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बस्तर के जंगल में होती हैं सबसे ज्यादा हत्याएं लेकिन असल जंगली शहरों में बसते हैं!

बताया जाता है कि कोडानेर में मांगने पर बीड़ी न दो तो हत्या हो जाती है, लेकिन क्या वाकई एेसा है?

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22 फ़रवरी 2017 (अपडेटेड: 22 फ़रवरी 2017, 03:19 PM IST)
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बस्तर में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करते आदिवासी; गुजरात के ऊना में दलितों को सरेआम पीटते "शिक्षित", "सभ्य" इंसान.
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छत्तीसगढ़. इसका बस्तर जिला, जिसे सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता रहा है. कभी पढ़ा था कि अपने प्रसार में ये बेल्जियम और स्विट्ज़रलैंड से भी बड़ा था. नक्सल प्रभावित इलाका. पुलिस और नक्सलियों में संघर्ष यहां जारी है. हिंसक घटनाओं में लोगों की जानें जाती रहती हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में सबसे ज्यादा हत्याएं होती हैं. दावा कि बस्तर के कोड़ानेर थाने में सबसे ज्यादा हत्याओं के मामले दर्ज हैं. इसे एशिया का सबसे कुख्यात थाना तक कह दिया गया है. बताया गया है कि यहां कम-ज्यादा नमक, मुर्गे और बीड़ी जैसी चीजों के लिए क़त्ल हो जाते हैं. अंधविश्वास के नाम पर भी लोगों को मार दिया जाता है. कोड़ानेर थाना बस्तर जिले के हेडक्वार्टर जगदलपुर से 40 किलोमीटर दूर स्थित है. 1982 में थाना बना था. तब से अब तक 500 से ज्यादा मर्डर यहां दर्ज किए जा चुके हैं. यहां के आईजी ऑफिस से मर्डर के रिकॉर्ड 1982 के आठ साल बाद 1990 से ही मिल पाते हैं. उस आंकड़े के हिसाब से 307 मर्डर हुए हैं. 2003 के बाद का जो रिकॉर्ड कोड़ानेर थाने में है, उसके आधार पर यहां 14 साल में 174 मर्डर के केस सामने आए हैं. इस आदिवासी बहुल इलाके में अशिक्षा है. बताया गया है कि कभी-कभी तो मुर्गों की लड़ाई में ही कुल्हाड़ी चल जाती है. पुलिस का दावा है कि यहां कोई बीड़ी मांगे और दूसरा न दे तो इसी पर मार दिया जाता है. लेकिन बाद में जब अपनी गलती का अहसास होता है तो पश्चाताप में वो खुद थाने पहुंचकर सरेंडर कर देते हैं. हत्या के कुछ मामले ऐसे भी बताए जाते हैं जिनमें खाना बनने में देर हो गई तो पुरुषों ने मां या बीवी को मार दिया गया. कुछ मामलों में 25 रुपये के लिए किसी को मार दिया. किसी को इमली बेचने के लिए तो किसी को सिर्फ नमक के लिए मार दिया गया. ये तो रही रिपोर्ट और पुलिस के हिसाब से कही बातें. लेकिन क्या हम इन पर यकीन सिर्फ इसलिए आसानी से कर लेंगे क्योंकि ये लोग जंगल में रहते हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं, 'सिविलाइज़्ड' नहीं हैं या इसलिए कि ये नक्सलियों का इलाका है और वे तो 'होते ही बुरे हैं.' अभी ये ज्ञात नहीं है कि क्या सारे पांच सौ से ज्यादा मर्डर गुस्से के कारण हुए हैं? क्या हम ये नहीं जानते कि किस प्रकार पुलिस तय समय सीमा पर केस क्लोज़ करने के दबाव में लोगों को फंसाती है? नक्सली होने के शक में किसी को भी मार देना तो बड़ा आसान है. फिर हत्या के लिए किसी को भी फंसा दो. क्या हम ये नहीं जानते कि नक्सल प्रभावित इलाका होने के कारण वहां लोगों के नागरिक अधिकार न्यूनतम हैं और इस वजह से कानून-कायदे वाले अपने हिसाब से थ्योरीज़ बना लेते हैं और रजिस्टर में जो लिखना होता है लिख लेते हैं?
इस जंगल वाले इलाके में हत्याएं होती है तो हम सोच लेते हैं कि जंगली लोग हैं और भला क्या करेंगे लेकिन सही मायनों में असल जंगली कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतों में बसते हैं. जंगल की घटनाओं को शर्म आ जाए एेसी बातें मुंबई, बेंगलुरु जैसी आधुनिक सभ्यताओं में होती हैं. ग्रामीण इलाके को गुस्सा आता होगा लेकिन शहरी लोगों का गुस्सा तो बेजां ही है. वे तो शिक्षित, सभ्य हैं भला फिर उन्हें गुस्सा क्यों आता है? 
दिल्ली जैसे शहर में कुछ रोज़ पहले एक आदमी ने दूसरे को सिर्फ इस बात के लिए मना किया कि वो उसके घर के सामने शराब न पिए. बदले में शराब पी रहे आदमी ने उसे और उसके दो बच्चों पर तेज़ाब फेंक दिया. साउथ के महानगर में एक औरत ने एक कुतिया के बच्चों को जहर दे दिया क्योंकि उसे पसंद नहीं था कि वो उसके इलाके में पले-बढ़ें. एक एेसी ही सोसायटी में एक आदमी ने एक मां-बेटी को इसलिए बुरी तरह पीटा क्योंकि वो सोसायटी के गेट के पास कुत्ते को खाना खिला रही थीं. मुंबई में भी ये आम है. करोड़ रुपए की गाड़ी में बैठे लोग सबसे सभ्य होते होंगे लेकिन रोड़ रेज़ के मामले में उनका बर्ताव देख लें तो मानवता के ऊपर से विश्वास उठ जाए. गाड़ी के गलती से मामूली स्क्रैच लग जाए तो सामने वालों को पीट-पीट कर अधमरा कर देते हैं. मेट्रो में धक्का लग जाए तो खैर मना लीजिएगा. शहरों में छोटी सी बात गालियां से गोलियों तक कब पहुंच जाती है पता भी नहीं चलता. इतने सब के बाद अब एंगर मैनेजमेंट की क्लास हम शहर में बैठे लोगों को लेने की जरूरत है कि जंगल में बैठे आदिवासी को, ये समझ पाना इतना भी मुश्किल नहीं है.
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