कुछ राज्य अचानक विधान परिषद बनाने की जुगत में क्यों लग गए हैं?
बंगाल के बाद राजस्थान में विधान परिषद बनाने की मुहिम तेज हुई है.
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ममता बनर्जी ने विधान सभा में विधान परिषद के गठन का संकल्प पास किया तो अगले ही दिन राजस्थान की कैबिनेट ने भी इसके लिए मंजूरी दे दी. आखिर क्यों राज्य इतनी फुर्ती में विधान परिषद बनाना चाहते हैं.
(फोटो-पीटीआई)
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देश की राज्य सरकारें अपने यहां विधान परिषद बनाने की कवायद में नजर आ रही हैं. हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्य में विधान परिषद के गठन के प्रस्ताव को पास कर दिया था. वहीं, 7 जुलाई को राजस्थान में मंत्रिपरिषद ने फैसला लिया है कि राज्य विधानसभा के आगामी सत्र में विधान परिषद के गठन का संकल्प पारित करवा कर संसद में भेजा जाएगा. समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों राज्य सरकारें विधान परिषद के गठन को लेकर इतनी फुर्ती दिखा रही हैं. साथ ही इसके सदस्यों और गठन की प्रक्रिया पर भी बात करेंगे.
विधान परिषद में कितने सदस्य
नियमों के मुताबिक़, किसी राज्य की विधान परिषद में विधानसभा की एक-तिहाई संख्या से अधिक सदस्य नहीं हो सकते. नियम ये भी है कि विधान परिषद के लिए कम से कम 40 सदस्य चुने जाते हैं. पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटें हैं. इसका मतलब ये है कि यहां अधिकतम 98 सदस्यों वाली विधान परिषद बनाई जा सकती है. इसी तरह राजस्थान में 200 विधानसभा सीटे हैं और यहां विधान परिषद की अधिकतम 67 सीटें हो सकती हैं.
ये भी बता दें कि सिर्फ यही दो राज्य नहीं हैं जहां विधान परिषद बनाने की मुहिम चल रही है. तमिलनाडु में भी सीएम एमके स्टालिन विधान परिषद गठन का चुनावी वादा कर चुके हैं. विधान परिषद होती क्या है? जैसे केंद्र में दो सदन हैं लोकसभा और राज्यसभा, उसी तरह राज्यों में भी दो सदन हो सकते हैं. एक विधानसभा (Legislative Assembly) और दूसरा विधान परिषद (Legislative Council). जैसे राज्यसभा संसद का उच्च सदन कहलाता है वैसे ही विधान परिषद भी राज्य का उच्च सदन मानी जाती है. संसद में लोकसभा और राज्य की विधानसभा में सदस्य सीधे जनता से चुन कर आते हैं. वहीं, राज्यसभा और विधान परिषद में जनता के नुमाइंदे ही इसके सदस्य चुनते हैं. बस एक फर्क है. संसद में चाहें कोई भी सदन हो, सभी सदस्य MP कहलाते हैं. लेकिन राज्यों में विधान सभा के सदस्य को MLA और विधान परिषद के सदस्य को MLC कहा जाता है. फिलहाल देश के 6 राज्यों में विधान परिषद हैं- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार और यूपी. पहले जम्मू-कश्मीर में भी विधान परिषद थी, लेकिन केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उसकी मान्यता खत्म हो गई.

उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में कुल 100 सीटें हैं. इन्हें अप्रत्यक्ष वोटिंग के जरिए चुना जाता है.
विधान परिषद का गठन कैसे होता है? संविधान के अनुच्छेद 169 में किसी राज्य में विधान परिषद को बनाने या भंग करने का जिक्र किया गया है. इसके अनुसार, संसद किसी भी राज्य में विधान परिषद का निर्माण या उसे भंग कर सकती है. हालांकि इसके लिए शर्त ये है कि वो राज्य 2 तिहाई बहुमत से इसके लिए प्रस्ताव पास करे. नियमों के अनुसार, ऐसा प्रस्ताव सरकार पर बाध्यकारी नहीं होता. आसान नहीं है विधान परिषद बनाना ममता बनर्जी और गहलोत सरकार ने भले ही विधानसभा में विधान परिषद बनाने को मंजूरी दे दी हो. लेकिन अभी इसमें एक पेच फंस सकता है. नियमों के मुताबिक़, विधानसभा में प्रस्ताव पास होने के बाद इसे संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत से पास होना होगा. माने विधानसभा परिषद का गठन मोदी सरकार की मंजूरी के बिना नहीं हो सकता. राजस्थान ने साल 2012 में और असम की विधानसभा ने 2010 में इस संबंध में संकल्प पारित किए थे. ये अभी भी लटके हुए हैं.

