या आप नए-नए करियर शुरू कर रहे हैं, तो ऑफिस जाना 'जरूरी' हो सकता है. कंपनियों को ये समझना होगा कि 'जबरदस्ती' से आप कर्मचारी को कुर्सी पर तो बैठा सकते हैं, लेकिन उसका दिमाग और लगन ऑफिस में नहीं रहेगी. 

ये भी पढ़ें: आपको क्रिएटिव नहीं होने देंगे ChatGPT और Gemini? नई बला 'AI Brain Fry' क्या है?

जीत किसकी हो रही है?

फिलहाल की स्थिति देखें तो कर्मचारी भारी पड़ रहे हैं. बड़ी कंपनियां 'बैक टू ऑफिस' के फरमान वापस ले रही हैं या उनमें ढील दे रही हैं क्योंकि 'टैलेंट वॉर' में टिके रहने के लिए उन्हें लोगों की सुननी पड़ रही है. 2026 का कॉर्पोरेट जगत अब 'कमांड और कंट्रोल' से नहीं, बल्कि 'ट्रस्ट और रिजल्ट' से चलेगा.

लैपटॉप कहीं भी खुले, असली बात ये है कि काम होना चाहिए. और अगर काम बेहतरीन हो रहा है, तो कुर्सी ऑफिस की हो या घर के बालकनी की-क्या ही फर्क पड़ता है? 

वीडियो: घर-घर सामान पहुंचाने वाले गिग वर्कर की कहानी, हर दिन 60 किलोमीटर साइकल से डिलीवरी करते हैं

Advertisement

Advertisement

()