निरंकारी बाबा हरदेव सिंह के पिता की हत्या क्यों हुई थी?
निरंकारी बाबा हरदेव सिंह के पिता गुरुबचन सिंह की हत्या कट्टरपंथी सिख संगठन के एक जत्थेदार ने कर दी थी. जानिए क्या थी उस हत्या के पीछे की बात?
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फोटो - thelallantop
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निरंकारी आन्दोलन को बाबा बूटा सिंह ने 19वीं सदी की शुरुआत में चालू किया था. आन्दोलन की शुरुआत में ये तय किया जा चुका था कि ऐसे गुरु कि बात मानी जायेगी जो उस वक़्त पर जिंदा होगा. यानी भूतकाल में मर चुके किसी गुरु कि बातों को उतना महत्त्व नहीं दिया जाएगा. जबकि सिख धर्म के मेनस्ट्रीम में माना जाता था कि जो धर्मग्रंथों में लिखा जा चुका है वही फ़ाइनल है. कट्टरपंथियों से आजिज़ आकर संत निरंकारी मिशन ने 1929 में पूरी तरह से अपने आपको सिख धर्म से अलग कर लिया. और एक अलग संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाई.
1960 के दशक में संत निरंकारी मिशन को तेजी से बढ़ावा मिला. 1978 में अमृतसर में एक तगड़ा समागम हुआ. 'अखंड कीर्तनी जत्था' और 'दमदमी टकसाल' उस समय के कट्टर धार्मिक संगठन थे. इन्होने अमृतसर के दरबार साहिब से निरंकारियों के समागम तक एक मार्च निकाला. चूंकि निरंकारी इनकी परंपराओं के खिलाफ़ थे, लिहाज़ा ये उनका विरोध कर रहे थे. इतने में दोनों ग्रुप आपस में भिड़ पड़े. 15 लोग मार दिए गए. 13 खालसा सिख और 2 निरंकारी संत. निरंकारी मिशन के 64 भक्त गिरफ्तार किये गए. पर अदालत ने केस खारिज कर सबको छोड़ दिया.
यही हाल 1978 में तब भी हुआ जब सितम्बर में गुरुबचन सिंह कानपुर आए. इसके बाद तो पंजाब सरकार ने छः महीने तक निरंकारी प्रमुख गुरुबचन सिंह के पंजाब में घुसने पर रोक लगा दी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने टंगड़ी अडाई और बैन हटाया. 6 अक्टूबर 1978 को अकाल तख़्त के जत्थेदारों द्वारा एक हुकुमनामा जारी किया गया. जिसमें कहा गया कि जो भी सच्चा सिख होगा, निरंकारियों का सामाजिक बहिष्कार करेगा.
कट्टरपंथी हर धर्म में होते हैं. सिख धर्म में भी थे. निरंकारियों के चलते सिख कट्टरपंथियों को मौका मिल गया. ये कट्टरपंथी संगठन राजनीति में खुद को स्थापित करने में लगे हुए थे. उन्होंने इसे ही अपना प्लेटफॉर्म बनाया. इस पूरे चक्कर में पीसे गए निरंकारी संत. ये बवाल इतना बढ़ा कि फिर 1980 में अखंड कीर्तनी जत्था के एक सदस्य रंजीत सिंह ने संत निरंकारी गुरुबचन सिंह को मार दिया गया. इसमें 20 लोगों के खिलाफ एफआइआर कराई गई. जिनका जरनैल सिंह भिंडरावाले से भी रिश्ता बताया गया. इसके बाद रंजीत सिंह को 13 साल कैद की सजा हुई.
1990 में रंजीत सिंह तिहाड़ जेल में था. उसे अकाल तख़्त का जत्थेदार बना दिया गया. यानी अकाल तख़्त का जत्थेदार जेल में बंद एक हत्यारा बन बैठा. जाहिर है ये उसका गुरुबचन सिंह को मारने का इनाम था. गुरुबचन सिंह की मौत के बाद से उनके बेटे हरदेव सिंह निरंकारी समाज की अगुआई कर रहे थे. अब आगे उनकी मौत के बाद अब उनका वारिस कौन होगा देखना है?

