The Lallantop
Advertisement

आज का दिन हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए ऐतिहासिक है

एक धार्मिक स्थल में प्रवेश को लेकर लड़ी गई जंग क्या सिर्फ प्रवेशाधिकार तक ही सीमित थी?

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
मुबारक
29 नवंबर 2016 (Updated: 17 दिसंबर 2016, 01:53 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
ख़बर है कि आज मुंबई के हाजी अली दरगाह में महिलायें प्रवेश करेंगी. लेकिन नहीं, ख़बर ये नहीं है. असली ख़बर ये है कि दरगाह ट्रस्ट ने इस बदलाव को मान लिया है. अब महिलायें भी मज़ार तक जा सकेंगी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दरगाह कमिटी ने उसे अमल में लाने के लिए चार हफ़्तों का समय मांगा था जिसकी मियाद अब पूरी हो गई है. आज करीब अस्सी महिलायें दरगाह में दाखिल होंगी और शांति के लिए दुआ करेंगी. गौरतलब बात ये है कि जून 2012 तक महिलाओं को ये अधिकार प्राप्त था लेकिन बाद में इस पर रोक लगा दी गई. रोक लगाने के लिए मुफ्तियों ने जो तर्क दिये थे वो ना सिर्फ हास्यास्पद थे बल्कि चिढ़ दिलाने वाले थे. औरतों के कपड़े, सुरक्षा वगैरह-वगैरह. लेकिन जो सबसे बड़ा कारण बताया था वो ये कि पहले उन्हें शरीयत के बारे में पता नहीं था. बाद में आलिमों से सलाह के बाद खुला कि औरतों का दरगाह में जाना इस्लाम के खिलाफ़ है. इस निर्णय के विरोध में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई और अब जा के महिलाओं का प्रवेशाधिकार बहाल होने वाला है.
देखने में छोटी सी लगने वाली ये घटना मुस्लिम समाज की जड़ता को तोड़ने की तरफ एक बड़ा क़दम साबित हो सकती है. अपने कई नियम-कानूनों से मूर्खता की हद तक चिपटे रहने वाला और उसकी हिफाज़त के लिए यदा-कदा हिंसक भी हो जाने वाला मुस्लिम समाज अगर कोई खिड़की-झरोख़ा खोलने को राज़ी हो रहा है तो ये भी एक शुभ-संकेत ही माना जाए. कोई भी बदलाव रातो-रात नहीं आ जाता. बदलाव एक लंबी प्रक्रिया है जिसकी एक अहम शर्त ये है कि आप बदलाव के लिए ज़हनी तौर पर राज़ी हो. मुस्लिम समाज में आज तक इस ज़हनी रज़ामंदी की ही कमी थी. अब अगर कुछ ज़मीन हिल रही है तो इसका स्वागत होना चाहिए.
मुस्लिम समाज की मुसलसल आलोचना का आधार ही ये है कि वो 1400 सालों से चली आ रही हर एक प्रथा के प्रति बला का संवेदनशील है. वो उन्हें तर्कों की रोशनी में परखना ही नहीं चाहता. उसके लिए वही अंतिम सत्य है जो 1400 साल पहले लिखा गया. समय के साथ आने वाले परिवर्तनों को क़बूलने की उसकी इच्छा ही नहीं. फिर भले ही कोई प्रथा आज के दौर में बिल्कुल अप्रासंगिक और हास्यास्पद हो. बदलाव की गुंजाइश पर विचार किये बगैर दुनिया से कदम मिला के चलने की उसकी हसरत कभी पूरी नहीं होने वाली.
इस बात के विरोध में ये कहा जा सकता है कि ये बदलाव मुस्लिम समाज के अंदर से नहीं आया है बल्कि जबरन लादा गया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कोई गुंजाइश नहीं बची थी. क़बूल. लेकिन एक फर्क तब भी है. याद कीजिये फेमस शाहबानो केस. उसमे भी सर्वोच्च न्यायालय ने कोई आदेश दिया था जिसके खिलाफ़ मुस्लिम समाज ने भीषण आक्रोश दिखाया था. और उसी आक्रोश से घबरा कर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उस फैसले को ही पलट दिया था. इस बार कम से कम ऐसा नहीं हो रहा है. मुस्लिम जगत बेमन से ही सही कोर्ट का फैसला मान रहा है. सड़कों पर नहीं उतर आया है. ये नहीं कह रहा कि ये उसके अंदरूनी मामलों में दख़लअंदाजी है. इतना भी काफ़ी है फिलहाल.
माना कि एक दरगाह में प्रवेश की इजाज़त भर से कुछ ख़ास नहीं संवरने वाला मुस्लिम कौम का लेकिन कम से कम इससे एक राह तो खुलती ही है. आखिर लंबे से लंबे सफ़र की शुरुआत भी एक छोटे से कदम से ही तो होती है. उम्मीद है कि बदलाव को अनिवार्य मान कर मुस्लिम समाज तीन तलाक़, हलाला, बहुविवाह जैसी कुरीतियों से निजात पा लेगा और यूनिफॉर्म सिविल कोड के दायरे में आने पर गंभीरता से विचार करेगा. ये भी पढ़ें:बधाई हो औरतों, अब पूजा-दुआ करो और किस्मत बदलोइनसे मिलिए, ये औरतों को तलाक़ से बचाने के लिए उनका रेप करते हैं

Advertisement

Advertisement

()