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1 जनवरी से महंगे होने जा रहे कपड़े अभी ‘सस्ते’ कैसे हो गए हैं?

GST तो जनता चुकाएगी, सड़कों पर ट्रेडर क्यों?

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23 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 24 दिसंबर 2021, 07:54 AM IST)
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सांकेतिक तस्वीर, (साभार:आजतक)
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1 जनवरी से कपड़े महंगे होंगे, यह खबर तो आप सुनते ही आ रहे हैं. लेकिन इस महंगाई की टेंशन आपसे ज्यादा कपड़ा कारोबारियों को है. सभी तरह के क्लॉथ और फैब्रिक्स पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) की दर 5 पर्सेंट से बढ़कर 12 पर्सेंट होने जा रही है. इसका अंतिम बोझ तो कंज्यूमर को ही उठाना है. फिर सूरत से लेकर कोलकाता तक व्यापारी आंदोलन के मूड में क्यों हैं?
इसकी वजह टैक्स की कई पेचीदगियां हैं. इन्हें हम आगे आसान भाषा में समझाएंगे. लेकिन पहले यह जान लीजिए कि नए साल में GST की बढ़ी हुई दरें लागू होने से पहले अधिकांश व्यापारी स्टॉक क्लियर कर लेना चाहते हैं. ऐसे में कुछ स्टोर्स पर ‘सेल्स’ और ‘ऑफ’ के बैनर भी टंग गए हैं. ऐसा इसलिए कि जो माल 5 पर्सेंट टैक्स चुकाकर लाए हैं, उन पर सरकार को 12 पर्सेंट टैक्स देना होगा. सरकार से 5 पर्सेंट इनपुट क्रेडिट तो मिल जाएगा, लेकिन अतिरिक्त 7 पर्सेंट उन्हें अपनी जेब से चुकाना होगा. पॉलिस्टर खुश, कॉटन नाराज क्यों? जीएसटी काउंसिल ने पिछली बैठक में सिंथेटिक, कॉटन, वूलन सहित सभी तरह के क्लॉथ फैब्रिक्स पर GST की मौजूदा दर 5 पर्सेंट से बढ़ाकर 12 पर्सेंट करने का फैसला किया था. ऊपर से यह अहसान भी जता दिया कि कपड़ा उद्योग की ही मांग पर और एक पुरानी समस्या दूर करने के लिए ऐसा किया गया है.
समस्या यह थी कि जितने भी सिंथेटिक और पॉलिस्टर मैन्युफैक्चरर हैं, उनके कच्चे माल पर GST रेट 12 से 18 पर्सेंट तक है. लेकिन उनके अपने उत्पाद पर 5 पर्सेंट टैक्स लगता है. इससे इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (IDS) नाम की एक टैक्स समस्या खड़ी होती है (इसे आगे पढ़ें). यानी वो अपनी हर बिक्री के बाद सरकार को तो 5 प्रतिशत टैक्स देते हैं, लेकिन उल्टे 12 पर्सेंट रिफंड मांगते हैं. सरकार रिफंड में देरी तो करती ही है, कई बार मिलता भी नहीं है. इससे उन्हें घाटा होता है. उनकी मांग थी कि इनपुट यानी खरीद पर टैक्स रेट, आउटपुट यानी बिक्री के टैक्स रेट के बराबर किया जाए या घटा दिया जाए.
सरकार ने सभी तरह के फैब्रिक्स पर 5 पर्सेंट की जगह 12 प्रतिशत रेट करने का फैसला किया और कह दिया कि लो जी, अब इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की समस्या नहीं आएगी. इससे सिंथेटिक और पॉलिस्टर मैन्यूफैक्चरर्स को तो राहत मिल गई, लेकिन देश में 60-70 पर्सेंट तादाद कॉटन बेस्ड फैब्रिक्स बेचने वालों की है, जिनका टैक्स रेट दोगुने से भी ज्यादा हो जाएगा.
Cloth Yarn
टेक्सटाइल यार्न (साभार: आजतक)
इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर भी समझ लें जब कच्चे माल पर टैक्स रेट ज्यादा हो और नए तैयार माल पर कम हो, तब यह समस्या आती है. कारोबारी का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) उसके अपने टैक्स से भी ज्यादा हो जाता है. कानूनन सरकार यह अतिरिक्त रकम लौटाने को बाध्य है. अब आप सोच रहे होंगे कि यह इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है?
इसे यूं समझिए कि GST हमेशा माल के वैल्यू एडिशन पर लगता है. यानी कोई 1000 रुपये का माल खरीदकर 1200 रुपये में बेचेगा. तो 5 पर्सेंट की दर से उसकी टैक्स देनदारी पूरे 1200 पर 60 रुपये न होकर केवल कमाए गए 200 रुपये पर, यानी 10 रुपये होगी. लेकिन शुरू में टैक्स उससे 1200 पर ही यानी 60 रुपये वसूला जाता है, फिर उसने 1000 रुपये की अपनी खरीद पर 5 पर्सेंट की दर से जो 50 रुपये चुकाए थे, उसे लौटा दिया जाएगा. इस लौटाई जाने वाली रकम को इनपुट टैक्स क्रेडिट कहते हैं.
