ये 1930 का दिसम्बर था. गंगा के किनारे इलाहाबाद में एक शायर बड़े जोश में अपनीतक़रीर पेश कर रहा था. ये तक़रीर 17 साल के बाद होने वाले इंसानी तारीख के सबसे बड़ेऔर खूनी पलायन की बुनियाद रखने जा रही थी. तक़रीर कुछ यूं थी-" मैं पंजाब, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूममें देखना चाहता हूँ. ब्रिटिश राज के तहत या फिर उससे बिना भी एक खुद-मुख्तारनार्थ-वेस्ट भारतीय मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों का आखिरी मुस्तकबिल है."इस शायर का नाम था अल्लामा इकबाल. मौका था ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के 25 वें सालानाजलसे का. इकबाल इसके अध्यक्ष थे. अपने भाषण में देश के भीतर ही एक स्वायत्त मुस्लिमराज्य की मांग कर रहे थे. हालांकि वो मुल्क के बंटवारे को देखने के लिए जिन्दा नहींबचे लेकिन आज भी पाकिस्तान में "मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान" के तौर पर याद किए जाते हैं.आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो इकबाल 1904 में कह रहे थे, "कुछ बात है कि हस्ती मिटतीनहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहां हमारा" वो इकबाल 1930 में देश केबंटवारे की नींव रखते देखे जा सकते हैं? इस सवाल का जवाब हमें उनके जीवन केउतार-चढ़ाव से मिलता है.अल्लामा इक़बाल9 नवम्बर 1887 को सियालकोट में पैदा हुए इकबाल मूलतः कश्मीर के रहने वाले थे. उनकेपुरखों ने उनके जन्म से तीन सदी पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था. 19वीं शताब्दी मेंकश्मीर पर सिक्खों का कब्ज़ा होने के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया. उनके पिता शेखनूर मोहम्मद सियालकोट में दर्जी का काम करते थे. महज़ चार साल की उम्र में उनकादाखिला मदरसे में करवा दिया गया. तालीम का यह सिलसिला लम्बा चला. इकबाल ने कानून,दर्शन, फारसी और अंग्रेजी साहित्य की पढाई की.1904 में इकबाल अपने तराने “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” लिख चुके थे औरमशहूर हो चुके थे. अगले साल इकबाल तालीम हासिल करने के लिए लंदन रवाना हुए. उन्हेंकैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से वजीफ़ा मिला था. यहां उन्होंने कलामें स्नातक किया. 1907 में वो म्यूनिख चले गए और वहां लुडविंग मेक्समिलियनविश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की.1908 में वापस लौटे इकबाल वो इकबाल नहीं थे जो 1905 में यहां से रवाना होते वक्तथे. अपने इंग्लैंड दौरे के दौरान ही आजादी के आन्दोलन और मुसलमानों के अधिकारों कोलेकर उनके विचारों में बदलाव शुरू हुए.जब इकबाल से मिले नेहरू1938 में लाहौर के स्थानीय वकील मोहम्मद आलम ने सिविल एंड मिलेट्री गजेट के खिलाफमानहानि का मुक़दमा कर रखा था. इस मुकदमे में गवाही के सिलसिले में पंडित नेहरूलाहौर गए थे. ये वही लाहौर था जहां नौ साल पहले रावी नदी के तट पर हुए कांग्रेस केराष्ट्रीय अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पेश हुआ था. इसी शहर में एक शायरथा जोकि बीमार हाल बिस्तर में पड़ा था.