सोमालिया के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को क्यों बर्खास्त कर दिया?
समुद्री डाकुओं वाले देश में राजनैतिक उथल पुथल का कारण क्या बना?
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समुद्री डाकुओं वाले देश में राजनैतिक उथल पुथल का कारण क्या बना?
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घर के पिछवाड़े में एक गमला भी टूटे, तो उसमें भी एक आवाज़ तो ज़रूर शामिल होती है, ज़रूर अमेरिका ने कुछ किया होगा. यूं तो दुनिया में कहीं कुछ हो, उसमें अमेरिका का नाम आए, ये क्लीशे बन चुका है. लेकिन सुधी जन बताते हैं कि कोई भी क्लीशे, यूं ही क्लीशे नहीं बन जाता. उसके पीछे कुछ ना कुछ सच्चाई का पुट होता है. और बात तेल की हो तो इस क्लीशे को थोड़ा और बल मिल जाता है. आज की खबर सोमालिया से है. इस देश का नाम तो आपने सुना ही होगा. भूखे बिलखते बच्चों की मदद की गुहार लगाती तस्वीरों के नीचे ये नाम हर सोशल मीडिया पर मौजूद है.
पहले नक़्शा समझ लीजिए. अफ़्रीका का नक़्शा देखिए. येमन से ठीक नीचे. एक सींग का आकार बनता है. इसे हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका कहा जाता है. और इस पर बसा है सोमालिया. सोमालिया की राजधानी है मोगादिशू. पश्चिम में इथोपिया. उत्तर-पूर्व में जिबूती. दक्षिण-पश्चिम में केन्या. पूरब में है हिंद महासागर. उत्तर में अदन की खाड़ी. और खाड़ी के पार साउदी अरब, ओमान, यमन और कतर जैसे देश.
आ गई ना तेल की बात. खाड़ी के देशों की ही तरह अफ़्रीका का ये देश भी कच्चे तेल का भंडार है. कई दशकों तक चले गृह युद्ध के बाद यहां थोड़ी शांति आई है. वैसे तो शांति कहीं आती जाती नहीं. वो सदा मौजूद रहती है. आती है तो अशांति. जो दुबारा दस्तक दे रही है. वैसे तो मुख्य खबर है, यहां की राजनीति में शुरू हुई रस्साकशी. लेकिन पीछे का खेल जुड़ा है तेल से. और तेल है तो फिर… यू गॉट इट.
मोटा-मोटी खबर है कि सोमालिया के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया है. प्रधानमंत्री का कहना है कि संविधान के तहत राष्ट्रपति ऐसा नहीं कर सकते. बाकी तो जो है सो है ही, लेकिन बात फ़ंस गई है सेना पर. प्रधानमंत्री का कहना है, मेरी मानो. राष्ट्रपति कह रहे है, ऐसे कैसे. फ़ायदा मिल रहा है, आतंकी संगठनों को. ख़तरा है दुबारा 2010 जैसे हाल होने का. जब देश गृह युद्ध से गुजर रहा था.
वैसे सोमालिया की हालत अभी भी कुछ खास दुरुस्त नहीं है. देश कोरोना और भुखमरी की मार झेल रहा है. लेकिन एक स्टेबल राजनैतिक सिस्टम है जो कुछ सालों से चल रहा है. इसके ढहते ही आ सकती है, भयंकर त्रासदी और अशांति.
आप कहेंगे हमें क्या. तो हम कहेंगे, वो क्या है कि अशांति का एक और नियम है. ये जब आती है तो एक जगह पर सीमित नहीं रहती, फैलती जाती है. इसलिए जानिए, क्या है सोमालिया की कहानी. क्या कुछ चल रहा है वहां की राजनीति में. और इसमें तेल और फिर अमेरिका का क्या लेना-देना है
आगे बढ़ने से पहले थोड़ा सा इतिहास जान लेते हैं.
