मदरसा. नाम सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं. कुछ आतंक का ठप्पा लगाने कीफिराक में रहते हैं तो कुछ उसके कसीदें पढ़ने के तलबगार होते हैं. मैंने मदरसे मेंपढ़ाई की है. और कई मदरसों में भी गया हूं. मदरसा है तो अल्लाह और इस्लाम की तो बातहोगी ही. इसमें किसी को कोई एतराज वैसे ही नहीं होना चाहिए, जैसे बाकी धार्मिकसंस्थानों पर नहीं होता. मैं तो कहता हूं लोग अपने बच्चों को मदरसे भी भेजें. येजानने के लिए कि आखिर खुदा ने हमारे लिए क्या इंतजाम किया है. और क्या चाहता है. औरये मौलवी साहिबान हमसे क्या चाहते हैं. जो हर बात में ये कहकर पाबंदी लगा देते हैंकि शरिया में इसकी इजाजत नहीं है. ये हराम है. वो हराम है. लेकिन सिर्फ मदरसे कीचारदिवारी में ही बच्चों को कैद न होने देना चाहिए. नहीं तो कुएं के मेंढक बनके रहजाएंगे. ज़माने से पिछड़ जाएंगे. दिमागों को रोशन होने दो. टेक्नोलॉजी का दौर है.नीम, हकीम खतरा-ए-जान न बनाओ. अगर मदरसे दीन के लिए जरूरी है तो बाकी पढ़ाई ज़माने सेकदम ताल करने के लिए. उम्र 7-8 साल होगी. मदरसे जाना शुरू किया. 'अलिफ़, बे, ते'पढ़ना प्राइवेट स्कूल में सीख गया था. मेरे घर वालों का मदरसे भेजने का मकसद इतना थाकि मैं इस्लाम की ABCD जान लूं. और कुरान पढ़ना सीख जाऊं. मदरसे में आने वालेज्यादातर बच्चे मेरे साथ ऐसे ही थे जो सिर्फ कुरान पढ़ लेना चाहते थे. उससेमुसलमानों को एक ये फायदा होता है कि जब वो मर मरा जाएंगे तो उनकी औलाद कुरान पढ़ीहुई होगी. तो तिलावत (पढ़कर) करके उनकी रूह को उस पढ़ाई का सवाब बख्श देगी. और उनकेगुनाह कम हो जाएंगे. या फिर अगर उनकी औलाद ने कुरान को हिफ्ज़ कर लिया, तो कईपीढ़ियां जन्नती हो जाएंगी. मतलब यहां भी सारा खेल खुद के लिए जन्नत तलाश लेने तकमहदूद होकर रह गया. यानी होना चाहिए था कि बच्चा इल्म हासिल करता. कुरान में लिखीबातों को समझता. उन्हें अपने अंदर उतारता. लेकिन जन्नत में ऐश करने की चाह मेंमदरसे का मकसद ही कहीं गुम हो गया. इस्लाम इंसानियत को जिंदा रखने वाला है, उस सबकका पन्ना इस जन्नत की चाह में इतना बोसीदा हो गया कि जेहाद ने उस पर आतंक की स्याहीपोत दी. बड़ी हैरानी होती है जो मां बाप सब कुछ बच्चों से ही करा लेना चाहते हैं.यहां तक कि अपनी जन्नत का इंतजाम भी. अगर उन्होंने खुद अच्छे से इस्लाम की बुनियादीबातों को फ़ॉलो किया होता तो ये नौबत न आती कि वो अपने बच्चों से अपने मरने के बादसवाब बख्शने की उम्मीद रखते. इस्लाम ने कहा झूठ न बोलो, क्योंकि हर जुर्म की शुरुआतयहीं से होती है. लेकिन सबसे ज्यादा झूठ खुदा की कसम खाकर ही बोला. इस्लाम ने कहाकिसी को न सताओ. अपनी औलाद के लिए दौलत जोड़ने की चाह में ये ध्यान ही नहीं रखा किजो कर रहे हैं उससे किसी को कोई नुकसान तो नहीं. इस्लाम ने कहा इल्म हासिल करो. मगरमौलवियों पर ही डिपेंड होकर रह गए, जिधर हांक देंगे उधर चल पड़ेंगे. मेरे मां-बाप नेअनपढ़ होते हुए एक काम ये अच्छा किया था कि मुझे स्कूल भी भेजते थे और शाम को मदरसाभी. अच्छा इसलिए क्योंकि बहुत से बच्चे मेरे साथ के ऐसे थे जो या तो सिर्फ मदरसाजाते थे या फिर स्कूल. खुदा की नेमत थी या फिर ये मेरा नसीब कि मदरसे में मौलाना भीऐसे मिले. जो लगा ही नहीं ये मौलाना हैं क्योंकि बिल्कुल खुल्ला मिजाज के. बात बातमें अल्लाह से न डराने वाले. बच्चों के साथ बच्चे. नाम क्या था वो याद नहीं रहा.मगर एक तस्वीर है जो सिर्फ दिमाग में है. मेरा बचपन ऐसा था कि अगर हम कोई खेल खेलतेतो उस खेल को शैतानी का जामा पहना दिया जाता था. कहा जाता मौलाना से शिकायत होगी तोअक्ल ठिकाने आ जाएगी. मगर मौलना तो खुद हमारे साथ कभी क्रिकेट खेलते थे तो कभीलूडो. हां ये वही लूडो थी जिसे हम घर में खेलना चाहते थे तो कहा जाता ये शैतानी कामहै. घर की खैर-ओ-बरकत जाती है इससे. यानी कमा तो हम खुद से नही रहे. दोष लूडो पर.मदरसे में पढ़े. मौलाना ने हमेशा ये ही कहा. स्कूल जरूरी है. अगर तुम्हें कामयाबहोना है तो. अगर अपना पेट भरना है तो. बेशक दीन तुम्हें अल्लाह से मिलाएगा. बेशकदीन तुम्हें सही राह दिखाएगा. बेशक अल्लाह तुम्हारे खाने का इंतजाम करेगा. लेकिन येसब किसके जरिए होगा. तुम्हारे खुद के जरिए होगा. अल्लाह ये नहीं करेगा कि तुम मदरसेआते हो और दीन को समझ रहे तो तुम्हें और तुम्हारी फैमिली को आकर वो खिलाए या कामकरके पैसे दे. करना तुम्हें खुद ही होगा. और ऐसा कहां लिखा है कि जो मौलवी है वोइंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता. जो मौलवी है वो साइंस को नहीं जान सकता. अगर किसीको बुखार आ गया तो क्या वो अल्लाह से दुआ करेगा कि अल्लाह मुझे पैरासिटामोल कीटेबलेट दे दे. या फिर किसी मौलवी के पास जाकर कहेगा. कि मौलवी साहब जरा आयत पढ़के तोबताओ, मुझे बुखार कितने डिग्री है. उन्होंने ये ही सबक दिया इल्म हासिल करो, ताकिकोई तुम्हें बेवक़ूफ़ न बना सके. क्योंकि इस्लाम कहता है कि इल्म वो चीज है जो इंसानको इंसान के दायरे में रखता है. शैतान नहीं बनने देता. सोसाइटी को जुल्म से बचाताहै. शैतानियत को दूर करता है. जिंदगी को बामकसद बना देता है.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ेंदहेज के लुटेरों, 'मेहर' देते वक्त ही शरीयत क्यों याद आती है?