वॉट्सऐप पर आने वाली वो 'सस्ती' लाइन तो आपने पढ़ी ही होगी कि अगर पांच सेकेंड कीस्माइल आपकी एक फोेटो को इतना सुंदर बना सकती है, तो सोचिए हमेशा स्माइल करनेपर आपकी पूरी ज़िदगी कितनी सुंदर हो जाएगी. लोगों के पास इसका जवाब भी होता हैकि 'यार, पूरे दिन बत्तीसी दिखाते रहेंगे, तो लोग हमें पागल समझेंगे.'वैसे आपको जानकर हैरानी होगी कि एक दौर ऐसा था, जब फोटो खिंचाते समय स्माइल करनापागलपन माना जाता था. लोग फोटो खिंचाते थे, लेकिन हंसते नहीं थे. 19वीं सदी और20वीं सदी की शुरुआत की तस्वीरों में हमें लोग शादियों जैसे बड़े मौकों पर भी दुखीचेहरा बनाए दिखते हैं. वो शादी की कम और मातम की तस्वीरें ज़्यादा लगती हैं.अब साल 1900 की ये तस्वीर ही देख लीजिए. शादी की इससे डिप्रेसिंग फ़ोटो भला खींचीहोगी किसी ने...पर क्या आप जानते हैं कि पहले लोग तस्वीरों में ऐसे क्यों दिखते थे, जैसे उन्हेंकिसी ने उनकी जिंदगी की सबसे बुरी खबर सुना दी हो? इस पर कई लोगों ने रिसर्च की औरजो नतीजे आए, वो आपके सामने हैं:#1. टेक्नोलॉजी का दोष19वीं सदी में कैमरा एक्सपोज़र के लिए लंबा समय लेता थे. कोई कैमरा फ़ोटो खींचनेमें जितना समय लेता है, उसे एक्सपोज़र टाइम कहते हैं. आज बटन दबाने पर तुरंत केतुरंत फ़ोटो खिंच जाती है, लेकिन एक समय ऐसा था, जब एक फ़ोटो लेने में 8-10 मिनट लगजाते थे. ऐसे में लोगों को इतनी देर तक बिना हिले-डुले खड़े रहने को कहा जाता था,ताकि फोटो ब्लर न आए.दुनिया की पहली फ़ोटो 1820 के दशक में ली गई थी. चूंकि कैमरे बहुत ज़्यादाएक्सपोज़र टाइम लेते थे, इसलिए फ़ोटो में स्माइल बनाए रखना बड़ा मुश्किल हो सकताथा. वहीं गंभीर चेहरा बनाए रखना ज़रा आसान. 1900 तक कैमरे कम एक्सपोज़र टाइम लेनेलगे. फिर भी आज के कैमरों के मुकाबले वो स्लो थे. लेकिन इतने भी स्लो नहीं कि लोगोंकी स्माइल कैद न कर सकें.#2. जब कैमरे नहीं थे, तब लोग खुद की पेंटिंग्स बनवाया करते थे- यानी कोई स्माइलनहींजब तक कैमरे का अविष्कार नहीं हुआ था, तब लोग अपनी तस्वीरें बनवाया करते थे. इसमेंउन्हें घंटों तक एक ही पोजीशन में बने रहना होता था. इसलिए वो अपने चेहरे पर स्माइलनहीं लाते थे. बिना किसी एक्सप्रेशन के एक ही जगह पर खड़े या बैठे रहते. येएक्सप्रेशन न देने वाला रिवाज़ कैमरे आने के काफ़ी बाद तक भी बना रहा. हो सकता हैलोग कैमरे आने के बाद भी पेंटिंग्स वाला ट्रेंड फ़ॉलो करते हों, इसलिए स्माइल नकरते हों. डार्विन चचा की थ्योरी की तरह.#3. स्माइल को एक समय में बेवकूफ़ाना माना जाता थाआज की जनता को देखो. फोटो खिंचाने से भी एक कदम आगे बढ़ गई है. सेल्फी लेती है.पाउट बनाकर, दांत चियारकर. लेकिन उस समय फ़ोटो में ऐसा करना सिर्फ़ बच्चों,एंटरटेनर या बेवकूफ़ों का काम समझा जाता था. अमेरिकी लेखक और विचारक मार्क ट्वेनप्रोफ़ेशनली मज़ाकिया व्यक्ति थे, लेकिन फोटो खिंचवाते समय किस तरह का चेहरा बनातेथे, वो आप नीचे देख लीजिए.मार्क ट्वेन1820 से 1920 तक लोगों को लगभग 100 साल लग गए ये सीखने में कि उन्हें फोटोज़खिंचवाते वक़्त स्माइल करना चाहिए.एक थ्योरी ये भी है कि उस समय लोगों को डेंटल प्रॉब्लम्स बहुत होती थीं. इसलिए लोगफोटो में नहीं मुस्कुराते थे. लेकिन जब सबके ही दांत ख़राब हैं, तो दांत दिखाने मेंक्या बुराई है? यही सोचकर ये वाली थ्योरी कुछ ग़लत मालूम पड़ती है.जब ऐसा ही है तो ये आदमी क्यों हंसता दिख रहा है?अमेरिका के नेचुरल हिस्ट्री लाइब्रेरी म्यूज़ियम में रखी एक तस्वीरये तस्वीर 1904 में बर्थोल्ड लॉफ़र ने खींची थी. ये उनके चाइना दौरे के कलेक्शन मेंसे एक है. फ़िलहाल ये अमेरिका के नेचुरल हिस्ट्री लाइब्रेरी म्यूज़ियम में रखी है.फ़ोटोग्राफ़र बर्थोल्ड लॉफ़र एक ऐन्थ्रपॉलजिस्ट थे, यानी इंसानों के व्यक्तित्व कोसमझने की कोशिश करने वाले. इसलिए वो अपने समय के बाकी फ़ोटोग्राफ़र्स से ज़रा अलगतस्वीरें लेने के मिशन पर थे.उन्होंने लोगों के अलग-अलग इमोशंस अपने कैमरे में कैद किए. अब हम अपनी मैगी खातेहुए कि तस्वीर फ़ेसबुक पर डाल देते हैं, लेकिन वो यादगार बस हमारे लिए होती है. येआदमी इस फ़ोटो में चावल खा रहा है, इसमें इतना खुश होने की क्या बात है? लेकिन उससमय ऐसी तस्वीरें कम खींची जाती थी, इसलिए ये सभी के लिए एक यादगार तस्वीर बन गई.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:जंगल वो जगह है, जहां बिल्ली भी लोमड़ी को घुड़क देती हैदुनिया को हिला देने वाली तस्वीरों की लिस्ट जारी हुई हैअस्थाना देखा, वायरस देखा, खुराना देखा पर बोमन की खींची इन 60 फोटो को न देखा तोक्या देखा!इन तस्वीरों को देख 'फीलिंग चुम्मेश्वरी' हो जाएंगे आपजर्मनी वालों ने उड़ती कार बना ली, एक 'लेकिन' के साथ