औपनिवेशिक दौर में हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका पर ब्रिटेन का कब्जा था. लेकिन सिर्फ़ ब्रिटेन का ही नहीं. नॉर्थ-ईस्ट और सेंट्रल सोमालिया में इटली ने कब्जा किया था. इसलिए सोमालिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग सांस्कृतिक प्रभाव पड़े. सोमालिया के वर्तमान राष्ट्रपति भी इटली के प्रभाव वाले हिस्से से आते हैं.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब UN बना तो उसने अफ़्रीका महाद्वीप में शांति और स्टेबिलिटी लाने की कोशिश की. दस सालों की कोशिश के बाद 1960 तक इटली के कब्जे वाले एरिया में एक पॉलिटिकल सिस्टम डिवेलप हो पाया. लेकिन ब्रिटेन के आधिपत्य वाले इलाक़े में क़बीलाई संस्कृति ज्यों की त्यों बनी रही.
1961 के आते आते सोमालिया में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संविधान सब कुछ तैयार हो गया. लेकिन कबीलों की आपसी रंजिश के चलते हालात नाज़ुक थे. कबीलों को सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए थी. लेकिन लोकतांत्रिक तरीक़े का उन्हें जरा भी अनुभव नहीं था. छोटा सा देश है, फिर भी नॉर्थ, साउथ, वेस्ट, ईस्ट का झंझट बना रहता था. फिर आया 1969. तब इसी झगड़े के चलते सोमालिया के प्रेसिडेंट अब्दी राशिद अली की हत्या कर दी गई.
इसके बाद सोमालिया पर सेना की तानाशाही क़ाबिज़ हो गई. संविधान, संसद सब कुछ भंग कर दिया गया. 1976 में तय हुआ कि सिर्फ एक पार्टी चुनाव लड़ेगी.
जैसा कि आमतौर पर होता है, सेना का अध्यक्ष, राष्ट्राध्यक्ष बना तो उसने युद्ध का रास्ता चुना. 1977 में सोमालिया ने पड़ोसी देश इथियोपिया पर हमला कर दिया. कारण था, एक और क्लीशे. यानी ज़मीन का एक टुकड़ा. जिसके लिए दुनिया की अधिकतर जंग लड़ी गई थीं. और लड़ी जा रही हैं. ब्रिटिश राज के दौरान ज़मीन का एक टुकड़ा इथियोपिया और सोमालिया के बीच फंसा रह गया था. इसी के चलते दोनों देशों में युद्ध शुरू हुआ.
कोल्ड वॉर के दिन थे. रूस ने इथियोपिया का साथ दिया तो अमेरिका ने सोमालिया का.
जब तक लड़ाई ख़त्म हुई. दोनों देश चौपट हो चुके थे. अमेरिका और रूस नहीं. वो कहां होते हैं. चौपट हुए इथियोपिया और सोमालिया. दोनों देशों में तेल के अथाह भंडार थे. लेकिन स्टेबल सत्ता के अभाव में तेल का कारोबार करे कौन.
1982 में सोमालिया में इसाक खानदान के नेतृत्व में नेशनल मूवमेंट हुआ. जवाब में मिलिट्री ने 50 हज़ार लोगों की हत्या कर दी. 7 लाख लोगों को देश छोड़कर इथियोपिया और जिबूती भागना पड़ा. अमेरिका और रूस के हटने से बाहर से पैसा आना बंद हो गया था. जिसके चलते 90 के दशक में सोमालिया में भयंकर अकाल पड़ा.
UN ने मदद की पेशकश की लेकिन हालात इतने भयावह थे कि 1995 तक UN को भी सोमालिया में अपने प्रोग्राम बंद करने पड़े. खाने के लाले पड़े थे. लेकिन जंग से फ़ुरसत फिर भी नहीं थी. 2004 तक मारकाट चलती रही. बड़ी मुश्किल से 2004 में जाकर एक राष्ट्रपति नियुक्त हुए.
