रामनवमी पर बिहार और पश्चिम बंगाल में हिंसा करने वाले अमित शाह की चेतावनी से सुधर जाएंगे?
ममता बनर्जी के बयान के बाद भी बंगाल प्रशासन रामनवमी पर हिंसा क्यों नहीं रोक पाया?

30 मार्च को रामनवमी थी. आज तारीख है 3 अप्रैल, लेकिन 5 दिनों बाद भी हिंसा थमी नहीं है. देश के दो बड़े राज्यों से वीडियो पर वीडियो आ रहे हैं. आगज़नी, तोड़फोड़ और पत्थरबाज़ी. हिंसा की हर नई घटना के साथ ये सवाल बड़ा होता जा रहा है, कि आखिर वो कौन लोग हैं, जिनके इशारे पर ये सब हो रहा है. सवाल बिहार और पश्चिम बंगाल की सरकारों की मंशा पर भी है. कि बलवा रुक नहीं रहा, या जानबूझ कर रोका नहीं जा रही हैं.
आप देश के किसी भी ज़िले में पुलिस कप्तान से पूछ लीजिए. वो बता देंगे कि उनके इलाके में अमुक त्योहार शांतिपूर्ण रहता है, और अमुक त्योहार के दौरान तनाव की आशंका रहती है. तो प्रशासन के पास एक कैलेंडर होता है, जिसके हिसाब से कुछ इंतज़ाम वो पहले ही कर लेता है. प्रशासन के लोग आपको ये भी बताएंगे कि रामनवमी की गिनती उन त्योहारों में नहीं होती थी, जिनके दौरान ''गड़बड़'' होती है. रामनवमी पर जुलूस लंबे समय से निकल रहे हैं. और कई जगहों पर पूरे का पूरा कस्बा इनमें शामिल होता है. जब सब एक ही त्योहार में शामिल हैं, तो विवाद की गुंजाइश कम हो जाती है. साल 2023 में निकले दर्जनों शांतिपूर्ण रामनवी जुलूसों पर यही बात लागू होती है.
लेकिन ये भी सच है कि पिछले 3-4 सालों में रामनवमी के दौरान होने वाली हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं. और जहां-जहां हिंसा हुई, पैटर्न एक सा है. जुलूस में DJ पर भड़काऊ गाने बजाए जाते हैं. और ये जुलूस अपने रास्ते में कम से कम एक मुस्लिम इलाके से ज़रूर निकलता है. यहां नारेबाज़ी होती है, और फिर होता है बलवा. इस साल बलवे की आशंका थोड़ी ज़्यादा थी, क्योंकि रामनवमी, रमजान के महीने में पड़ी. यहां तक हमने आपको जो बताया, वो बच्चा-बच्चा जानता और समझता है. तब सरकारों से तो ये उम्मीद की ही जा सकती है, कि उनके पास भी इस तरह का इनपुट हो.
रामनवमी से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और गृहमंत्री ममता बनर्जी त्योहार पर होनी वाली हिंसा पर एक बयान दिया था जो चर्चा का विषय बना था. मतलब साफ है, ममता को अंदाज़ा था कि रामनवमी के जुलूसों के दौरान क्या हो सकता है. बावजूद इसके, बंगाल प्रशासन सिर्फ 30 मार्च को हिंसा रोकने में ही विफल नहीं रहा. वो 2 अप्रैल तक हालात को काबू में नहीं ला पाया. बंगाल में पहली हिंसा हावड़ा में हुई. जहां 30 मार्च को विश्व हिंदू परिषद ने रैली निकाली थी. रैली शिबपुर पहुंची, तो बवाल शुरू हो गया. आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा, कि शिबपुर, एक मुस्लिम बहुल इलाका है. पहले दोनों ओर से पथराव हुआ. फिर दुकानों में आग लगाई जाने लगी.
हावड़ा पुलिस ने एक लेटर जारी कर बताया कि यात्रा को उस रूट पर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी जहां उन्होंने रैली निकाली. यात्रा का रूट बदल दिया गया था. इसका मतलब ये, कि जहां बवाल हुआ, वहां उस जुलूस को होना ही नहीं चाहिए था. इसीलिए हमने एक पैटर्न की बात की थी, जो बार-बार, जगह-जगह नज़र आता है. जब तय रूट से हटकर जुलूस निकालने पर विश्व हिंदू परिषद से सवाल पूछा गया, तो जवाब मिला,
अब यहां दो सवाल खड़े होते हैं - कि जब अनुमति नहीं थी, तो परिषद का जुलूस उस इलाके में क्यों गया. और जब पुलिस ने देखा कि जुलूस अपने रास्ते से अलग जा रहा है, तो उसने त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं की. क्योंकि जुलूस में चल रहे लोगों और आसपास रह रहे लोगों - दोनों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पश्चिम बंगाल पुलिस की ही थी. बावजूद इसके, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हावड़ा वाली घटना को बीजेपी की साजिश क़रार दिया. जवाब में बीजेपी की ओर से भी प्रतिक्रिया आई. विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि TMC के इशारे पर VHP और बजरंग दल से जुड़े लोगों के घर जलाए गए हैं.