ममता बनर्जी ने भले ही अपनी विधानसभा में विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव पास कर दिया हो लेकिन इस पर आखिरी मोहर मोदी सरकार को लगानी है. फोटो- PTI
कैसे चुने जाते हैं विधान परिषद के सदस्य? विधान सभा के सदस्य 5 साल के लिए चुने जाते हैं. लेकिन विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह साल के लिए होता है. इस इलेक्शन का सिस्टम कुछ ऐसा है,
# यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ विधान परिषद के सदस्य हैं. इसी तरह महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और बिहार के सीएम नीतीश कुमार विधान परिषद के सदस्य हैं. नीतीश कुमार तो जब से मुख्यमंत्री बने हैं, तब से विधान परिषद के सदस्य हैं. ममता बनर्जी की पार्टी ने भले ही बीजेपी को हरा कर बंगाल में सरकार बना ली है, लेकिन ममता बनर्जी अभी किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं. वे विधानसभा का चुनाव हार गई हैं. अगर राज्य में विधान परिषद होती तो सदन में जाने का ये सबसे मुफीद तरीका रहता.
# विधान परिषद होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है असंतुष्टों के गुस्से को कम करना. राज्य में पार्टी जिन लोगों को विधानसभा नहीं भेज पाती, उन्हें आराम से विधान परिषद भेज कर संतुष्ट किया जा सकता है.
# जिसे आनन-फानन में मंत्री पद देना है, उन्हें पद देने के बाद 6 महीने के भीतर कभी भी विधान परिषद का सदस्य बनाया जा सकता है. ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने की टेंशन से मुक्ति मिल जाती है. इस तरह की एक दुविधा हाल ही में उत्तराखंड में देखने को मिली. पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत को अपना पद सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा, क्योंकि वे 6 महीने में असेंबली के सदस्य बनने की स्थिति में नहीं थे. विधानसभा चुनावों में 1 साल से कम वक्त बचने के चलते इलेक्शन कमीशन उपचुनाव करा नहीं सकता और राज्य में विधान परिषद है नहीं, जहां तीरथ सिंह रावत को आनन-फानन में भेजा जा सके. ऐसे में उन्हें हटना ही पड़ा. इस तरह की परिस्थितियों से बचने के लिए भी राज्य विधान परिषद का सपना संजोए रहते हैं.
ये भी बता दें कि सिर्फ यही दो राज्य नहीं हैं जहां विधान परिषद बनाने की मुहिम चल रही है. तमिलनाडु में भी सीएम एमके स्टालिन विधान परिषद गठन का चुनावी वादा कर चुके हैं. विधान परिषद होती क्या है? जैसे केंद्र में दो सदन हैं लोकसभा और राज्यसभा, उसी तरह राज्यों में भी दो सदन हो सकते हैं. एक विधानसभा (Legislative Assembly) और दूसरा विधान परिषद (Legislative Council). जैसे राज्यसभा संसद का उच्च सदन कहलाता है वैसे ही विधान परिषद भी राज्य का उच्च सदन मानी जाती है. संसद में लोकसभा और राज्य की विधानसभा में सदस्य सीधे जनता से चुन कर आते हैं. वहीं, राज्यसभा और विधान परिषद में जनता के नुमाइंदे ही इसके सदस्य चुनते हैं. बस एक फर्क है. संसद में चाहें कोई भी सदन हो, सभी सदस्य MP कहलाते हैं. लेकिन राज्यों में विधान सभा के सदस्य को MLA और विधान परिषद के सदस्य को MLC कहा जाता है. फिलहाल देश के 6 राज्यों में विधान परिषद हैं- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार और यूपी. पहले जम्मू-कश्मीर में भी विधान परिषद थी, लेकिन केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उसकी मान्यता खत्म हो गई.

उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में कुल 100 सीटें हैं. इन्हें अप्रत्यक्ष वोटिंग के जरिए चुना जाता है.
विधान परिषद का गठन कैसे होता है? संविधान के अनुच्छेद 169 में किसी राज्य में विधान परिषद को बनाने या भंग करने का जिक्र किया गया है. इसके अनुसार, संसद किसी भी राज्य में विधान परिषद का निर्माण या उसे भंग कर सकती है. हालांकि इसके लिए शर्त ये है कि वो राज्य 2 तिहाई बहुमत से इसके लिए प्रस्ताव पास करे. नियमों के अनुसार, ऐसा प्रस्ताव सरकार पर बाध्यकारी नहीं होता. आसान नहीं है विधान परिषद बनाना ममता बनर्जी और गहलोत सरकार ने भले ही विधानसभा में विधान परिषद बनाने को मंजूरी दे दी हो. लेकिन अभी इसमें एक पेच फंस सकता है. नियमों के मुताबिक़, विधानसभा में प्रस्ताव पास होने के बाद इसे संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत से पास होना होगा. माने विधानसभा परिषद का गठन मोदी सरकार की मंजूरी के बिना नहीं हो सकता. राजस्थान ने साल 2012 में और असम की विधानसभा ने 2010 में इस संबंध में संकल्प पारित किए थे. ये अभी भी लटके हुए हैं.

