The Lallantop
Advertisement

'हे पटाखे विरोधी मोहतरमा, बकरीद के दिन आप कहां छिप जाती हैं?'

एक महिला एंकर की आपबीती, जिसे सोशल मीडिया पर एंटी हिंदू, धर्मविरोधी और बेकार-पत्रकार कहा गया.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
लल्लनटॉप
3 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 3 नवंबर 2016, 06:36 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
मीनाक्षी कंडवाल. टीवी पर आती हैं. आज तक चैनल पर. एंकर हैं. पहाड़ से आती हैं. इसलिए जल-जंगल-जमीन से बहुत प्यार करती हैं. हर अप्रवासी की तरह कहती हैं, मैं वहीं लौट जाना चाहती हूं.
Image embed

मीनाक्षी

गुलज़ार को अब नई नज्म लिखनी होगी. छोटे छोटे शहरों से, खाली बोर दोपहरों से जो पीढ़ी झोला उठाकर चली थी, अब उसे ये शहर दमघोंटू लगते हैं.
मीनाक्षी और क्या चाहती हैं. किताबें पढ़ना. गाने सुनना. फिल्में देखना. इन सबके बीच वक्त मिलता है तो ट्विटर पर चहलकदमी करती हैं. वहीं पर भटकने के दौरान उनके साथ एक हादसा पेश हुआ. औरों के साथ होते सुना था. मगर पीर तो तभी पता चलती है जब अपने पैर में कांटा लगे. ये कांटा हर वक्त हमारी आपकी आंख के बेहद करीब आ रहा है. देखना, जब तक नजर आए तब तक नजर न चली जाए. पढ़िए, मीनाक्षी को:


