नवीन चौधरीनवीन चौधरी की दो खासियतें हैं. पहली ये कि वो आर्यादित्य के पापा हैं, दूसरी ये किवो हैंडसम हैं. 12 साल से मार्केटिंग के पेशे में है, इस बार जो लिखा है वो भीमार्केटिंग से ही जुड़ा है. और भी लिखते हैं, ट्विटर हैंडल @naveen1003 पर चौड़ मेंएक्टिव रहते हैं. इनके पास एक DSLR भी है. दोस्ती बढ़ाने की एक वजह ये भी हो सकतीहै.दी लल्लनटॉप के लिए 'संडे वाली चिट्ठी' लिखने वाले दिव्य प्रकाश दुबे ने अपनी नईकिताब 'मुसाफिर कैफे' पर बात करते हुए हमसे कहा कि जब कोई उन्हें हिंदी का चेतन भगतबोलता है तो गाली सी लगती है. उनकी इस बात पर नवीन कुछ कहना चाहते थे तो इस बार वोआपके लिए संडे वाली चिट्ठी लाए हैं. इतवार को कोई इतनी मेहनत से चिट्ठी लिख रहा है.बांचिए.--------------------------------------------------------------------------------मेरे एक पसंदीदा लेखक हैं. इतने पसंदीदा कि न सिर्फ उनकी लगभग सारी किताबें पढ़ चुकाहूं, बल्कि उनके बहुत से वीडियो भी youtube पर देख चुका हूं. युवा हैं. जितना अच्छालिखते हैं, उतना ही अच्छा बोलते हैं. नहीं, मैं चेतन भगत की बात नहीं कर रहा. इनलेखक का नाम है दिव्य प्रकाश दुबे. हिंदी में लिखते हैं जिसे वो 'नई वाली हिंदी'कहते हैं. दी लल्लनटॉप पर 'संडे वाली चिट्ठी' लिखते हैं. मैंने सोचा कि आज ये 'संडेवाली चिट्ठी' मैं उन्हें लिख दूं. चूंकि देर से लिख रहा हूं इसलिए पता नहीं कि संडेको आएगी या मंडे को, पर जब भी आए, इसे 'संडे वाली चिट्ठी' ही माना जाए. 'संडे वालीचिट्ठी' इस बार दुबे जी की तरफ से नहीं, बल्कि उनके नाम...दुबे जी, आज जो लिख रहा हूं न, वो सिर्फ पाठक की हैसियत से ही नहीं, बल्कि एकमार्केटियर की नज़र से भी लिख रहा हूं. अभी कुछ दिनों पहले किसी संपादक से बात कररहा था तो आपकी किताब का जिक्र किया मैंने. वो बोले ठीक है यार कि वो रोज की बातोंको आजकल की हिंदी में लिखता है पर उसमें साहित्य नहीं है. मुझे अजीब लगा. मैंने पलटकर जवाब दिया कि साहब, साहित्य अगर समझ ही न आए तो क्या मतलब है. जब तक कहानी मुझेअपनी सी न लगे तो क्या कहानी है. यही कुछ दिव्य की किताबों में है. लोग कहानी सेजुड़ पाते हैं और आसानी से समझते हैं.काशीनाथ सिंहमैं काशीनाथ सिंह जी की दो किताबें खरीदकर लाया और दोनों ही खत्म न कर पाया. जुड़ हीनहीं पाया उनकी भाषा और उनके पात्रों से. तो क्या फायदा ऐसे साहित्य का? और इन सबसेबड़ी बात कि दिव्य प्रकाश दुबे की वजह से काफी लोग हिंदी की किताबों को पढ़ने लगेहैं. Hindi books are selling. Market is growing. Don’t you think this is good?संपादक जी सहमत हुए. बताना भूल गया कि मैं एक नामी पब्लिशिंग हाउस में मार्केटिंगहेड हूं तो ऐसी चर्चाएं मेरी आम तौर पर संपादकों और बुक सेलर्स से होती रहती हैं.चलिए भूमिका तो बांध ली मैंने. अब मुद्दे पर आता हूं. अभी आपका एक इंटरव्यू पढ़ालल्लनटॉप पर ही, जिसमें आपने कहा था 'कोई हिंदी का चेतन भगत बोलता है तो गाली लगतीहै'. Let me tell you honestly मुझे पढ़कर थोड़ा अजीब लगा. कोई और कहता तो नहीं लगतापर चूंकि आपने कहा है तो लगा. थोड़ा नहीं, शायद ज्यादा अजीब लगा वरना कौन संडे कोदिन में बैठकर चिट्ठी लिखता है.