जवाहरलाल नेहरूजनवरी की 24वीं तारीख थी. शाम को नेहरू इकबाल से मिलने जावेद मंजिल नाम की इमारतमें पहुंचे. उनके साथ उस वक़्त उनके मेजबान इफ्तिकरुद्दीन भी थे. नेहरू के बैठने केलिए कुर्सियों का इन्तजाम था. नेहरू इकबाल के कमरे में पहुंचे और इकबाल के सम्मानमें फर्श पर बैठ गए. हालांकि ये एक अनौपचारिक मुलाकात थी लेकिन दोनों के बीच सियासीमसलों पर बात होना लाजमी ही था. नेहरू लगातार जोर देकर कह रहे थे कि मुसलमानों कोदेश की आजादी की लड़ाई में कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ना चाहिए. यह वो दौर था जब नेहरूकांग्रेस के वामपंथी धड़े का चेहरा माने जाते थे. इकबाल ने उनसे सवाल किया कि कितनेकांग्रेसी नेहरू के समाजवादी विचारों पर उनसे सहमत हैं? नेहरू का जवाब था, "आधादर्जन."इस पर इकबाल ने नेहरू से कहा कि जब वो अपनी विचारधारा से कांग्रेस के आधा दर्जन सेज्यादा लोग नहीं जोड़ पा रहे हैं तो वो 10 करोड़ मुसलमानों को उनके साथ खड़ा होने केलिए कैसे कह दें? हालांकि नेहरू से वह इस बात पर सहमत थे कि अंग्रेजी राज के खिलाफलड़ाई ज़रूरी है. मुलाकात के अंत में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में अपनीराय रखते हुए कहा कि अगर मुसलमानों को आजादी की कांग्रेस के नेतृत्व वाली लड़ाई मेंशामिल करना है तो उनके अधिकारों को सुरक्षित किया जाना बेहद ज़रूरी है.सियासत के खिलाफ खड़ी शायरी इकबाल की शायरी और उनके राजनीतिक विचार गजब का विरोधाभास खड़ा करते हैं. उम्र केआखिरी पड़ाव में जब राजनीतिक तौर पर वो टू नेशन थ्योरी के बड़े पैरोकार के रूप में वोस्थापित हो चुके थे. ठीक उसी समय वो लिख रहे थे-"उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दोसुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो जिसखेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो"हालांकि पकिस्तान की पाठ्य पुस्तकों में उनके इलाहाबाद में दिए गए भाषण को 'आइडियाऑफ़ पाकिस्तान' के रूप में पढ़ाया जाता रहा है. लेकिन उनके उस भाषण को सावधानी सेपढ़ने पर समझ में आता है कि उन्होंने मुल्क के भीतर ही एक खुदमुख्तार मुस्लिम राज्यकी मांग रखी थी. ये अलग मुल्क की मांग से कई मायनों में अलग है.इकबाल खुद भी अपनी जिंदगी में हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथियों, यानी दोनों पालों केउग्रपंथियों का शिकार रहे. इकबाल खुद कहते हैं-“जाहिद-ए-तंग नजर ने मुझे काफिर जाना और काफिर ये समझता है मुसलमान हूं मैं.”हालांकि वो हमेशा से मानते रहे कि हिन्दू और मुसलमान सांस्कृतिक तौर पर बहुत अलगहैं. अलग मुस्लिम राज्य की मांग के पीछे यही सबसे मजबूत तर्क था लेकिन वो राम को‘इमामे-ए-हिन्द’ भी बताते हैं. -''है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द'' इकबाल अंत तक मुसलमानों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ते रहे, लेकिन वो इस दर्दनाकबंटवारे के गवाह नहीं बन सके. 21 अप्रैल 1938 को उन्होंने पठानकोट में आखिरी सांसली. दरअसल इकबाल को किसी एक खांचे में रख पाना बहुत मुश्किल है. इतिहास अक्सरन्यायपूर्ण नहीं होता है और इकबाल कई मौकों पर इसका शिकार हो जाते हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें.तेज बहादुर का नया वीडियो: इल्जाम साबित न करूं तो चौराहे पर जिंदा जला दोआम आदमी पार्टी ने MCD इलेक्शन का रिज़ल्ट डिक्लेयर कर दिया हैIPL में सबसे बड़े कन्फ्यूज़न को दूर कर गलती सुधार ली गई हैवो गायिका जिनकी आवाज़ में बगावत धड़ धड़ धड़कती हैवीडियो देखें: