बेअदबी के बाद पीटकर हत्या करने वालों की तरफदारी कौन कर रहा है?
सिंघू बॉर्डर पर कथित बेअदबी की वजह से हत्या का मामला हुआ था.
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Kapurthala में बेअदबी के आरोपी की पिटाई के बाद मौके पर पहुंची पुलिस. (फोटो: ट्विटर)
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एक धर्म के सबसे पवित्र स्थल के पास एक आदमी की पीट पीट कर हत्या हो जाती है. लेकिन कोई उफ तक नहीं करता. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जो हुआ है वो सिर्फ सिख समाज या पंजाब पर ही नहीं, हमारे पूरे देश पर एक टिप्पणी की तरह है. अकाली दल, कांग्रेस, कैप्टन वाली कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी. ये उन दलों के नाम हैं जिन्होंने ये तो कह दिया कि बेअदबी की कोशिश निंदनीय है और षडयंत्र की जांच होनी चाहिए. लेकिन ये कहने का साहस नहीं जुटा पाए कि बेअदबी की सज़ा भीड़ के हाथों पीट पीटकर हत्या नहीं हो सकती. इस बात पर हम हैरान हो ही रहे थे कि ऐसा ही एक और मामला घंटों के भीतर सामने आ गया.
ये कौन सा भारत है जहां एक किताब की कीमत एक आदमी की जान से ज़्यादा है. ये सवाल हम पूछने वाले हैं आज दिन की बड़ी खबर में. हम बेअदबी को लेकर सिख समाज की भावनाओं और इन भावनाओं का दोहन करने के लिए हो रही राजनीति को भी समझने की कोशिश करेंगे. और साथ ही ये भी, कि किस तरह एक के बाद एक सरकारों के निकम्मेपन ने इस तरह की जघन्य हत्याओं के लिए एक मौन स्वीकृति पैदा कर दी है.
बेअदबी. अदब से, या आदर से पेश न आने वालों के लिए कह दिया जाता है कि बड़ा बेअदब शख्स है. ये अच्छी बात तो नहीं होती. लेकिन हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए बेअदबी का सिला एक झिड़क से ज़्यादा नहीं होता. आपको अदब से पेश आने की सलाह दी जाती है.
फिर सब सामान्य हो जाता है. लेकिन पंजाब में इस शब्द का एक बहुत दूसरा मतलब प्रचलन में है. बेअदबी का मतलब है सिख धर्म और उसके प्रतीकों का अपमान करना. पंजाब और सिख समाज के लिए ये बहुत बड़ी बात होती है. आप इस बेअदबी की जगह ''ईशनिंदा'' शब्द का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. क्योंकि बेअदबी को लेकर पंजाब में माहौल वैसा ही है, जैसा पाकिस्तान या बांग्लादेश में ईशनिंदा को लेकर है. लोग भावुक हैं. सरकार सुस्त और भीड़ कानून हाथ में लेने को आतुर.
एक हफ्ते में कथित बेअदबी के तीन मामले हुए हैं. दो मामले तो पिछले दो दिन में हुए हैं. जिनमें दो लोगों की पीट पीटकर हत्या कर दी गई. 19 दिसंबर को कपूरथला के निज़ामपुर में एक लड़के को बेअदबी के आरोप में पकड़ा गया.
लड़के से पूछताछ के दौरान पंजाब पुलिस का जवान भी मौजूद था. लेकिन फिर सिख युवकों की एक भीड़ कथित रूप से गुरुद्वारे में टूट पड़ती है और खबर आती है कि पीट-पीटकर लड़के को मार दिया गया. लड़के को बचाने के चक्कर में पंजाब पुलिस के तीन जवान भी घायल हुए हैं
हालांकि लड़के ने क्या बेअदबी की, इसकी ठीक-ठीक जानकारी नहीं मिली. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस इसे चोरी का मामला मान रही है. जिस लड़के की हत्या हुई, उसने दो जैकेट पहन रखे थे, जिनमें से एक गुरुद्वारे से उठाया गया था. लड़के ने वाकई किसी तरह की बेअदबी की थी, या चोरी के मकसद से घुसा था, ये जांच का विषय होता. लड़का जिंदा रहता तो गुनाह-बेगुनाह की बात रहती. लेकिन उन्मादी भीड़ ने मौके पर ही सजा सुना दी.