लेकिन तब तक धार्मिक कट्टरपंथ ने सोमालिया में अपनी जड़ें जमा ली थीं. देश के हालात बदतर थे. ना खाने को कुछ, ना पहनने को. मौक़ा देखकर अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों ने सोमालिया को रिक्रूटिंग का नया अड्डा बना लिया. 2007 के आसपास यहां एक और आतंकी संगठन ने जन्म लिया, अल-शबाब.
2011 में सोमालिया में एक और भयंकर अकाल पड़ा. अफ्रीकी देशों के समूह ने कोशिश की कि कैसे भी करके एक स्टेबल सत्ता बिठाई जाए. उसी दौर में सोमालिया में समुद्री डाकू पैदा हुए. ये लोग हिंद महासागर में जहाजों पर लूट-पाट मचाते. वो दौर था कि सोमालिया को डाकुओं के देश के नाम से जाना जाने लगा.
दुनिया के बड़े देशों का व्यापार हिंद महासागर से होता था. इसलिए इंटरनेशनल कम्यूनिटी ने इधर ध्यान देना शुरू किया. ताकी कोई पॉलिटिकल सॉल्यूशन निकाला जा सके.
2012 में सोमालिया में 45 साल बाद चुनाव हुए. अकैडमिक और सोशल एक्टिविस्ट हसन शेख मोहम्मद राष्ट्रपति बने. पर 2015 में इन्होंने भी सिक्यूरिटी का हवाला देते हुए अगले चुनाव की बात टाल दी. बात बेजा भी नहीं थी. जब भी चुनाव की बात आती. कभी यहां तो कभी वहां बम धमाका होता. और इन सबके पीछे आतंकी संगठन अल शबाब का हाथ था.
अभी हमने आपको बताया कि सोमालिया में चुनाव हुए. लेकिन ये चुनाव लोकतांत्रिक तरीक़े से नहीं हुए थे. वहां लोगों को एक व्यक्ति-एक मत का अधिकार अभी तक नहीं मिल पाया है.
सबसे बड़ी दिक़्क़त है मतपेटी की सुरक्षा. देश में इतने मिलिटेंट संगठन हैं कि मतपेटी की सुरक्षा बड़ी टेढ़ी खीर है. इसलिए चुनाव के लिए इंडायरेक्ट तरीक़ा चलाया जाता है. अलग अलग सूबों से संसद में लोग चुनकर भेजे जाते हैं. लेकिन इनका चयन लोग नहीं, क़बीलाई सरदार करते हैं.
ऐसा ही कुछ 2017 में भी हुआ. जब एक एयरपोर्ट हेंगर के भीतर चुनाव करवाए गए. और नए राष्ट्रपति बने मुहम्मद अब्दुल्लाही मुहम्मद. लोगों को लगा एक नए हीरो का उदय हुआ है. दुनिया के बाकी सुपरहीरोज़ की तरह ये भी अमेरिका से आया था. सख़्त प्रशासनिक और ईमानदार छवि. अमेरिका ने भी नए राष्ट्रपति की खूब आवभगत की. उन्हें अपना दोस्त बताया.
अब्दुल्लाही मुहम्मद, एक और ख़ास नाम से जाने जाते हैं, फ़रमाजो. इतालवी भाषा में ‘चीज़’ को इल फ़रमाजो कहा जाता है. जो मुहम्मद अब्दुल्लाही के पिता का सबसे प्रिय भोजन हुआ करता था. इसीलिए उन्हें फ़रमाजो के नाम से बुलाया जाता है.
फ़रमाजो ने अपनी अधिकतर ज़िंदगी अमेरिका में बिताई है. 1985 में पहली बार वो अमेरिका पहुंचे. सोमाली एंबेसी में एक जूनियर डिप्लोमेट के तौर पर. फिर सोमालिया में गृह युद्ध छिड़ा तो फ़रमाजो ने कनाडा में राजनैतिक असायलम पाने की कोशिश की.