दिव्य प्रकाश दुबे का इंटरव्यू: ‘कोई हिंदी का चेतन भगत बोलता है तो गाली लगती है’अपने यहां चेतन भगत को उसकी हर किताब के बाद गरियाना वैसे ही ट्रेंड में है, जैसेहर रैली के दौरान अरविन्द केजरीवाल पर स्याही या चप्पल फेंकना. लोग चेतन की नईकिताब One Indian Girl खरीद कर पढ़ रहे हैं और फिर फेसबुक पर लिख रहे हैं कि What acrap! ये वैसा ही है जैसा कि लोग सलमान की फिल्मों के साथ करते हैं. पहले देखते हैंऔर फिर कहते हैं, 'यार इसे एक्टिंग कब आएगी.' इन गरियाने वालों के चक्कर में सलमानकी फिल्म 300 करोड़ कमा लेती है और चेतन भगत की किताब बेस्टसेलर हो जाती है. अमेज़नके चार्ट पर महीनों नंबर 1 पर रहती है.मुझे ऐसा लगा कि आप भी उसी श्रेणी में आ गए. चेतन भगत से तुलना करने पर आपको क्योंबुरा लगा, ये मैं ठीक से नहीं समझ पाया. कोई भी नहीं चाहता कि उसकी तुलना किसी सेकी जाए. हर किसी का अपना स्टाइल और नजरिया होता है. आपका अपना है, चेतन का अपना. इसलिहाज से आपको बुरा लगा हो तो अलग बात है, लेकिन अगर आप भी ऊपर लिखे लोगों के नज़रिएसे देखते हों, तो मुझे लगता है कि कुछ गड़बड़ है.मेरी मंशा आपकी तुलना चेतन भगत से करने की कतई नहीं है, पर अगर कोई आपको हिंदी काचेतन भगत कहे तो मैं कुछ हद तक सहमत होऊंगा. सहमत होने की मेरी कुछ वजहें हैं और येवजहें साहित्यिक नहीं, बल्कि मार्केटिंग के एंगल से हैं.आपसे बहुत से पाठक जुड़े रहते हैं. कभी उनसे पूछिएगा कि अरुंधती रॉय, अरविन्द अडिगा,सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन की पहली किताब कौन सी है? जवाब न मिले तो पूछिएगा किचेतन भगत की पहली किताब कौन सी है? जवाब मिलेगा. आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहाहूं. ऐसा ही काफी हद तक आपके साथ भी हो रहा है या आने वाले समय में हो जाएगा. नएहिंदी पाठकों को भले ही काशीनाथ सिंह का नाम न पता हो पर आपका और आपकी पहली किताबका नाम पता है.सलमान रश्दीआपसे बहुत से पाठक कहते हैं कि प्रेमचंद के बाद हिंदी में आपको पढ़ा है. आप मेरी इसबात से सहमत होंगे कि हमारे यहां के बहुत से लोगों ने कोर्स के इतर कभी कोईअंग्रेजी फिक्शन किताब पहली बार पढ़ी है, तो वो चेतन भगत की किताब है. ये कहनाबिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि हमारे देश में बहुत से युवाओं को पढ़ने का शौक चेतनभगत की किताबें पढ़कर लगा. ऐसे कुछ लाख लोग हैं, जिन्होंने दरअसल चेतन भगत को पढ़करही किताबें पढ़नी शुरू कीं. हालांकि, ये अलग विषय है कि कुछ लाख अभी भी सिर्फ चेतनभगत ही पढ़ते हैं.आपसे मेरा परिचय मेरे और आपके एक कॉमन मित्र गौरव प्रसाद ने करवाया था. वो चर्चा भीकुछ वीडियो मार्केटिंग आइडिया से शुरू हुई थी. तब पहली बार मैंने आपका नाम सुना औरफिर किताब खरीदी. तब सिर्फ Terms & conditions apply आई थी. मैंने पढ़ी और मुझे काफीअच्छी लगी. कोर्स के इतर ये मेरी पहली हिंदी की किताब थी. वैसे ही, जैसे कई लोगोंकी One Night at Call Centre अंग्रेजी में थी.आपकी किताब पढ़कर मुझे नई हिंदी पढ़ने का शौक लगा और मैंने आपकी मसाला चाय के अलावाकई और किताबें, जो आपके जैसे ही युवा लेखकों जैसे निखिल सचान, आशीष चौधरी (& fewmore) ने लिखी थी, खरीदकर पढ़ डाली. मेरे से कई दोस्तों ने पूछा कि कोई हिंदी मेंअच्छी सी बुक बताओ तो मैंने आपकी बुक पढ़ाई. आपने लोगों को हिंदी में किताबें वैसेही पढ़ाई हैं, जैसे चेतन भगत ने अंग्रेजी में.मैं चेतन भगत को महान लेखक तो कतई नहीं मानता पर उनके लिखे को crap कहने का हक भीनहीं रखता, क्योंकि मैंने खुद चेतन की पहली 'बेस्टसेलर' पढ़ने के बाद आगे की तीनकिताबें भी शौक से पढ़ीं. हां, उसके बाद उनके लिखे में मुझे मजा नहीं आया और सब कुछरिपीट सा लगा. इसलिए 2 States के बाद जो भी किताब आई, वो नहीं पढ़ी.