इस घटना के एक दिन पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में कथित बेअदबी और लिंचिंग की घटना हुई. अमृतसर में सिखों का सबसे पवित्र स्थान हरमंदिर साहब गुरुद्वारा. 18 दिसंबर को यहां एक शख्स ने कथित रूप से गुरु ग्रंथ साहिब की तरफ जाने की कोशिश की. वो मंदिर के गर्भगृह के घरे में दाखिल तो हो गया था. लेकिन वहां वो पवित्र तलवार या ग्रंथ साहब के करीब पहुंचता, उससे पहले ही उसे पकड़ लिया गया. और फिर पीट पीटकर कर हत्या कर दी गई.
पंजाब सरकार में मंत्री राजिंदर बाजवा. ये हत्या पर अफसोस तो जता रहे हैं लेकिन हत्यारों के गुस्से को जस्टिफाई भी कर रहे हैं. वहीं सिद्धू ने तो इसे कौम को खत्म करने की साज़िश ही बता दिया
बेअदबी की घटनाओं और उनपर होने वाली राजनीति की बात करने से पहले ज़रूरी है कि हम ये समझें कि सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहब का स्थान क्या है.
सिख का मतलब है- होता है. सीखना. सिख धर्म की शुरुआत हुई गुरुनानक देव से. खालसा पंथ के पहले गुरु माने जाते हैं नानक. और फिर 10 गुरु हुए. आखिरी गुरु हुए गुरु गोविंद सिंह. उनके दो साहिबजादे चमकौर साहिब की लड़ाई में शहीद हो गए. बाकी दो को मुगलों ने ज़िंदा दीवार में चुनवा दिया था. मतलब गुरु गोविंद सिंह का कोई वारिस नहीं था. उनके जाने के बाद पंथ बना रहे इसीलिए उन्होंने कह दिया कि मेरे बाद ग्रंथ साहिब को ही गुरु माना जाए. और इसीलिए ग्रंथ साहिब को गुरु ग्रंथ साहिब कहा जाता है.
गुरु ग्रंथ साहिब में सभी गुरुओं की शिक्षाएं हैं. मतलब उनका कंपाइलेशन है. और ना सिर्फ गुरुओं की शिक्षाएं हैं, बल्कि कबीर, रविदास जैसे संतों की शिक्षाएं भी हैं. ज़्यादातर वैसी शिक्षाएं, जिनमें एकेश्वरवाद और समानता की बात है. माने दो बड़े मूल्य हैं - पहला - ईश्वर एक है. और दूसरा - कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं. तकनीकी रूप से ये एक जातिविहीन समाज की कल्पना है. और ऐसा माना जाता है कि सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव के वक्त, गुरु ग्रंथ साहिब के संकलन का काम शुरु हुआ था.
ग्रंथ साहिब को चूंकि गुरु की तरह मानते हैं. इसलिए गुरुद्वारों में हर दिन सुबह ग्रंथ साहिब को जुलूस के साथ बाहर लाया जाता है. फिर एक स्टैंड पर रखा जाता है, जिसे मंजी साहिब कहते हैं. मंजी माने खटिया. रात को फिर से विश्राम गृह में ले जाया जाता है. अमृतधारी सिख ग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं. और निहंग सिखों की ड्यूटी है गुरु ग्रंथ साहिब की रक्षा करना.
तो गुरु ग्रंथ साहिब सिख समाज के लिए गुरुओं की शिक्षाओं का स्रोत है. और साथ ही गुरु के अवतार की तरह भी. इसीलिए सिख समाज गुरु ग्रंथ साहिब को महज़ एक किताब नहीं मान पाता. और ग्रंथ साहिब को लेकर बहुत भावुक भी है.
अब आते हैं बेअदबी पर. अब सिख धर्म के मामले में बेअदबी का मतलब क्या होता है? बेअदबी कई तरह से हो सकती है. जैसे जहां गुरु ग्रंथ साहिब को रखा जाता है, वहां बिना सिर ढके जाना, या जूते पहनकर जाना या शराब पीकर जाना.
पन्ने फाड़ना, या किसी दूसरी तरह से अपमान करना. गुरुबाणी का गलत उच्चारण भी बेअदबी कहलाता है.
अब कानून पर आते हैं. बेअदबी को लेकर 2017 में चुनाव से ठीक पहले प्रकाश सिंह बादल की अकाली बीजेपी की सरकार के दौरान, पंजाब विधानसभा ने एक कानून पास किया था. और पंजाब के लिए IPC की धारा 295A में एक सेक्शन A और जोड़ दिया था. ये धारा धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं को ठोस पहुंचाने के मामले में लगती है. नया सेक्शन जुड़ने पर एक नई धारा बनी IPC 295AA. इसके तहत उम्रकैद की सजा का प्रावधान है. जबकि देश के और राज्यों में IPC 295A के तहत 3 साल तक की सजा का ही प्रावधान है. तो पंजाब में कठोर कानून बनाया गया था.
