जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान.अर्थात - जिस तरह लड़ाई में तलवार का महत्व होता है, मयान का नहीं; उसी तरह एकसमझदार व्यक्ति के ज्ञान का महत्व है, न कि उसकी जाति का. इसीलिए साधु से कभी उसकीजाति नहीं पूछी जाती. कबीर दास का लिखा हमारा समाज आत्मसात कर लेगा, ये उम्मीदबेमानी है. तभी तो आज तक हम ये समझ नहीं पाए कि कौन सी बात जातीय स्वाभिमान केखांचे में बैठती है और कौन सी बात सामाजिक न्याय के खांचे में. भारी भरकम कंफ्यूज़नहै. तभी तो आज़ादी के 75 साल बाद भी सेना में जातीय आधार पर एक और रेजिमेंट की मांगकी जा रही है. समय समय पर अहीर रेजिमेंट की मांग सिर उठाती रहती है. नेता बयान देतेरहते हैं. और इसी माहौल में 4 फरवरी से गुरुग्राम के खेड़की दौला टोल के पास धरनाचल रहा है. कभी दिल्ली जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर टोल फ्री करवाया जा रहा है तोकभी मार्च निकाला जा रहा है. आज समझेंगे कि अहीर रेजिमेंट की मांग के पीछे कारणक्या हैं? क्या इस मांग में दम है? और उस तर्क का जवाब भी तलाशेंगे, जिसमें कहाजाता है, जब इतनी जातियों की रेजिमेंट हैं, तो एक रेजिमेंट और सही. खेड़की दौला टोलके पास चल रहे धरने की मांग बड़ी सीधी है - सेना में जिस तरह जाट या सिख रेजिमेंटहै, उसी तरह एक अहीर रेजिमेंट भी हो. इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है संयुक्तअहीर रेजिमेंट मोर्चा. इंडियन एक्सप्रेस पर छपी पवनीत सिंह चड्ढा की रिपोर्ट केमुताबिक मोर्चे को दक्षिण हरियाणा के अहीर समाज से आने वाले लोग चला रहे हैं. मार्च2021 में इस मोर्चे को एक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत करवा लिया गया था. इसी मोर्चेने 2018 में भी 9 दिन लंबी एक भूख हड़ताल भी की थी. तब नेताओं के आश्वासन के बादभूख हड़ताल समाप्त हुई थी. लेकिन इस बार मोर्चे के नेताओं का दावा है कि आंदोलन तभीरुकेगा, जब एक अलग अहीर रेजिमेंट बन जाएगी. आंदोलनकारियों ने आज एक मार्च भी निकालाजिसमें पार्टियों के नेताओं ने शिरकत की. गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस ने 21 मार्च कोही एक एडवाइज़री निकाल दी थी. इसके मुताबिक 23 मार्च को दिल्ली गुरुग्राम हाइवे परभारी जाम रहने की आशंका थी. पुलिस ने एहतियातन हीरो हॉन्डा चौक से लेकर खेड़की दौलाटोल तक की सड़क को आज सुबह 7 से शाम 5 तक के लिए बंद भी कर दिया था. हममें सेज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि सेना जाति और धर्म से ऊपर है. वहां कोई भेदभावनहीं होता. किसी को आरक्षण नहीं मिलता. सेना एक धर्मनिरपेक्ष और समरस समाज काउदाहरण है. और उसके लिए एक ही चीज़ का महत्व है - देश की सुरक्षा. कितने ही लोगोंने ये बातें स्कूल के दौरान निबंध में भी लिखी होंगी. ऐसे में आपको एक जाति के आधारपर अलग रेजिमेंट की मांग सरासर गलत लग सकती है. लेकिन फिर हमारे सामने अहीररेजिमेंट मोर्चा का वो तर्क आ जाता है - कि जब जाट, डोगरा, राजपूत और महार रेजिमेंटहो सकती हैं, तो फिर अहीर रेजिमेंट क्यों नहीं हो सकती. अहीर रेजिमेंट मोर्चा कीबात सही है. लेकिन आधी. ये बात सही है कि भारत की सेना में जाति के आधार परभर्तियां होती हैं, रेजिमेंट भी हैं. लेकिन ये हमारे औपनिवेशिक इतिहास की देन है.