मोदी सरकार ने OROP दे तो दिया, अब क्या चाहते हैं ये पूर्व सैनिक?
एक झटके में हल नहीं निकलेगा इसका.
Reuters
ऋषभ
3 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 3 नवंबर 2016, 11:44 AM IST)
वन रैंक वन पेंशन पर एक पूर्व सैनिक ने आत्महत्या कर ली. सरकार कह रही है कि देख रहे हैं क्या हुआ. राजनेता भिड़ गए हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री को दिल्ली में ही गिरफ्तार कर लिया गया. फिर छोड़ दिया गया. राहुल गांधी को दो बार गिरफ्तार किया गया. क्योंकि ये लोग सैनिक के परिवार से मिलने हॉस्पिटल जा रहे थे.
तो गिरफ्तार क्यों किया जा रहा है? फिर 40 साल से इंतजार कर रहे सैनिकों को मोदी सरकार ने 6 सितंबर 2015 को वन रैंक वन पेंशन दे भी दिया था. प्रधानमंत्री ने सियाचीन में जाकर कहा था कि ये देना मेरे नसीब में लिखा था. फिर उड़ी हमले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सैनिकों को लेकर देश में नया उबाल आया है. तो फिर सैनिक अब क्यों नाराज हैं? आखिर 83 दिन की भूख हड़ताल के बाद सरकार ने कहा तो कि वादा पूरा किया है.
फिर सेना का स्ट्रक्चर ही ऐसा है कि सैनिक पूरी सर्विस नहीं कर सकते. सेना में हमेशा जवान लोग चाहिए. तो 85 प्रतिशत सैनिक 35-40 में ही रिटायर हो जाते हैं. फिर इनको बाहर नौकरी नहीं मिलती. क्योंकि उस तरह की कोई स्किल नहीं होती. और नौकरिय़ां हैं भी नहीं. तो सैनिकों की पेंशन और कम हो जाती है.
तो सरकार ने क्या किया था और वन रैंक वन पेंशन पर क्या दिक्कतें हैं?
1. मोदी सरकार ने इस स्कीम के तहत 5.5 हजार करोड़ रुपये निकाले थे. पर सैनिकों का कहना है कि ये पैसे वन रैंक वन पेंशन के लिये नहीं हैं. ये बस पेंशन को एक बार बढ़ाने के लिए है. क्योंकि अभी भी पेंशन और रैंक का रिश्ता वही है. जो कांग्रेस के समय था.
2. सरकार और सेना की डेफिनेशन में अंतर है. सरकार इसे पेंशन में हर साल होने वाला इंक्रीमेंट समझ रही है. जबकि ये मुद्दा अलग ही है.
3. सरकार ने ये भी कहा है कि सर्विस पूरी ना करने वाले सैनिक इसके हकदार नहीं होंगे.
4. सरकार के मुताबिक ये स्कीम लागू होगी 1 जुलाई 2014 से और पेंशन की दर तय होगी 2013 के आंकड़ों के आधार पर. सैनिक ये चाहते हैं कि लागू हो 1 अप्रैल 2014 से और 2015 के आंकड़ों के आधार पर.
5. सरकार ने कहा है कि पेंशन का रिव्यू हर 5 साल में किया जाएगा. पर सैनिकों का कहना है कि ये रिव्यू हर साल होना चाहिए. क्योंकि इतने दिन में कई बार ऐसा हो जाएगा कि सीनियर अपने जूनियर से कम पेंशन पाएगा. ये नियम के हिसाब से गलत होगा.
सरकार की दिक्कतें क्या हैं?
40 लाख रिटायर्ड सैनिक हैं. 6 लाख शहीदों की विधवाएं हैं. फिर सैनिक अमूमन ज्यादा दिन तक जीते हैं. तो पेंशन से सरकार पर बोझ भी बढ़ जाता है. हर साल पेंशन बढ़े तो खजाने पर जोर पड़ेगा. फिर सिविल के लोग भी मांग करने लगेंगे कि हमें भी यही सिस्टम चाहिए. अभी तक तो नहीं बोलते हैं, क्योंकि उनकी सर्विस 60 साल तक होती है. पेंशन उसके बाद मिलती है. फिर ये भी है कि इनकी पेंशन हर साल बढ़ जाती है. पर रैंक वाली मांग कर सकते हैं.
इसके अलावा सरकार ने 2004 से पेंशन स्कीम बदल दी. अब NPS है. इसमें लोग खुद ही पेंशन में कंट्रीब्यूट करते हैं. पर वन रैंक वन पेंशन के चलते सरकार को अपनी जेब से ही सारा पैसा देना पड़ेगा. जिसका रिटर्न कुछ आएगा नहीं क्योंकि रिटायर्ड सैनिक कोई काम तो नहीं कर रहे.
दुनिया में क्या सीन है?
अमेरिका में सैनिक इंफ्लेशन के मुताबिक अपनी आखिरी तनख्वाह का 50 से 100 प्रतिशत पेंशन पाते हैं. चीन में 85, ऑस्ट्रेलिया में 76.5, फ्रांस में 75, जापान में 70, मलेशिया में 60 और पाकिस्तान में 70 तक है.