कानून कठोर क्यों बनाया गया, इसकी एक वजह हमने आपको कुछ देर पहले बता दी. दूसरा कारण अब बताते हैं.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस में हरप्रीत बाजवा की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले के 2 सालों में बेअदबी के करीब 100 मामले हुए थे.
पहला मामला 2015 में आया. फरीदकोट ज़िले में. बुर्ज जवाहर सिंगावाला से ग्रंथ साहिब की एक कॉपी गायब हो गई. ग्रंथ साहिब की कॉपी को बीर भी कहते हैं. ये 1 जून 2015 की घटना है. फिर ग्रंथ साहिब के पन्ने कोटकपुरा-बठिंडा हाइवे पर बरगारी गांव के पास मिले.
इसके बाद सिख समुदाय के लोगों में आक्रोश हुआ. हिंसक प्रदर्शन हुए. और पुलिस की गोलीबारी में बरगारी गांव के पास दो लोगों की मौत हो गई. 2015 के बेअदबी मामले में बादल सरकार ने जांच कमीशन बनाया. लेकिन कुछ भी ठोस नहीं मिला.
2017 के विधानसभा चुनाव से पहले लगातार बेअदबी के मामले आए. मुक्तसर साहिब के औलाख गांव में गुरु ग्रंथ साहिब की प्रति जली हुई मिली. इस पर बाद में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने कहा था कि शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई थी. इसके बाद तरण तारण के खालरा गांव में नाले में ग्रंथ साहिब के पन्ने मिले थे.
इन सारी घटनाओं ने बेअदबी को एक मुद्दा बना दिया. जिसके इर्द गिर्द लोग लामबंद भी होने लगे. पंजाब में सारी पार्टियां एक सुर में कहने लगी कि बेअदबी के मामलों की जांच होनी चाहिए. न्याय होना चाहिए. लेकिन ये मामले बहुत आगे बढ़ नहीं पाए. और ऐसा भी नहीं था कि बेअदबी सिर्फ ग्रंथ साहिब के साथ ही हुई हो. 2015 में ही लुधियाना के चंदर नगर में रामायण और भागवद गीता के पन्ने फटे मिले थे. जून 2016 में कुरान के पन्ने मिलने की खबर आई थी. इस मामले में दिल्ली के आम आदमी पार्टी विधायक नरेश यादव को गिरफ्तार किया था. बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया था. सितंबर 2016 में जालंधर के पास नहर में भागवद गीता के फाड़े हुए पन्ने मिले थे.
तो लगभग सारे धार्मिक ग्रंथों के साथ बेअदबी हुई. लेकिन ज़ाहिर है, ज़्यादा भावनाएं ग्रंथ साहिब की बेअदबी ने ही भड़काईं. कांग्रेस और अकालियों ने कहा कि हम सत्ता में आएंगे तो बेअदबी की नए सिरे से जांच करवाएंगे. 2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार बनी तो उन्होंने हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रणजीत सिंह में एक सदस्य कमेटी बनाई गई थी. पंजाब सरकार के गृह विभाग ने नोटिफिकेशन देकर बताया कि हर तरह के बेअदबी के मामलों की जांच होगी. चाहे वो कुरान की बेअदबी हो या भागवद गीता की हो या ग्रंथ साहिब.
इस कमीशन ने अगस्त 2018 में अपनी रिपोर्ट दी. रिपोर्ट में लिखा गया था कि अकाल तख्त यानी अमृतसर में सिखों के तख्त ने बेअदबी के एक मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को माफी दी थी. इसमें पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल और डिप्टी सीएम सुखबीर बादल का रोल था. इसके बाद बेअदबी के मामले बढ़े. कमीशन ने लिखा कि डेरा सच्चा सौदा से जुड़े लोगों के बेअदबी के मामलों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत मिले. लेकिन अकाली सरकार ने जांच में गंभीरता नहीं दिखाई.
कुल मिलाकर पैनल ने पूर्व की अकाली दल सरकार पर बेअदबी के मामलों के लिए दोष दिया. जब रिपोर्ट विधानसभा में रखी गई तो अकाली दल ने खूब हंगामा किया. रिपोर्ट पर सवाल उठाया. और आगे कुछ नहीं हुआ.
