~ देवांशु झा--------------------------------------------------------------------------------स्मृति ईरानी कहती हैं कि आईआईटी में संस्कृत भाषा भी पढ़ायी जानी चाहिए ताकिप्राचीन भारत की सबसे समृद्ध और शोधपरक भाषा में प्रतिपादित वैज्ञानिक और गणितीयसिद्धांतों के बारे में लोग जान सकें. अब चूंकि आधुनिक और प्रगतिशील भारतीयों केलिए संस्कृत देवी-देवताओं की अभ्यर्थना मात्र की भाषा है इसलिए उसे पढ़ने की जरूरतही नहीं है. बल्कि उनके मुताबिक तो संस्कृत पढ़ना मूढ़मति या जड़ होना है. दूसरे वोलोग हैं जो संस्कृत को ब्राह्मणों की भाषा कहकर तमिल तेलुगु और प्राकृत-पाली के लिएऐसी ही मांगें करने लगते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि प्राचीन भारत में बौद्धिकऔर गणितीय-वैज्ञानिक सिद्धांतों की मानक भाषा संस्कृत ही थी. वराहमिहिर,भास्कराचार्य और आर्यभट्ट प्राकृत या पाली में नहीं लिखते थे इसलिए संस्कृत भाषा कोपढ़ना जरूरी है. साथ ही हमें यह समझने की जरूरत भी है कि क्यों संस्कृत भाषा औरप्राचीन भारत में सोचे-विचारे जाने वाले वैज्ञानिक सिद्धांत महत्वपूर्ण थे. खासकरइसे पश्चिमी विद्वानों के नजरिए से समझना ज्यादा जरूरी है क्योंकि उनकी बातों कीपूछ ज्यादा है . भले ही कोई बड़ा भारतीय विद्वान उनसे बहुत बेहतर तरीके से हमेंसमझा सके कि प्राचीन भारत में गणित और विज्ञान पर हमारी समझ कैसी थी. सबसे पहलेहमें संस्कृत के व्याकरण की बात करनी चाहिए. खासकर पाणिनी के व्याकरण की. आधुनिकभाषाओं के व्याकरण से जब हम पाणिनी के संस्कृत व्याकरण की तुलना करते हैं तो उसेभिन्न पाते हैं. क्योंकि पाणिनी वैयाकरण से पहले गणितज्ञ थे. उन्होंने सबसे पहले इसबात को समझा कि भाषा का एक एल्जेब्रिक स्वरूप हो सकता है. चूंकि प्राचीन भारतीयगणित अपनी संरचना में एल्जेबरा के नजदीक है और इस क्षेत्र में तब ज्यादा काम कियागया था (जैसे कि यूनान में त्रिकोणमिति के जानकार थे) इसलिए उन्होंने संस्कृत केव्याकरण को एक एल्जेब्रिक गणितीय भाषा का रूप दिया. वह व्याकरण स्पष्ट औरसुनिर्देशित सिद्धांतों से काम करता है. उसकी हर पंक्ति एक नियम से तय होती है.पाणिनी के व्याकरण में लोकाचार से भाषा में छूट का कोई स्थान नहीं है जैसा किहिन्दी या दूसरी भाषाओं के व्याकरण में होता है. यानी उसका एक मानक लैंग्वेज हैजिसे हम बड़ी ही आसानी से आधुनिक कंप्य़ूटर के लैंग्वेज से तादात्म्य कर सकते हैं.कंप्यूटर का लैंग्वेज मशीनी होने के कारण भाषा के इस स्वरूप को सबसे आसानी से ग्रहणकरता है, क्योंकि वह खुद अपने दिमाग से किसी भाषा को नहीं रचता बल्कि एकव्याख्यायित भाषा से काम करता है. इसलिए सभी बड़े सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर औरकंप्यूटर साइंस के विद्वान इस बात को मानते हैं कि पाणिनी का व्याकरण कंप्यूटर कीभाषा के लिए आदर्श है. न सिर्फ कंप्यूटर की भाषा के लिए बल्कि आधुनिक भाषा विज्ञानके विद्वानों को व्याकरण और लिग्विंस्टिक्स की समझ विकसित करने में पाणिनी औरप्राचीन भारतीय भाषाविदों ने अमूल्य योगदान दिया है. जरा देखिए, क्या कहते हैंपश्चिम के जानेमाने विद्वान शेल्डन पोलक .. Readers who know anything about indianintellectual history are likely to know that the study of language was morehighly developed in south asia than anywhere else in the premodern world. Fromthe archaic invocation to the Goddes of Speech(vak) in the Rigveda to theetymological speculation that lies at the heart of sacerdotal thought ofbrahmanas to the grand synthesis of Panini and the sophisticated tradition ofexegesis that it stimulated, and in many rival systems that sought to displaceand surpass this tradition, premodern indian thinkers were consumed by thedesire to understand the mystery of human communications and they had no peerin their explorations until in one of the subtler ironies of intellectualhistory. Franz Bopp, William Dwight Whitney, Ferdinand De Saussure.EmilieBeneveniste, Leonard Bloomfield and Noam Choamsky learning both substantivelyand theoritically from indian premodernity( being