जब हम अंग्रेज़ों के गुलाम थे. सेना और जाति के विषय पर सभी बिंदुओं को छूना एकबुलेटिन में संभव नहीं हैं. इसीलिए हम संक्षेप में अपनी बात रखेंगे. तीनों सेनाओंमें से सिर्फ थलसेना में ही जाति आधारित रेजिमेंट हैं. और थलसेना में भी येरेजिमेंट मुख्यतया इंफ्रेंट्री में देखने को मिलती हैं. माने पैदल सेना. तोपखाने औरआर्मर्ड कोर में भी जाति आधिरित भर्ती के कुछ उदाहरण देखने को मिलते हैं, लेकिनप्रायः ये मिक्स्ड रेजिमेंट्स होती हैं. माने इनमें कोई भी भर्ती हो सकता है. सेनाका ये स्वरूप कैसे बना, इसकी वजहें अनेक हैं. आज़ाद भारत के पास जो सेना है, उसेअंग्रेज़ों ने बनाया था. और अंग्रेज़ अपने लिए पूरी फौज इंग्लैंड से नहीं लाए थे.वो कुछ अफसरों और जवानों के साथ यहां आए. फिर उन्होंने भारत में अपने अनुभवों केआधार पर सेना का निर्माण किया. एक अच्छा उदाहरण है सिख रेजिमेंट का. सिख साम्राज्यसे अंग्रेज़ों को तीन तीन बड़ी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं. तब जाकर वो अपने अधीन कर पाए.इन लड़ाइयों के दौरान अंग्रेज़ अफसरों ने देखा कि सिख सैनिक महाराजा रणजीत सिंहजैसे कुशल रणनीतिकार के अभाव में भी बहादुरी से लड़ते रहे. तो उन्होंने सोचा किसिखों से लड़ते रहने के बजाय उन्हें अपनी फौज में शामिल करना बेहतर होगा. इस तरह 1अगस्त, 1846 को सिख रेजिमेंट को रेज़ किया गया. माने उसका गठन हुआ. अब ये समझनेवाली बात है कि सिख रेजिमेंट में ज़्यादातर सिख ही शामिल हुए. लेकिन क्याअंग्रेज़ों की बनाई सारी रेजिमेंट्स में सिर्फ एक जाति या धर्म के लोग ही थे? इसकाजवाब आपको मिलेगा राजपूत रेजिमेंट की कहानी में. 1778 में कानपुर में 31 बंगालनेटिव इंफेट्री को रेज़ किया गया. पहले अफसर थे कैप्टन मसराक. और उनके तुरंत बाद आएमेजर सैम्युएल किलपैट्रिक. इन्हीं के नाम पर 31 बंगाल नेटिव इंफ्रेंट्री को कहाजाने लगा किलपैट्रिक की पल्टन. किलपैट्रिक की पल्टन को ही आज हम 3 राजपूत के नाम सेजानते हैं. इसमें मुख्यतया उत्तर प्रदेश और बिहार से राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम औरसिख सैनिकों को भर्ती किया गया. कारण था - इन समाजों से आने वाले सैनिकों की ऊंचाई,रौबदार व्यक्तित्व और मार्च करने का तरीका. ऊंचाई और रौबदार व्यक्तित्व के लिए जातिनहीं चाहिए. लेकिन ध्यान दीजिए कि हम 18 वीं सदी की बात कर रहे हैं. तब के भारत मेंऊंचाई और रौब के लिए पोषण चाहिए था. और पोषण के लिए संसाधन. तब समाज के सभी वर्गोंके पास ये नहीं होते थे. आज जिन पल्टनों को हम 1, 2, 4 और 5 राजपूत के नाम से जानतेहैं, उनका गठन 1825 तक हो गया था. और इन सबमें राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम और सिखसैनिक ही मुख्यतया भर्ती किए गए. तो हमने देखा कि