आपकी भी मुसाफिर कैफ़े मैंने 2 दिन पहले ही आर्डर की है. प्री-आर्डर इसलिए नहीं कीथी, क्योंकि 'मसाला चाय' मुझे 'Terms & conditions apply' का एक्सटेंडेड वर्जन लगरही थी. वैसा ही रिपीट सा लगा जैसा चेतन की किताबों में था. मुसाफिर कैफे का रिव्यूलोगों ने ठीक दिया तो मैंने अब ऑर्डर की.मुसाफिर कैफे से याद आया कि आपको धन्यवाद् भी कहना है. सुधा और चंदर के बारे में आपइतना लिख चुके थे कि मैं मुसाफिर कैफ़े पढ़ने से पहले गुनाहों का देवता जरूर पढ़नाचाहता था और मैंने पढ़ी भी. दिल खुश हो गया. आपने अपनी एक स्पीच में कहा था कि आपपुरानी हिंदी और नई वाली हिंदी के बीच में पुल का काम कर रहे हैं, उन्हें जोड़ रहेहैं. चेतन भगत क्या अलग कर रहे हैं? कठिन सी अंग्रेजी को आमजन को सरल सी अंग्रेजीमें पढ़ा रहे हैं. गलत तो नहीं कह रहा न?दिव्य प्रकाश दुबेआपको 2 तरह के पाठक पढ़ते हैं. पहले जो नई हिंदी में कुछ फ्रेश पढ़ना चाहते हैं औरदूसरे वो जो पढ़ना चाहते हैं पर अंग्रेजी पढ़ने-समझने में तकलीफ होती है. आपको पताहै चेतन भगत को कौन पढ़ते हैं? वो दूसरी कैटेगरी वाले, जिन्हें अंग्रेजी पढ़नी आतीहै पर कठिन वाली समझ नहीं पाते और पढ़ना चाहते हैं. ऐसा बहुत बड़ा मार्केट है जोहिंदी और अंग्रेजी पढ़ना जानता है पर उसे किताबें पढ़ने का शौक नहीं था, क्योंकि अबतक की किताबें क्लिष्ट भाषा में थीं.चेतन भगत ने इन लोगों को टारगेट करके उनके लिए किताब लिखी. ये लोग महीने-दो महीनेके अन्दर चेतन भगत की नई किताब की लाखों कॉपी खरीद लेते हैं. ऐसे लोग हिंदी भी बहुतमजे से पढ़ते हैं पर इन तक अभी नई हिंदी नहीं पहुंची जो चेतन ने अंग्रेजी में पहुंचादी. आने वाले समय में यही लोग हिंदी की किताबें भी पढ़ेंगे, क्योंकि चेतन भगतइन्हें पढ़ने की लत लगा चुका है.जहां तक मुझे याद है, चेतन भगत इकलौते ऐसे लेखक हैं, जिनकी किताब का एक फुल पेज ऐडटाइम्स के सभी एडिशन में आया था. आप भी मार्केटिंग वाले हो. सोच सकते हैं ROI क्यारहा होगा. चेतन की किताबों की औसतन 5 लाख कॉपी बिक जाती हैं. इतने बड़े रीडर बेसवाले लेखक को यूं ही ख़ारिज कर देना ठीक नहीं. हम लोग तो मस्तराम को भी ख़ारिज नहींकरते, फिर सिर्फ चेतन भगत से ऐसी बेरुखी क्यों? आने वाले समय में अगर हिंदी लेखक कीभी 5000 की जगह लाख कॉपी बिकने लगे तो चुटकी भर ही सही, पर उसका श्रेय चेतन भगत कोजाएगा, जिसने लोगों को किताबें खरीदकर पढ़ना सिखाया.कुछ बुरा लगा हो तो गुस्ताखी माफ़. बस आप अपने से लगते हैं तो जो था, कह डाला. वैसेभी हम मार्केटिंग वाले ऑथर को नाराज़ करना afford नहीं कर सकते. ;) जय हिंदी.आपका प्रशंसक--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:मुसाफिर कैफे: ‘इस रेशम की थान को पढ़ोगे तो Quotes गिराने लगोगे’लड़की देखने गए और वहां वो पहले से ही एक लड़के को रिजेक्ट कर रही थीमोदी वो हथियार उठा रखे हैं जिसके लिए कृष्ण ने अर्जुन को रोक दिया थाइस फिल्म में मां है, ये हॉलीवुड की करण-अर्जुन हैपढ़िए ये संडे वाली चिट्ठियां…..‘बिना सवाल का इंसान, इंसान थोड़े बचता है’‘फांसी लगाने वाले बर्दाश्त करने में आलस कर जाते हैं’‘अधूरी लिस्ट पूरी करते-करते हमारी ज़िन्दगी बीत जाएगी’आंसुओं से बना ऑफिस वाला एक्सट्रा मैरीटल रिश्ताएक्स माशूका को लव लेटर, जो हर लड़का लिखना चाहता है, पर लिख नहीं पातालवर्स को प्रपोज क्यों करना पड़ता है. प्रपोज करते ही लव तो नहीं होता नतुमने मेरा कुरियर क्यों लौटा दिया था अमिताभ बच्चन!थैंक यू मेरी किचन और बेडरूम से दोस्ती करवाने के लिए