असायलम मिल भी गया. लेकिन फिर 1990 में फ़रमाजो ने शादी की और अमेरिका आ गए. वहां यूनिवर्सिटी ऑफ़ बफ़ेलो में पढ़ाई की और फिर अमेरिका की नागरिकता ले ली. 2002 में एक चुनावी कंडिडेट के लिए प्रचार किया और फिर न्यू यॉर्क डिपार्टमेंट ऑफ़ ट्रांसपोर्टेशन में नौकरी भी लग गई. बढ़िया ज़िंदगी चल रही थी. यहां तक कि फ़रमाजो सोमाली-अमेरिकन समुदाय के नेता भी चुन लिए गए थे.
अब सवाल कि अमेरिका में रह रहे फ़रमाजो की सोमालिया की राजनीति में एंट्री कैसे हुई. हुआ यूं कि 2010 में सोमालिया के राष्ट्रपति शरीफ़ शेख़ अहमद ने अमेरिका का दौरा किया. न्यू यॉर्क में उनकी मुलाक़ात, फ़रमाजो से हुई. वो उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का न्योता दे दिया. फ़रमाजो ने न्योता स्वीकार किया और सोमालिया के प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन सिर्फ़ आठ महीने में ही उन्हें सोमालिया की हक़ीक़त समझ आ गई. लौट के फिर अमेरिका पहुंचे. वही पुरानी नौकरी जॉइन कर ली.
अमेरिका में रहते हुई उन्होंने एक नई पार्टी बनाई. टायो पार्टी. UK, स्वीडन आदि देशों का दौरा कर वहां रहने वाले सोमाली लोगों से अपने लिए समर्थन जुटाया. 2012 में फिर सोमालिया पहुंचे और चुनाव में अपनी दावेदारी भी पेश की. लेकिन जीत नहीं पाए.
2017 में फ़रमाजो को जीत मिली. अमेरिका से समर्थन भी मिला. लेकिन बाद में पता चला कि इस चुनाव में भारी धांधली हुई थी. एक-एक वोट के लिए दस करोड़ रुपए तक खर्च किए गए थे. तब इल्ज़ाम लगा कतर पर. मामला तेल से जुड़ा हुआ था. कतर इस बात से आज तक इनकार करता है. लेकिन ये आम नॉलेज है कि तेल के चक्कर में उसके इंटरेस्ट सोमालिया से जुड़े हुए हैं.
बहरहाल अमेरिकन सूपरहीरो की इमेज़ रखने वाले फ़रमाजो की असलियत भी जल्द ही सामने आ गई. 2018 से ही ऐसी खबरें सामने आने लगी थी कि फ़रमाजो अपने राजनैतिक विरोधियों को ठिकाने लगा रहे हैं. इसमें एक शख़्स का नाम विशेष रूप से जुड़ा, फहाद यासीन.
ये जनाब सोमालिया की नेशनल इंटेलीजेंस सर्विस ऐज़ंसी (NISA) के हेड हैं. फहाद यासीन खुद भी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एज़ंसी के पत्रकार रह चुके हैं. बताया जाता है कि 2017 में फहाद ने ही फ़रमाजो की कतर से फंड हासिल करने में मदद की थी. जिसके बाद उन्हें NISA का हेड बनाया गया.
सब कुछ चंगा चल रहा था. अमेरिका भी फ़रमाजो को समर्थन दे रहा था. फिर 2019 में इस समीकरण में बदलाव आया. 2019 में अचानक फ़रमाजो ने अमेरिकी नागरिकता त्याग दी.
अमेरिका में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है. इसलिए फ़रमाजो का नागरिकता त्याग देना किसी के गले नहीं उतर रहा था. बाद में पता चला कि अमेरिकी इंटर्नल रेवेन्यू संस्था, IRS, फ़रमाजो की कमाई का ऑडिट करने जा रही थी. ऐसा होता, उससे पहले ही फ़रमाजो ने अपना पासपोर्ट और नागरिकता, दोनों लौटा दी.
