कुछ रोज़ पहले 'फ्रंटियर गांधी' बाचा खान पर पाकिस्तान में नया विवाद हो गया है.वहां के राइट विंग संगठन जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तानी टेक्स्ट बुक्स ने उनकेचैप्टर हटाने की मांग की. वो भी इसलिए क्योंकि वे सेक्युलरिज्म को प्रमोट करते थे.खैबर पख्तूनवा प्रोविंस में इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ की सरकार है.जमात-ए-इस्लामी इस सरकार में साझेदार है. जमात-ए-इस्लामी का कहना है किसेक्युलरिज्म के आदर्शों को प्रमोट करना पाकिस्तान के कल्चर और विचारधारा के खिलाफहै. बाचा खान वही हैं जिनके नाम पर बनी यूनिवर्सिटी पर 20 जनवरी 2016 को आतंकी हमलाहुआ था. बेवजह नहीं है कि कट्टरपंथी उस शख्स से खार खाते हैं जिसकी बंदूकों सेपुरानी अदावत थी. वह शख्स जिसे थोड़ी सी छूट लेकर आप पाकिस्तान का गांधी कह सकतेहैं.कौन थे बाचा खान?1बाचा खान दरअसल खान अब्दुल गफ्फार खान को कहा जाता है. उनका एक नाम बादशाह खान था.जिसे पश्तो लहजे में कुछ लोगों ने 'बाचा खान' कहा और यही पाकिस्तान में उनकालोकप्रिय नाम पड़ गया.-------------------------------------------------------------------------------- 2बाचा खान पश्तो लीडर थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ अहिंसा के रास्ते से लड़ाईलड़ी. महात्मा गांधी से उनकी करीबी दोस्ती थी. 20 जनवरी 2016 को उनकी 28वीं बरसीथी. इसी मौके पर यूनिवर्सिटी में मुशायरा बुलाया गया था. आतकियों ने हमले के लिएयही दिन चुना.--------------------------------------------------------------------------------3खिचड़ी दाढ़ी, सौम्य हाव-भाव, संत सी आभा. बाचा खान इस्लाम की आध्यात्मिकता मेंयकीन रखते थे, कट्टरपंथ में नहीं. जैसे गांधी हिंदू धर्म की आध्यात्मिकता केअनुयायी थे.--------------------------------------------------------------------------------4बाचा खान आजादी की लड़ाई के अहिंसक सिपाही रहे. उन्होंने हमेशा युद्धों और हथियारोंका विरोध किया. ब्रिटिश राज के समय उन्हें 'फ्रंटियर गांधी' भी कहा जाता था.--------------------------------------------------------------------------------51929 में उन्होंने खुदाई खिदमतगार (अल्लाह के सेवक) मूवमेंट शुरू किया. इससेब्रिटिश हुकूमत बौखला गई और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. उन्हें औरउनके समर्थकों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी.--------------------------------------------------------------------------------6जब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग भारत के बंटवारे पर अड़ी हुई थी. तब बाचा खान ने इसकासख्त विरोध किया. जब कांग्रेस ने बंटवारे के समझौते को 'खुदाई खिदमतगार' के लीडरोंसे कंसल्ट किए बिना स्वीकार कर लिया, तो बाचा खान बेहद दुखी हो गए. उन्होंने कहा,'आपने हमें भेड़ियों की तरफ फेंक दिया है.'--------------------------------------------------------------------------------7बंटवारे के बाद बाचा खान ने पाकिस्तान में आजाद पश्तूनिश्तान की मांग बुलंद की.लेकिन पाकिस्तानी सरकार हमेशा उनसे खतरा महसूस करती रही. पहले 1948, फिर 1954 औरफिर 1956 में उन्हें गिरफ्तार किया गया. 1960 और 70 के दशक का भी काफी समय उन्होंनेया तो जेल में बिताया या निर्वासन में.--------------------------------------------------------------------------------81988 में पेशावर में हाउस अरेस्ट होने के दौरान उनका देहांत हो गया. उनकी इच्छा केमुताबिक जलालाबाद, अफगानिस्तान स्थित उनके घर के पास उन्हें दफनाया गया.--------------------------------------------------------------------------------9उस समय अफगानिस्तान में सोवियत वॉर चल रहा था. फिर भी कम्युनिस्ट पार्टी औरमुजाहिदीन, दोनों तरफ की सेनाएं उन्हें सुपुर्दे-खाक किए जाने के लिए सीजफायर परसहमत हो गए थे.--------------------------------------------------------------------------------10हजारों लोग उनके आखिरी सफर में जुटे और पेशावर से जलालाबाद तक गए. लेकिन शांति केदुश्मन यहां भी खलल डालने से बाज नहीं आए. इस जुलूस में दो बम धमाके हुए जिसमें 15लोगों की मौत हो गई.