पुराने मामलों का हाल भी जान लीजिए - 2015 के बेअदबी वाले मामले की अकाली दल सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की थी. इस डेरा से जुड़े एक आरोपी की नाभा जेल में हत्या हो गई थी. उसके बाद सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. और यहीं बिना किसी नतीजे के जांच बंद हो गई.
2016 के एक बेअदबी मामले में पंजाब पुलिस की SIT ने जांच की इसमें डेरा से जुड़े 6 लोगों को आरोपी मानकर गिरफ्तार किया. वो अभी जेल में हैं. दोष साबित नहीं हुआ. कुल मिलाकर किसी भी मामले में कोई बड़ी गिरफ्तारी नहीं हुई, न ही किसी साज़िश का पता चला.
वैसे ये देखने वाली बात है कि जब भी चुनाव नज़दीक आने वाले होते हैं, बेअदबी के मामले अचानक बढ़ जाते हैं. और उनपर नेताओं का गुस्सा भी. लेकिन चूंकि न्याय की बात करने वालों ने न्याय सुनिश्चित नहीं किया, लोगों में गुस्सा अंदर अंदर भभकता रहा.
पंजाब पर नज़र रखने वाले पत्रकार ज़ोर देकर कहते हैं कि बेअदबी के मामलों में भीड़ का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है. और उसकी वजह ये भी है कि सरकार गंभीर नहीं दिखती. तो अब उस हिंसा के लिए एक मौन स्वीकृति है, जो कथित बेअदबी की घटनाओं के बाद होती हैं. आप गौर कीजिए -
- सिंघू बॉर्डर पर कथित बेअदबी होती है, आरोपी की हत्या हो जाती है
- स्वर्ण मंदिर में कथित बेअदबी होती है, आरोपी की हत्या हो जाती है.
- लुधियाना में मालूम भी नहीं चलता कि क्या हुआ, आरोपी की हत्या हो जाती है.
इन तीनों घटनाओं के बाद पंजाब और पंजाब का सिख समाज खुले मन से हत्याओं की निंदा नहीं कर पाया. क्योंकि सभी को डर है. प्रेस ये नहीं कह पा रही कि हत्याएं अपराध हैं. लोग सोशल मीडिया पर राय रखने से बच रहे हैं. और हमारी तरह इस मुद्दे पर शो कर रहे पत्रकारों से ऑन रिकॉर्ड बात करने से भी बच रहे हैं.
कोई भीड़ के गुस्से से नहीं टकराना नहीं चाहता. ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि इस भीड़ के पीछे कौन खड़ा है. कौन है जो धार्मिक लोगों को इतना आक्रामक बना रहा है, कि वो जान लेने पर उतारू हैं.
पंजाब में अतिवाद, उग्रवाद और आतंकवाद का इतिहास रहा है. क्या ऐसे में धार्मिक कट्टरता के इन मामलों पर पूरे देश को चिंतित नहीं होना चाहिए?
मानव सुरक्षा कानून. उसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया. लेकिन फिर वो मांगें कहीं गुम हो गई. इन घटनाओं के बाद भी बात नहीं हो रही. तो अब मानव सुरक्षा कानून की मांग का क्या स्टेट्स है, ये समझने के लिए हमने अनस तनवीर से बात. जो इस कानून की मांग से जुड़े रहे हैं.
अनस तनवीर ने हमें बताया
2017 के आस पास सिविल सोसाइटी का एक आंदोलन चला था लिंचिंग के ख़िलाफ़. जिसका नाम था नैशनल कैंपेन अगेन्स्ट मॉब लिंचिंग. इसके तहत एक ड्राफ्ट क़ानून तैयार किया गया था जो सदन में पेश भी हुआ था. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में पेटिशन भी दायर हुई थी. इसपर सुप्रीम कोर्ट ने गाइड लाइन तैयार की और सरकार को कहा कि इसपर एक क़ानून बनाया जाए. लेकिन अब तक इसपर कोई क़ानून नहीं बन पाया है.बेअदबी, एक निंदनीय काम है. ऐसा काम, जो जान बूझकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है. राजनीति होती है, सो अलग. जिसका नतीजा क्या निकल पाता है, हमने आपको बताया. लेकिन एक बात स्थापित है. बेअदबी के आरोप में ऐसे लोगों की जान जा रही है, जिनका दोष साबित नहीं हुआ है. कई मानवाधिकार संगठनों और प्रगतिशील कार्यकर्ताओं-नेताओं ने 4 साल पहले लिंचिंग के खिलाफ एक कानून की मांग की थी.