all sanskritists or studentsof sanskrit knowing scholars ), developed successively historical, structuraland transformational linguistics and, by these new forms of thought inventedsome basic conceptual components of western modernity itself. Sheldon pollock,The language of the gods in the world of men ) शेल्डन पोलक जो कि प्राचीन भारतीयसंस्कृति के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखते हैं और पारंपरिक पश्चिमी चश्मे से भारतको देखते हैं वे भी इस सत्य को मानते हैं कि आधुनिक लिग्विंस्टिक्स के जो पश्चिमीधुरंधर रहे उन्होंने भारतीय भाषा और भाषिक संरचना से बहुत कुछ लिया. दुख की बात येहै कि ब्लूमफील्ड ने पाणिनी से सीखा, नोम चोमस्की ने ब्लूमफील्ड से जाना और सीधेपाणिनी के महान व्याकरण से सब कुछ लेकर उन्हें कुछ नहीं दिया . आज दुनिया नोमचोमस्की की बड़ी इज्जत करती है लेकिन उन्होंने व्याकरण में जो पाणिनी से लिया, कभीउसका कृतज्ञता ज्ञापन किया ? रही बात गणित और विज्ञान की तो इसे स्वीकार करने मेंहमें कोई दुख नहीं होना चाहिए कि प्राचीन भारत में अंकगणित, खगोल विज्ञान और समय कीसंकल्पना काफी विकसित थी. श्रीमदभागवत पुराण में ब्रह्मांड की उम्र का जो उल्लेख हैवह काफी हद तक क्वांटम मैकेनिक्स के आधुनिक सिद्धांत के करीब है. शायद आपको येजानकर हैरत होगी कि 1940 के आसपास प्रतिपादित गणित के आधुनिक सिद्धांत इन्फॉर्मेशनथ्योरी की जड़ें साढ़े तीन हजार साल पुराने वेद में मिलती है. इन्फॉर्मेशन थ्योरीका कंप्यूटर साइंस में इन दिनों बहुत इस्तेमाल होता है. जो इस सिद्धांत पर काम करतीहै कि दी जाने वाली सूचना जब आगे बढ़े तो भ्रष्ट न हो यानी उसका मूल स्वरूप नबिगड़े . हम जानते हैं कि वेद को श्रुति कहते हैं. उस समय श्रुति को सिर्फ सुन करही स्मरण किया जाता था और आगे बढ़ाया जाता था ..तो ऋषियों ने श्रुति को भ्रष्ट पाठसे बचाने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया. इस खोज के बारे में भी हमें विदेशीविद्वानों से ही पता चला है. दुखद है कि जिस भारतीय दर्शन में इस आधुनिक गणितीयसिद्धांत के बीज थे उस पर किसी की नजर नहीं पड़ी. और एक समय के बाद जब सबकुछ लिखाजाने लगा तो उस सिद्धांत की जरूरत ही नहीं रही लेकिन आधुनिक समय में थ्योरी ऑफइन्फॉर्मेशन की जरूरत टेलिफोन से महसूस की गई जिसमें संवाद हमेशा शुद्ध नहीं होताथा और इटरनेट आने के बाद तो इसकी जरूरत और बढ़ गई. बात छोटी सी है लेकिन बड़ी भी हैकि बीसवीं सदी के दो बड़े शोध, कंप्यूटर की भाषा और इन्फॉर्मेशन थ्योरी की जड़ेभारत में थीं. यहां से ये संभावना भी प्रबल होती है कि आगे होने वाले शोधों कीजड़ें प्राचीन भारत में नहीं होंगी, इसकी क्या गारंटी है. गणित को लॉजिक से डिराइवकरने का आधुनिक सिद्धांत विदेशियों के लिए नया होगा लेकिन इस सिद्धांत पर तेरहवींसदी में मिथिला के विद्वान गंगेश उपाध्याय जो कि नव्यन्याय के प्रवर्तक थे, ने विचार कर लिया था. कैलकुलस जिसे हम पश्चिम की देन मानते हैं, उसके जनक केरल केचौदहवीं सदी के गणितज्ञ माधव थे. ज्यादातर आधुनिक पश्चिमी गणितज्ञ इस तथ्य कोस्वीकारते हैं. आपको यह मालूम होना चाहिए कि पिछले साल मेडिकल साइंस में जिस चीनीवैज्ञानिक को नोबेल दिया गया उनका पूरा शोध पारंपरिक चीनी जीव विज्ञान पर आधारितथा. गणित में भारत के लिए पहला फील्ड्स मेडल जीतने वाले युवा गणितज्ञ मंजुल भार्गवने एक साक्षात्कार में तमाम महान गणितज्ञों के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि वोअपने दादा के भी ऋणि हैं जो वैदिक गणितज्ञ थे, जिनसे उन्होंने बहुत कुछ सीखा. बातयह है कि सारे खोज और शोध सिर्फ पश्चिम में ही नहीं हुए. हम कूपमंडूक न बनें लेकिनजो श्रेष्ठ था उसे फिर से क्यों न पढ़ें एक नई अंतर्दृष्टि से उस पर क्यों न विचारकरें और गुनें. जानें कि भारत गणित, विज्ञान, दर्शन और भाषा के क्षेत्र में कहांथा इस जानकारी को हासिल करने के लिए हमें प्राचीन ग्रंथों के सागर में उतरना हीहोगा, जिसका तकरीबन शत प्रतिशत संस्कृत में है.--------------------------------------------------------------------------------यह लेखक के निजी विचार हैं. 'दी लल्लनटॉप' की सहमति जरूरी नहीं है.