फ़रमाजो ने अपने कार्यकाल में कुछ उपलब्धियां भी हासिल कीं. जैसे सोमालिया को 14 हज़ार करोड़ रुपए के क़र्ज़े से माफ़ी दिलवाना. लेकिन इस दौरान उन पर मानवाधिकार हनन के कई आरोप भी लगे.
साल 2020 में फ़रमाजो ने अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया. सोमालिया के नए संविधान के तहत फ़रमाजो ऐसा कर सकते थे. नए प्रधानमंत्री बने मोहम्मद हुसैन रोबल. रोबल के आते की सत्ता के दो केंद्र बन गए. और सबसे पहली दरार पड़ी इसी साल फरवरी में.
फ़रवरी 2021में फरमोजा का कार्यकाल ख़त्म होना था. लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल को दो साल के लिए बढ़ा दिया. संविधान की क़सम खाने वाले फ़रमाजो ने ऐसा क्यों किया?
इस बारे में दो मत हैं. पहला तो ऑब्वीयस है. सत्ता का लालच. लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में एक दूसरा कारण भी बताया गया. क्रूड ऑयल यानी कच्चा तेल.
यहां पर एंट्री होती है अमेरिका की. साल 2021 के पहले कुछ दिनों में खबर आई कि दो अमेरिकी कम्पनी, सोमालिया पहुंची. और उन्होंने फरमोजा से मुलाक़ात की. ये दो कम्पनियां थीं, लिबर्टी पेट्रोलियम और कोस्टलाइन एक्स्प्लोरेशन. मीडिया रिपोर्ट्स के हिसाब से सब कुछ तय हो चुका था. ‘साइनिंग ऑफ़ प्रोडक्शन शेयरिंग एग्रीमेंट’ नाम का एक बैनर भी बन चुका था. जिसके तहत सोमालिया के 110 करोड़ बैरल कच्चे तेल का कारोबार तय होना था.
लेकिन फिर अचानक सब कुछ कैंसिल हो गया. सरकार ने किसी भी डील से इनकार कर दिया. लेकिन कम्पनी क्यों आई, क्या हुआ, इस बारे में कोई भी जानकारी प्रेस में नहीं दी गई.
दिक़्क़त ये है कि सोमालिया में सत्ता का कोई एक केंद्र नहीं है. क़बीलाई लीडरों, मिलिटेंट गुटों को भरोसे में लिए बिना कोई भी कारोबार करना सम्भव नहीं. माना जाता है कि सरकार सभी पक्षों को तैयार नहीं कर पाई, इसलिए ऐन मौक़े पर डील कैंसिल कर दी गई.
इसी घटना के बाद फरवरी में फरमोजा ने अपना कार्यकाल दो साल और बढ़ा दिया. अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते फरमोज़ा बाकी पक्षों से बातचीत और चुनाव कराने के लिए तैयार हुए. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच बातचीत का रास्ता निकला. और तय हुआ कि अक्टूबर 2021 में चुनाव होंगे.
लेकिन बातचीत आकर अटक गई NISA पर. जो सोमालिया की गुप्तचर ऐजंसी है. फरमोजा की सारी ताक़त NISA के बल पर थी. इसलिए फरमोजा चाहते थे कि NISA का अध्यक्ष वो चुनें. और रोबल अपना केंडिडेट लाना चाहते थे. बातचीत यहीं पर आकर ठप हो गई.
ताज़ा ख़बर ये है कि फरमोजा ने प्रधानमंत्री रोबल को बर्खास्त कर दिया है. साथ ही सोमालिया मरीन फ़ोर्सेस के कमांडर को भी बर्खास्त कर दिया गया है. रोबल के ऊपर आरोप है कि उन्होंने राजधानी मोगादिशू में ग़ैरकानूनी रूप से ज़मीन अपने नाम की. इससे पहले भी फरमोजा रोबल पर लगातार आक्रामक बने हुए थे. इसी महीने उनके ऑफ़िस से बयान जारी कर कहा गया था कि रोबल के रहते शांतिपूर्ण चुनाव नहीं हो सकते.