BJP ने केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने और NIA जांच की मांग की. गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यपाल से बात कर घटना की जानकारी ली. ये सब हिंसा के अगले दिन, माने 31 को हो गया था. बावजूद इसके, हिंसा रुकी नहीं थी.
हिंसा की अगली घटना सामने आई हुगली से. जहां रिशरा इलाके से हिंदू संगठनों ने शोभा यात्रा निकाली थी. इसमें बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष भी शामिल हुए थे. शोभा यात्रा से दिलीप घोष के जाते ही हिंसा शुरू हो गई. पत्थरबाजी और आगजनी होने लगी. इसमें बीजेपी विधायक बिमान घोष भी घायल हो गए.
हालात को काबू में करने के लिए पुलिस ने इलाके में धारा 144 लगा दी. 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवा बंद कर दी. बंगाल में अब तक रामनवमी से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 57 से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार किया है. इसमें से 12 आरोपी हुगली की घटना से और 45 हावड़ा की घटना से जुड़े हैं. दोनों घटनाओं पर बीजेपी और टीएमसी के बीच ''मैं ईमानदार-तू जिम्मेदार'' टाइप के आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं.
पिछले तीन-चार सालों में ये आम सा हो गया है. हर बार हिंसा होती है. हर बार प्रशासन की ओर से यही कहा जाता है कि बाहर से आए लोग थे. ये ''इस'' पार्टी की साजिश है, या ''उस'' पार्टी की साजिश है. बंगाल के बाद अब बिहार चलते हैं.
बिहार की कहानी पश्चिम बंगाल से बहुत अलग नहीं है. 30 मार्च को सासाराम में रामनवमी का जुलूस निकालने वाले लोगों के साथ कथित तौर पर मारपीट हुई. हिंदू गुट ने आरोप लगाए कि दो बच्चे जुलूस से वापस आ रहे थे और कुछ मुसलमानों ने उन्हें पीट दिया. और पास के एक हनुमान मंदिर पर पथराव किया. 30 मार्च को कुछ लोगों के बीच हुई मारपीट, 31 मार्च तक व्यापक हिंसा में बदल गई. दोनों तरफ़ से ख़ूब पथराव हुआ. आगज़नी हुई. गाड़ियों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया. इलाक़े में 144 लगा दी गयी. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि उनके घरों, दुकानों और मज़ारों को क्षतिग्रस्त किया गया. हिंदू पक्ष ने भी ऐसे ही आरोप लगाए हैं.
इसके बाद आया 1 अप्रैल. सासाराम के शेरगंज इलाके में बम फटने की ख़बर आई. स्थानीय लोगों ने बताया कि चार बज कर 52 मिनट पर वो सहरी करके नमाज़ अदा कर रहे थे, जब ये धमाका हुआ. पुलिस ने पुष्टि की, कि इस धमाके में 6 लोग घायल हुए और एक की मौत हो गई. घायलों को फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया और पुलिस ने इसकी जांच शुरू की. इस मामले में अबतक 50 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. मौक़े पर सासाराम के ज़िलाधिकारी धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि धमाके का कारण अभी पता नहीं चल पाया है. सभी एंगल से जांच की जा रही है. लेकिन इसके साथ ही बिहार पुलिस पुलिस ने ये भी बताया कि इस ब्लास्ट का कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है.
पुलिस ने तो कह दिया, लेकिन मुस्लिम पक्ष का कहना यही था कि साज़िशन मस्जिद के पास बम फोड़ा गया है. हालांकि, आज 3 अप्रैल को रोहतास ज़िला पुलिस ने साफ़ कहा है कि बम नहीं फटा था. जांच के दौरान पाया गया है कि अवैध विस्फोटक की हैंडलिंग में कुछ ग़लती हुई. जिसके बाद बम फट गया. जहां ये बम फटा था, वो एक निजी मकान के अहाते में आता है. फॉरेंसिक टीम घटना स्थल की जांच कर रही है. इस संबंध में दो गिरफ़्तारियां भी हुई हैं.