अंग्रेज़ों ने रेजिमेंट कैसेबनाईं, और जिन्हें उनमें भर्ती किया, उसके क्या कारण थे. इस भर्ती नीति में एक बड़ाबदलाव आया 1857 की क्रांति से. क्रांति ने अंग्रेज़ों को भीतर तक हिला दिया. अब वोकिसी भी कीमत पर इतने बड़े विद्रोह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे. तब जॉनथन पीलकमीशन बनाया गया. पील कमीशन का काम था ऐसे इलाकों और जातियों की पहचान करना, जहांसे ''वफादार'' सैनिकों की भर्ती हो सके. चूंकि क्रांति पूर्व और दक्षिण के इलाकोंसे हुई थी, पील कमीशन ने सलाह दी कि भर्ती ऊत्तर और पश्चिम से की जाए. चूंकि 1857की क्रांति में मुस्लिम सैनिकों और राजाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था, इसीलिएक्रांति के बाद अंग्रेज़ फौज ने मुस्लिम सैनिकों से दूरी बनानी शुरू कर दी. 1879में एश्ले ईडन कमीशन आया, जिसने पील कमीशन की सिफारिशों को सही माना. और 1880 केदशक में मार्शल और नॉन मार्शल रेस का सिद्धांत दिया गया. मार्शल रेस माने वोजातियां, जो लड़ने के काबिल थीं और नॉन मार्शल माने वो जातियां, जो लड़ने के काबिलनहीं थीं. इस सिद्धांत के हिसाब से कोई व्यक्ति तभी बहादुर हो सकता था, जब वो एकबहादुर जाति या समाज से आता था. मिसाल के लिए सिख, पठान, बलूच, गोरखा और डोगरा.1857 की क्रांति के बाद हुए सैनिक सुधारों के नतीजे में ही बंगाल आर्मी में चमारसमुदाय के सैनिक कम किए गए और मज़हबी सिखों की संख्या बढ़ाई गई. वैसे ज़्यादातरमार्शल रेस अगड़ी जातियों को ही माना गया. इस तरह अंग्रेज़ों के ज़माने में जातिआधारित रेजिमेंट्स बनीं. कुछ रेजिमेंट्स में सिर्फ एक जाति से सैनिक लिए जाते, कुछमें दो या तीन जातियों से. ऐसी रेजिमेंट्स भी थीं, जो इलाके के आधार पर बनीं. मिसालके अंग्रेज़ सेना के गढ़वाली सैनिकों को मिलाकर गढ़वाल रेजिमेंट बना दी गई. जिसमेंआधुनिक उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके के सैनिक शामिल हुए. 1914 में प्रथम विश्वयुद्धतक भर्ती का ये तरीका चलता रहा. लेकिन लंबे खिंचते युद्ध में ये देखा गया कि मार्शलरेस थ्योरी में ज़्यादा दम था नहीं. जाति और इलाके के आधार पर बनाई गई रेजिमेंट्सने बेजोड़ वीरता का परिचय दिया, लेकिन इसका कारण उनकी पहचान नहीं, उनकी ट्रेनिंगथी. जहां ट्रेनिंग या मोटिवेशन में कमी थी, वहां जाति या इलाका काम नहीं आया.इन्हीं अनुभवों के आधार पर गौर ब्राह्मण, लिंगायत या चमार रेजिमेंट्स जैसे विचारोंको त्याग दिया गया. ये ज़रूर देखने को मिला कि जिन कथित पिछड़ी जातियों से अंग्रेज़फौज दूर रहती थी, युद्ध के समय उनसे बंपर भर्ती की जाने लगी. 