रोबल को बर्खास्त करते हुए फरमाजो ने कहा,
“प्रधानमंत्री के काम और शक्तियों को जांच होने तक निलंबित किया गया है. और उनकी जगह महदी मोहम्मद गुलेद कार्यवाहक प्रधानमंत्री होंगे”रोबल ने इस बर्ख़ास्तगी को असंवैधानिक बताते हुए पद से हटने से इनकार कर दिया है. अपने बयान में रोबल ने फरमोजा को ‘पूर्व राष्ट्रपति’ बताया. और सुरक्षाबलों को निर्देश दिया है कि वो सीधे उनके ऑफ़िस को रिपोर्ट करें. उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति का कार्यकाल फरवरी में ख़त्म हो चुका है. इस पूरे प्रकरण के पीछे उनकी मंशा चुनाव में धांधली करवाने की है. ताकि वो अपने पद पर बने रह सकें. कुल मामला ये है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री में सीधे ठन गई है. और बीच में फ़ंसी है सेना. राष्ट्रपति फरमोजा और प्रधानमंत्री रोबल, दोनों अलग अलग कबीलों से आते हैं. और सरकार और सेना में भी कबीलों के हिसाब से गुट बने हैं. जो अपने-अपने नेता को सपोर्ट कर रहे हैं. कल यानी मंगलवार 27 दिसम्बर को, सेना का एक गुट राष्ट्रपति आवास के पास तैनात हो गया. रिपोर्ट्स के अनुसार ये रोबल धड़ा है, जो प्रधानमंत्री का पक्षधर है. इसी तरह ट्रूप्स की संख्या प्रधानमंत्री आवास के पास भी काफ़ी है. राजधानी के अलग-अलग इलाक़ों को सेना के अलग-अलग फ़ैक्शंस ने कब्जे में ले लिया है. AFP की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति आवास के पास तैनात ट्रूप्स हेवी मशीन गन और RPG से लैस हैं. आशंका है कि एक छोटी सी चिंगारी देश को दुबारा गृहयुद्ध में धकेल सकती है. इन सब के बीच सोमालिया में चुनाव भी शुरू हो चुके हैं. लेकिन सिर्फ़ शुरू ही हो पाए हैं. गाड़ी अटक चुकी है. 1 नवंबर से शुरू हुए चुनावों में अब तक सिर्फ़ 24 सांसदों को चुना गया है. चुनाव 24 दिसम्बर को पूरे होने थे लेकिन ताज़ा विवाद को देखते हुए, आगे की चुनाव प्रक्रिया भी संशय के घेरे में है. सरकार में सूचना उपमंत्री अब्दीरहमान यूसुफ़ ओमर ने राष्ट्रपति के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया है. और प्रधानमंत्री रोबल को अपना समर्थन भी ज़ाहिर किया है. अमेरिका, ब्रिटेन, UN आदि ने दोनों पक्षों को आपस में बैठकर बात करने को कहा है. लेकिन हाइ वोल्टेज चुनाव को देखते हुए कोई भी धड़ा अभी के लिए झुकने को तैयार होता नहीं दिखाई दे रहा. इस सब के बीच बाकी देश का हाल यूं है कि कोरोना की ज़बरदस्त मार पड़ी है. 90% से ज़्यादा इलाका सूखे से ग्रस्त है. UN के अनुसार लगभग 40 लाख लोग खाद्य संकट के घेरे में हैं. लेकिन इन सब से बेहोश सत्ता के गलियारे में समाजशास्त्र का अंतिम क्लीशे खेला जा रहा है. यानी जिसकी लाठी उसकी भैंस.