बम फटने के बाद ख़बरें ऐसी भी आईं कि माहौल इतना तनावपूर्ण है कि हिंदू अपने घरों पर ताला लगा-लगा कर ''भाग'' रहे हैं. हिंदुओं का पलायन हो रहा है. लेकिन रोहतास पुलिस ने इसे भी अफ़वा बता दिया. पुलिस का कहना है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है और अभी इलाक़े में पूर्णतः शांति है. हिंसा के बाद कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई थी.
सासाराम के अलावा नालंदा ज़िले में भी हिंसा की रिपोर्ट्स हैं. नालंदा के बिहार शरीफ़ में 31 मार्च को रामनवमी की शोभा यात्रा निकाली गई. नालंदा के लहेरी थाना क्षेत्र में दो पक्षों के बीच झड़प हो गई. किसी बात पर दो गुटों में बहस शुरू हुई. बहस के बाद भीड़ बेकाबू हो गई और पत्थरबाज़ी शुरू कर दी. गाड़ियों में आग लगा दी गई. बात पथराव और आगज़नी तक रुकी नहीं, हिंसा के दौरान गोलियां भी चलीं. गोलीबारी में 10 से ज़्यादा लोग घायल हुए, जिनका इलाज सदर अस्पताल में चल रहा है. दुकानों में लूटपाट की ख़बरें भी आई हैं.
नालंदा के जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने प्रेस से कहा कि इस घटना के लिए बाहरी लोगों को ज़िम्मेदार हैं. बाकी कहानी वही है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. CCTV और ड्रोन फुटेज को स्कैन किया जा रहा है. 4 अप्रैल तक इंटरनेट सेवा बंद हैं. शहर में कर्फ़्यू लगा हुआ है. इसके साथ ही रोहतास जिले में शिक्षा विभाग ने 4 अप्रैल तक सभी सरकारी स्कूल, मदरसों और कोचिंग सेंटर्स को बंद रखने का आदेश जारी किया है. बिहार शरीफ में भी कर्फ़्यू लागू कर दिया गया है.
लेकिन मामला इतने पर रुका नहीं है. नालंदा, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह ज़िला भी है. सो राजनीति भी शुरू हो गई है. भाजपा CM साहब से इस्तीफा मांग रही है. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री ''गतिविधी'' कर रहे हैं - हाई लेवल मीटिंग हुई है. CM का बयान आया है कि उपद्रवियों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और अफवाह फैलाने वालों पर भी नज़र रखी जा रही है. लेकिन नीतीश अब तक नालंदा नहीं पहुंचे हैं, फोन पर ही जायज़ा लिया है.
हिंसा के बाद केंद्रीय गृहमंत्री बिहार के दौरे पर पहुंचे. नवादा में अमित शाह ने एक जनसभा को संबोधित किया और राज्य में हिंसा को रोकने में विफल रहने के लिए नीतीश कुमार सरकार पर जमकर बरसे. अब अमित शाह ने तो कह दिया कि 40 में से 40 सीटें दीजिए, दंगा करने वालों को उल्टा लटका कर सीधा कर देंगे. इसपर निशाना साधते हुए RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि अमित शाह को बिहार की नहीं, बल्कि 40 लोकसभा सीटों की चिंता है. और JDU अध्यक्ष ललन सिंह ने अमित शाह को सलाह दी कि 2024 के लोकसभा चुनाव तक बिहार के राजभवन में आवास बना लें.
जैसा कि अपेक्षित ही था, पश्चिम बंगाल और बिहार की घटनाओं पर भरसक राजनीति हो रही है. और यही राजनीति आपको बता रही है कि दिक्कत कहां है. एक मुख्यमंत्री है, जिसे अनहोनी की आशंका थी, फिर भी हिंसा नहीं रोक पातीं. एक दूसरे मुख्यमंत्री हैं, जो 70 किलोमीटर दूर अपने गृहज़िले के दौरे पर नहीं जा पाते. और एक केंद्रीय गृहमंत्री हैं, जो दंगाइयों को तब उलटा टागेंगे, जब उन्हें 40 में 40 सीटें मिल जाएंगी. हमने तथ्य आपके सामने रख दिए. और वो सवाल भी, जो हमारे ज़ेहन में आए. अब आप हिसाब लगाइए, कि दंगाई वास्तव में है कौन. वो, जो सड़क पर गाड़ियां फूंक रहा है. या कोई और है, जो दूर से ये सब बैठकर देख रहा है. मंद-मंद मुस्कुरा रहा है.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: रामनवमी पर बिहार और पश्चिम बंगाल में हिंसा करने वाले अमित शाह की चेतावनी से सुधर जाएंगे?

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