ममता बनर्जी ने भले ही अपनी विधानसभा में विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव पास कर दिया हो लेकिन इस पर आखिरी मोहर मोदी सरकार को लगानी है. फोटो- PTI
कैसे चुने जाते हैं विधान परिषद के सदस्य? विधान सभा के सदस्य 5 साल के लिए चुने जाते हैं. लेकिन विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह साल के लिए होता है. इस इलेक्शन का सिस्टम कुछ ऐसा है,
# चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 30 साल होनी चाहिए. # एक तिहाई सदस्यों को विधायक चुनते हैं. मतलब विधानसभा में जिस पार्टी के सदस्य ज्यादा होंगे उसका एक तिहाई सदस्य चुनने में ज्यादा दखल रहता है. # एक तिहाई सदस्यों को नगर निगम, नगरपालिका, जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत के सदस्य चुनते हैं. # 1/12 सदस्यों को शिक्षक और # 1/12 सदस्यों को रजिस्टर्ड ग्रैजुएट चुनते हैं.मिसाल के तौर पर यूपी के विधान परिषद को लेते हैं. यूपी में विधान परिषद के 100 में से 38 सदस्यों को विधायक चुनते हैं. वहीं 36 सदस्यों को स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र के तहत जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC) और नगर निगम या नगरपालिका के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनते हैं. 10 मनोनीत सदस्यों को राज्यपाल नॉमिनेट करते हैं. इसके अलावा 8-8 सीटें शिक्षक निर्वाचन और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के तहत आती हैं. विधान परिषद क्यों? राजनीति के जानकार कहते हैं ये असेंबली में एक बैक डोर एंट्री के दरवाजे की तरह है. मतलब जो जनता से न चुना जाए, उसे विधान परिषद के रास्ते से एंट्री दे दी जाती है. विधान परिषद के महत्व को आप इस बात से भी समझ सकते हैं कि जिन 6 राज्यों में विधान परिषद हैं उनमें से तीन राज्यों के सीएम विधान परिषद के सदस्य हैं. मतलब वो सीधे जनता से चुनकर नहीं आए हैं.
# यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ विधान परिषद के सदस्य हैं. इसी तरह महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और बिहार के सीएम नीतीश कुमार विधान परिषद के सदस्य हैं. नीतीश कुमार तो जब से मुख्यमंत्री बने हैं, तब से विधान परिषद के सदस्य हैं. ममता बनर्जी की पार्टी ने भले ही बीजेपी को हरा कर बंगाल में सरकार बना ली है, लेकिन ममता बनर्जी अभी किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं. वे विधानसभा का चुनाव हार गई हैं. अगर राज्य में विधान परिषद होती तो सदन में जाने का ये सबसे मुफीद तरीका रहता.
# विधान परिषद होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है असंतुष्टों के गुस्से को कम करना. राज्य में पार्टी जिन लोगों को विधानसभा नहीं भेज पाती, उन्हें आराम से विधान परिषद भेज कर संतुष्ट किया जा सकता है.
# जिसे आनन-फानन में मंत्री पद देना है, उन्हें पद देने के बाद 6 महीने के भीतर कभी भी विधान परिषद का सदस्य बनाया जा सकता है. ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने की टेंशन से मुक्ति मिल जाती है. इस तरह की एक दुविधा हाल ही में उत्तराखंड में देखने को मिली. पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत को अपना पद सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा, क्योंकि वे 6 महीने में असेंबली के सदस्य बनने की स्थिति में नहीं थे. विधानसभा चुनावों में 1 साल से कम वक्त बचने के चलते इलेक्शन कमीशन उपचुनाव करा नहीं सकता और राज्य में विधान परिषद है नहीं, जहां तीरथ सिंह रावत को आनन-फानन में भेजा जा सके. ऐसे में उन्हें हटना ही पड़ा. इस तरह की परिस्थितियों से बचने के लिए भी राज्य विधान परिषद का सपना संजोए रहते हैं.

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