1947 में जब भारतआज़ाद हुआ, तो अंग्रेज़ सेना में जाति आधारित, इलाका आधारित और मिक्स्ड रेजिमेंट्सथीं. एक सवाल ये पूछा जाता है कि जब भारत में संविधान जाति का भेद नहीं करता तो फिरआज़ादी मिलते ही जाति आधारित रेजिमेंट्स को भंग क्यों नहीं कर दिया गया. इसका जवाबये है कि भारत को आज़ाद होते ही बड़े-बड़े युद्ध लड़ने पर मजबूर किया गया. दुनियातब कहती थी कि भारत जैसा विविध देश अपने पैरों पर खड़ा नहीं रह पाएगा और हज़ारटुकड़ों में बिखर जाएगा. इसीलिए तब ये फैसला लिया गया कि सेना में अचानक कोई ऐसाबदलाव न किया जाए, जिससे उसकी ताकत या अनुशासन पर असर पड़े. जो भी सुधार किए जाएं,उनमें संयम रखा जाए. लेकिन ऐसा नहीं था कि सुधार किए नहीं गए. 15 जनवरी 1949 कोफील्ड मार्शल के एम करियप्पा आज़ाद भारत की सेना के पहले कमांडर इन चीफ बने. पहलीबार सेना की कमान किसी भारतीय अफसर के हाथ में आई. इस दिन की याद में 15 जनवरी कोसेना दिवस मनाया जाता है. फील्ड मार्शल करियप्पा एक दूरदृष्टा थे. वो जानते थे किसेना की ताकत को बनाए रखना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है एक नए भारत के लिएसेना तैयार करना, जहां सैनिक, सिर्फ सैनिक हों - जाति, धर्म, इलाके का प्रश्न नउठे. फील्ड मार्शल ने नेशनल कैडेट कोर को मज़बूत किया और टेरिटोरियल आर्मी के गठनमें अहम भूमिका निभाई. इन दोनों संगठनों में जाति या इलाके का मोल नहीं है. लेकिनफील्ड मार्शल का सबसे बड़ा सुधार था ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स. मेकेनाइज़्ड इंफ्रेंट्रीकी इस रेजिमेंट में सभी धर्मों, समुदायों और इलाके के लोगों को भर्ती किया जाता है.और ये प्रयोग सफल रहा. ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स, आज़ादी के बाद सबसे कामयाब रेजिमेंट्समें से एक है. और इसकी बहादुरी के किस्से, किसी दूसरी रेजिमेंट से कम नहीं हैं.यहां तक आते आते हम दो चीज़ें बहुत अच्छे से समझ गए हैं. कि सेना में जाति आधारितरेजिमेंट्स कैसे बनीं. और ये भी कि आज़ादी के बाद जाति आधारित रेजिमेंट्स क्योंनहीं बनीं. सीधा सा जवाब है, इनकी आवश्यकता महसूस नहीं हुई. ये देखा गया कि जाति सेज़्यादा महत्वपूर्ण है ट्रेनिंग और बहादुरी. और इन दोनों चीज़ों के लिए जाति याइलाका मायने नहीं रखता. एक और चीज़ समझिए. रेजिमेंट चाहे मिक्स्ड हो या प्योर. अफसरकोई भी हो सकता है. अफसर का कोई धर्म नहीं होता. जो रेजिमेंट के जवानों का धर्म है,वही अफसर का धर्म बन जाता है. मिसाल के लिए अगर किसी जाट पल्टन को मुस्लिम कमांडिंगअफसर मिल जाए, तो सीओ साहब सिर्फ मंदिर परेड का हिस्सा ही नहीं बनेंगे, वो यूनिट केयज्ञ में भी बैठेंगे और सारे विधि विधान पूरे करेंगे. जिस काम से भी ट्रूप मोरालबेहतर होता है, उसमें सीओ साहब ज़रूर शामिल होंगे. उनका निजी धर्म या मान्यता इसकेआड़े नहीं आ सकता. ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं, जब अफसरों ने अपनी धार्मिक मान्यता सेठीक उलट काम किया, क्योंकि जवानों की मान्यता कुछ और थी. आज तक इस परंपरा का अपवादसामने नहीं आया है. अब लौटते हैं आज के मुद्दे पर. अहीर समाज बंगाल से लेकर हरियाणातक के पूरे पट्टे में बसता है. बड़ी संख्या है, और इस समाज के पास राजनैतिकप्रतिनिधित्व भी है. रही बात सेना में प्रतिनिधित्व की, तो सेना में अहीर बहुत बड़ीसंख्या में पहले से हैं. अहीर समाज के लोग कुमाउं रेजिमेंट, जम्मू एंड कश्मीरराइफल्स, पंजाब