आम तौर पर इसे लौटाने की नौबत नहीं आती. इसे आगे की देनदारियों में एडजस्ट कर लिया जाता है. लेकिन जहां इनपुट टैक्स ही आउटपुट टैक्स से ज्यादा हो, जैसा कि कई तरह के कपड़ा कारोबारियों के साथ देखने को मिल रहा था, वहां उलटे सरकार को अधिक रकम लौटाने की नौबत आ जाती है. इसी को इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर कहते हैं. समस्या घटी नहीं, बढ़ गई जीएसटी एक्सपर्ट्स की मानें तो सरकार ने रेट बढ़ाकर जितने लोगों को राहत दी, उससे ज्यादा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. उद्योग संगठन पीएचडी चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (PHDCCI ) की इनडायरेक्ट टैक्स कमिटी के चेयरमैन बिमल जैन ने ‘दी लल्लनटॉप’ को बताया,
"चूंकि ज्यादातर टेक्सटाइल प्रॉडक्ट्स पर GST की दर 5 पर्सेंट से 12 पर्सेंट हो जाएगी, ऐसे में समस्या घटने के बजाय बढ़ गई है. समस्या तो यह थी कि रॉ मैटीरियल पर टैक्स ज्यादा है. ऐसे में सरकार को चाहिए था कि इस सेक्टर के लिए कच्चे माल पर रेट 18 और 12 से घटाकर 5 पर्सेंट कर दे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अगर सरकार की नीयत इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को हटाने की होती तो उसने साल 2018 में टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए ‘आईटीसी रिवर्सल’ अनिवार्य नहीं किया होता. टैक्स रेट का अंतिम बोझ तो आम कंज्यूमर पर पड़ेगा ही. लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इस सेक्टर का बड़ा हिस्सा असंगठित है. यह बड़े पैमाने पर रोजगार देता है. ऐसे में सप्लाई चेन में कई दिक्कतें पेश आएंगी, जिससे लोगों की रोजीरोटी पर भी असर पड़ेगा."
1 जनवरी से पहले ‘सेल ’ क्यों?
GST एक्सपर्ट बिमल जैन कहते हैं कि एक बड़ी समस्या 5 पर्सेंट और 12 पर्सेंट के ट्रांजिशन पीरियड में आएगी. बड़े पैमाने पर व्यापारियों का मौजूदा स्टॉक 5 पर्सेंट टैक्स चुकाकर खरीदा गया है. अब इस स्टॉक को बेचने के बाद सरकार तो उनसे 12 पर्सेंट  टैक्स वसूलेगी, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट 5 पर्सेंट के हिसाब से ही बनेगा. बाकी 7 पर्सेंट टैक्स उन्हें अपनी जेब से देना होगा. इसके दो नतीजे हो सकते हैं. या तो व्यापारी 1 जनवरी से पहले अपना सारा माल बेचने की कोशिश करेगा. ऐसा नहीं कर पाया तो बचा हुआ माल कैश में बेचेगा यानी टैक्स चोरी होगी.
टेक्सटाइल इंडस्ट्री और मार्केट से जुड़े कुछ और लोगों ने बताया कि 5-7 पर्सेंट मार्जिन पर काम करने वाले ट्रेडर तो हर हाल में चाहेंगे कि 1 जनवरी से पहले ही माल निकाल दें. यही वजह है कि नई दर लागू होने से पहले होलसेल और रिटेल दोनों जगहों पर डिस्काउंट दिए जा रहे हैं। बोझ जनता पर, ट्रेडर सड़क पर क्यों? कपड़े के मामले में ग्राहकों पर नए साल से दोहरी मार पड़ेगी. एक तो महीनों से कॉटन के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे पहले ही ज्यादातर फैब्रिक्स महंगे हो चुके हैं. ऊपर से GST की बढ़ी हुई दरों के चलते कीमतें और बढ़ेंगी. करीब 20 हजार टेक्सटाइल और फैब्रिक्स ट्रेडर्स की नुमाइंदगी करने वाले दिल्ली हिंदुस्तानी मर्केंटाइल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अरुण सिंघानिया ने बताया,
‘25-30 पर्सेंट पॉलिस्टर निर्माताओं को राहत देने के लिए सरकार ने करीब 70 पर्सेंट ट्रेडर्स को मुश्किल में डाल दिया है. मैन्यूफैक्चरर और ट्रेडर तो इस महंगाई को आगे बढ़ाते हुए बोझ ग्राहक पर डालते जाएंगे. लेकिन इससे जो सेल्स घटेगी, वह हमारा ही नुकसान होगा.’
अरुण सिंघानिया ने बताया कि दशकों तक क्लॉथ टैक्स फ्री रहा है. वैट रिजीम में भी एक मूल्य सीमा तक कपड़ों पर कोई टैक्स नहीं था. लेकिन जिस तरह अब एकतरफा टैक्स लगाया जा रहा है, साफ है कि सरकार अब कपड़ों को आम आदमी के लिए जरूरी वस्तु नहीं मानती.
Cloth Traders
प्रदर्शन करते कपड़ा व्यापारियों की फाइल फोटो (साभार: आजतक)

पिछले दिनों देश भर के कपड़ा कारोबार से जुड़े प्रतिनिधियों ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की थी. अधिकांश की यह शिकायत भी है कि बड़े पैमाने पर असंगठित यह क्षेत्र उधारी पर काम करता है. यहां पेमेंट महीनों लंबित रहती है. लेकिन जीएसटी कानून में एक समय सीमा तक आपसी भुगतान नहीं होने पर भी पेनल्टी का प्रावधान है. अब टैक्स बढ़ने के साथ ही पेनल्टी भी बढ़ जाएगी. इससे छोटे कारोबारी प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगे. अभी तक जहां क्लॉथ फैब्रिक्स पर 5 पर्सेंट टैक्स लगता था, वहीं  1000 रुपये से नीचे के रेडीमेड गारमेंट पर 5 पर्सेंट और 1000 से महंगे गारमेंट पर 12 पर्सेंट जीएसटी था. अब सभी तरह के गारमेंट पर भी 12% ही टैक्स देना होगा.

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