एंटी हिंदू ! धर्म विरोधी ! बेकार-पत्रकार !
ये कुछ नए संबोधन हैं जिनसे हाल ही में मुझे सोशल मीडिया (ट्विटर) पर नवाज़ा गया है. मैं पहले कभी सोशल मीडिया की लानत मलानत बहस और तमगों में नहीं पड़ी. इसलिए इस तरह के संबोधनों की आदत नहीं. और जब ये सुनने पड़े तो चिंता में पड़ गई. कुछ डरी. कुछ मजबूर महसूस किया.
मां अकसर कहती है. बेटा कीचड़ में पत्थर नहीं फेंकने चाहिए. छींटे अपने ऊपर भी गिर जाते हैं. मगर अब क्या हो सकता था. सोशल मीडिया पर सक्रिय एक खास ब्रिगेड के ऊपर पत्थर लगा था. मेरे अनजाने ही सही. मैंने तो सिर्फ वो लिखा था, जो मुझे सही लगा था. और फिर क्या हुआ. सभी तथ्यों, सत्यों और वास्तविकताओं के दायरे से दूर जाना पड़ा. कोई बहस नहीं हो रही थी. कुतर्क किए जा रहे थे. जिनका जवाब मुझे तर्कों से देना था. क्या ये मुमकिन हो सकता है ?
धृतराष्ट्र जन्मांध थे. उससे भी ज्यादा पुत्र मोह में अंधे थे. उन्हें विराट रूप धरकर भी कृष्ण नहीं समझा पाए धर्म-अधर्म का अंतर, ज्ञान-अज्ञान का फर्क. सबकुछ रणभूमि में झोंक देने के बाद भी, गीता के ज्ञान के साक्षी होने के बाद भी अंधे धृतराष्ट्र के मन की आंखें बुझी ही रहीं. तो क्या इन धृतराष्ट्रों को मेरे तर्क दृष्टि दे सकते थे. मुझे ट्विटर पर हुई इस रेलम पेलम के दौरान कुछ याद आया. एक जुमला. पढ़े लिखे लोग आस-पास के अकसर दोहरा रहे हैं इसे. “वी आर लिविंग इन टफ टाइम”.
Image embed
सिलसिले की शुरुआत दीवाली की रात से हुई. रातभर पटाखों के कानफोड़ू शोर में सो नहीं पाई. सांस लेने में तकलीफ अलग. अगली सुबह दफ्तर के लिए निकली. कार से. सुबह के वक्त ज्यादा ट्रैफिक नहीं होता. जल्दी पहुंच जाती हूं. पर ये सुबह सुबह सी नहीं थी. कार घने कोहरे में सरक रही थी. विजिबिलटी पांच मीटर भी नहीं. एक बार तो रोकना पड़ा. इंतजार कि कोई और कार निकले तो उसे फॉलो कर इस स्मॉग से निकलूं.
ऑफिस पहुंची तो बुलेटिन के पहले अपने इस अनुभव को ट्वीट किया. एक तस्वीर के साथ. और फिर ‘धर्मांध’ ब्रिगेड ने मुझे ट्रोल करना शुरु कर दिया. 100-100 नोटिफिकेशन गालियों के, धिक्कार-लानत के, एंटी-हिंदू लेबल के. मैंने इनमें से एक दो को जवाब दे दिए ये सोचकर कि गलत आर्ग्युमेंट का विरोध जरूरी है. क्या कहा गया था मुझसे. बानगी देखिए-
1. पटाखों का विरोध करने वाली मोहतरमा बकरीद के दिन कहां छिप जाती हैं ? 2. हिंदू के त्योहार मनाने के तरीके हिंदू तय करेगा. 3. आप जैसे लोग हिंदू त्योहारों को टारगेट करते हैं लेकिन बकरीद में जानवरों के मरने पर चुप रहते हैं. 4. हिंदू धर्म की बुराई कर तुम फेमस होना चाहती हो. 5. न्यू-ईयर और क्रिकेट मैच में जीत पर पटाखे चलते हैं, उससे तो कोई ऐतराज नहीं. 6. आप कार से चलना बंद कर दो. इससे भी प्रदूषण होता है. 7. एसी दफ्तरों में बैठने वाले पटाखे पर ज्ञान न दें क्योंकि ये कई लोगों की रोज़ी-रोटी है 8. मेरा बच्चा ज़िद करता है, हम तो उसे पटाखे दिलाएंगे ही. 9. क्रैकर-फ्री दीवाली कहने वालों को सबक सिखाना है इसलिए हम तो ख़ूब क्रैकर फोड़ेंगे.
मैंने अपने तईं इन सब कुतर्कों का जवाब दिया. लेकिन कुछ सवाल हैं जो इस घटना के बाद रह रहकर कौंधते हैं.
कौन हैं ये लोग जिन्होंने दीपावली के अस्तित्व को पटाखों से जोड़ दिया है? प्रभु श्रीराम की अयोध्या वापसी पर तो दीप जलाए गए थे. आतिशबाज़ी कर्मकांड और परंपरा का हिस्सा कबसे बन गया?
कौन हैं ये लोग जिन्हें बकरीद पर बकरा कटने की प्रथा गलत लगती है और फिर यही कथित गलत उन्हें अपने हिस्से की गलती करने का लाइसेंस दे देता है?
कौन हैं ये लोग जो हिंदुओं को ये कहकर भरमाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके त्योहारों को टारगेट किया जा रहा है. क्या त्योहार का मतलब अपनी ही हवा, पानी, मिट्टी को दूषित कर देना है ?
कौन हैं ये लोग जिन्होंने ये ठेका ले लिया है कि कोई भी व्यक्ति अगर क्रैकर-फ्री दीवाली की बात करता है तो वो एंटी-हिंदू या धर्म-विरोधी है?
कौन हैं ये लोग जो धर्म की आड़ में दीवाली के ध्वनि प्रदूषण और पैसों की बर्बादी को भी जस्टिफाई कर देते हैं ?
कौन हैं ये लोग जो ये फैसला करेंगे कि सिर्फ पटाखों पर पाबंदी हिंदू धर्म की नींव हिला देगी ? क्या इतना कमज़ोर है सनातन धर्म ?
Image embed
तय आपको करना है. मुझे करना है. बल्कि हर उस इंसान को करना है जो सोशल मीडिया पर एक्टिव है. हम किसी भी प्रोपेगेंडा या बीमार सोच के औज़ार न बनें. सनातन धर्म में धर्म की व्याख्या बहुत उदार व्यापक और समाहित करने वाली है. प्रकृति को मां मान संवर्धन करने वाली है. दीवाली पर मिट्टी के दिए, उसमें सरसों का तेल, जो कपास की बनी बाती के सहारे रौशनी फैलाए. रौशनी राम के आदर्शों की. मर्यादा पुरुषोत्तम. उन्हें पूजने वाले कोई मर्यादा क्यों नहीं मानते. दीवाली के अगले रोज गोवर्धन पूजा. सत्ता के मद में डूबे एक देवता इंद्र के खिलाफ गाय चराने वालों सामान्य जनों की बगावत. जिसे दिशा दी कृष्ण ने. उन्हें संगठित करके.
Image embed
याद रखें. कर्म का चक्र है. चक्र गोल है. जो जहर फैला रहे हो.लौटकर तुम तक ही आएगा.


 

ये पढ़ लो, चक्षु खुलेंगे

एक कारोबारी के दिमाग़ की उपज था दिवाली पर पटाखे चलाने का आइडिया

ट्रिपल तलाक के विक्टिम खोज रहे लोग यहां आएं

बकरीद के दिन ढाका की सड़कों पर कैसे बहीं खून की नदियां?

Advertisement

Advertisement

()