रेजिमेंट, राजपूताना रेजिमेंट और जाट रेजिमेंट में शामिल हो सकतेहैं. बस इस बात का ध्यान में रखते हुए कि वो जिस इलाके में बसते हैं, वहां से कौनसीरेजिमेंट भर्ती करती है. सेना में अहीर समाज से आए सैनिकों की ढेरों शौर्य गाथाएंहैं. मिसाल के लिए 1962 ये युद्ध के दौरान हुई रेज़ांग ला की लड़ाई को लीजिए. 100से ज़्यादा अहीर सैनिकों ने अंतिम बलिदान देकर चीन की विशाल सेना को दोबारा सोचनेपर मजबूर कर दिया. ये सैनिक इसलिए नहीं लड़े कि वो अहीर थे. बल्कि इसलिए, क्योंकिपल्टन की इज़्ज़त का सवाल था. और पल्टन की इज़्ज़त से बड़ा सैनिक के लिए कुछ नहींहोता. चाहे वो अहीर हो या कायमखानी मुसलमान. अब आप पूछ सकते हैं. कि अगर ये सारीबातें सही हैं, तो फिर अहीर रेजिमेंट की बात आई कहां से. वहीं से, जहां से बहुतसारी समस्याएं आई हैं. वोट बैंक पॉलिटिक्स. अहीर समाज को एक भावुक नैरेटिव मेंबांधकर उनसे संसाधन और वोट जुटाए जा सकते हैं. और इसीलिए अलग अलग राजनैतिकपार्टियों ने इस मांग को शह दी. इसी साल की बात है. 12 फरवरी बसपा सांसद श्याम सिंहयादव ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान अहीर रेजिमेंट की मांग उठा दी. इन सारेबयानों का असर ये हुआ है कि अब युवा भी ये मानने लगा है कि सेना में भर्ती के लिएअहीर रेजिमेंट बनना ज़रूरी हो गया है. ये बात हमने यूपी चुनाव की अपनी कवरेज में भीदेखी थी. जब जब अहीर रेजिमेंट की मांग उठी है, राजनैतिक दलों और नेताओं ने समझाइशदेने की बजाय आग में घी डालने का काम किया है. नतीजा आप गुरुग्राम में देख ही रहेहैं. ऐसा इसीलिए है क्योंकि न पार्टियां और न नेता जाति को भुनाने का मोह छोड़ पातेहैं. रही बात जातीय स्वाभिमान के प्रश्न की, तो वो इस मामले में लागू नहीं होता,क्योंकि अहीर पहले से सेना में हैं. उन्हें सेना में लिया न जा रहा होता, तब इसमांग को स्वाभिमान का प्रश्न बनाकर रखा जा सकता था. इस मामले में विशेषज्ञ क्यासोचते हैं, हमने बात की ब्रिगेडियर संदीप थापर (रि) से उन्होंने हमें बताया हमनेआज़ादी के बाद ब्रिटिश का वही सिस्टम फ़ॉलो किया है जो उन्होंने हमें दिया था.उसमें कोई बदलाव नहीं किया है. एक महार रेजीमेंट ज़रूर होती थी. लेकिन उसे वर्ल्डवॉर 2 के बाद ख़त्म कर दिया गया. इन्फैंट्री को छोड़कर बाक़ी सब रेजिमेंट ऑल इंडियाऑल क्लास हैं. हमने अपनी बात शुरू की थी कबीर दास के दोहे से. खत्म करते हैं रामधारी सिंह दिनकर की बात से. सुनिए उनके हवाले से कि कर्ण ने जाति के प्रश्न पर क्याजवाब दिया था - 'जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड, मैं क्या जानूँ जाति ?जाति हैं ये मेरे भुजदंड। नौजवानों, उठो और तैयारी करो. खूब खाओ, दौड़ो और बदनबनाओ. कोविड काल बीत गया है, भर्ती खुलने वाली है. अपने दम पर फौज में भर्ती होकरजो सुकून आपको मिलेगा, वो किसी जाति आधारित रेजिमेंट के बन जाने से नहीं मिल पाएगा.वैसे भी वहां जाकर आपको देखना झंडे की तरफ ही है. क्या फर्क पड़ता है कि रेजिमेंटके नाम में जाति है या नहीं?