जब मिल्खा सिंह को मानो पंख लग गए थे, बादल उसे उड़ा ले जा रहे थे
6 सितंबर 1960 को रोम ओलंपिक्स में फाइनल दौड़.
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फोटो - thelallantop
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इंडिया को आजाद हुए अभी एक दशक ही हुआ था. मौका था 1960 रोम ओलंपिक्स का. 6 सितंबर की तारीख और दिन उस साल भी बुधवार था. 400 मीटर रेस का फाइनल मुकाबला था. मगर जीत का एक ही फेवरेट था. एक ही नाम की चर्चा थी. पांचवी लेन में पॉजिशन लिए इंडिया का मिल्खा सिंह. पिस्टल से फायर हुआ और दौड़ शुरू. मिल्खा समेत दूसरे रनर्स भागे. 200 मीटर तक मिल्खा यूं भागे मानो उन्हें पंख लग गए हों. हवा इस 31 साल के रनर को उड़ा ले जा रही हो. 200 मीटर तक मिल्खा सिंह लीड करते दिखे. दुनिया को भी लगा कि इस बार ओलंपिक मेडल इस इंडियन को जरूर मिलेगा. मगर...मिल्खा उस लेन में भाग रहे थे कि उन्हें दूसरे रनर्स का अंदाजा ही नहीं लगा कि कौन कहां पहुंच चुका है और करीब 250 मीटर पार कर चुके मिल्खा ने अपनी स्पीड कम कर ली. फिर जो लय टूटी तो मिल्खा कवर ही नहीं कर पाए और आखिरी पड़ाव पर ब्रॉन्ज मेडल से भी चूक गए. ये चूक सेकंड के एक हिस्से की थी. मिल्खा चौथे स्थान पर रहे और इंडिया का ओलंपिक मेडल का सपना टूट गया.
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पछतावा आखिरी सांस तक रहेगा

करीब 57 साल बाद आज भी मिल्खा सिंह को उस एक गलती का पछतावा है. जब सुबह फोन लगाकर पूछा कि क्या आपको याद है, आज क्या है? अपने चंडीगढ़ के घर में चाय की चुस्की लेते मिल्खा बोले," बेटा ये एक दिन कैसे ही भूल सकता हूं. मैं मरते दम तक इस एक गलती को नहीं भूल सकता. पूरी दुनिया ने कहा था कि ओलंपिक में 400 मीटर की रेस कोई अगर जीतेगा, तो इंडिया का मिल्खा सिंह ही जीतेगा. दुनिया को भरोसा था कि जब भी मिल्खा दौड़ेगा, जीतेगा. पेरिस में दौड़ा, जीता. लंदन में दौड़ा, जीता. यूएसए और रशिया में भी जीता. जहां भी दौड़ा, जीतता जा रहा था. तो मुझे भी कॉन्फिंडेंस था कि इस बार ओलंपिक मेडल मेरे गले में होगा."
मगर ऐसा हो नहीं पाया. एक सेकंड से भी कम टाइम से मिल्खा सिंह पिछड़ गए. "बस वो एक गलती हुई. जो बैड लक हुआ साबित हुआ इंडिया के लिए भी, मेरे लिए भी. 200 यार्ड तक मैं रेस को लीड कर रहा था मगर मुझे अंदाजा नहीं था. मेरे मन में था कि कहीं मैं पिछड़ तो नहीं गया. तो मैंने अपनी स्पीड कम की. मैं पीछे वालों को नहीं देख पा रहा था. यही एक गलती हुई और मैं पिछड़ गया. ये गलती हुई मुझे ऊपर वाली लेन मिलने से. क्योंकि मैं देख ही नहीं पा रहा था, साथ के रनर्स को. वो लोग मुझे देख पा रहे थे. अगर मैं नीचे होता तो मुझे जजमेंट हो जाती कि कौन, कहां है. रेस में एक बार पिछड़ जाएं तो पिकअप करना बेहद मुश्किल होता है," बताया 88 साल के मिल्खा सिंह ने जो आने वाली पीढ़ी को उम्मीद की नजर से देखते हैं.
राज्यवर्धन सिंह राठौर से उम्मीद

रोम ओलंपिक्स 1960 की फाइनल दौड़ में बहुत कम अंतर से हारे थे मिल्खा.
मिल्खा सिंह ओलंपिक पोडियम पर नहीं चढ़ सके. मगर ये पूछने पर कि क्या इस जनरेशन में किसी से कोई उम्मीद रखते हैं, मिल्खा कहते हैं,"अब आखिरी ख्वाहिश यही है कि जो गोल्ड मेडल मेरे हाथ से निकल गया, वो आज की जनरेशन का कोई युवा पा ले. वो अब पोडियम पर चढ़े और पीछे राष्ट्रगान बजे. बस जीवन की आखिर इच्छा यही है. दुनिया छोड़ने से पहले ये दिन देखना चाहता हूं. दुर्भाग्यवश मुझे ऐसा कोई नहीं दिख रहा. हिम्मत करने की बात है, बातें तो बहुत करने वाले हैं."
मिल्खा सिंह ये भी कहते हैं कि ये मौका पीछे की गलतियों से सीख लेकर आगे सुधार करने का है. "एक अच्छी बात ये है कि सरकार ने राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री का जिम्मा दे दिया है. हालांकि ये काम 3 साल पहले ही हो जाना चाहिए था, मगर देर आए दुरुस्त आए. मैं प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से कई बार से कह रहा था कि स्पोर्ट्स की कमान युवा और स्पोर्ट्सपर्सन के हाथ में ही होनी चाहिए. राठौड़ के पास 2 साल हैं टोक्यो ओलंपिक्स की तैयारी के लिए. एक दिन भी वेस्ट नहीं किया जा सकता है. आज के दौर में जो काम बैडमिंटन में पी गोपीचंद कर रहे हैं, उसी शिद्दत और मेहनत की जरूरत है हर गेम में."
400 मीटर का बादशाह
ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म भाग मिल्खा भाग का एक सीन
# मिल्खा लंबे अरसे तक इकलौते भारतीय एथलीट रहे जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलैटिक्स में गोल्ड जीता हो. बाद में डिस्कर थ्रोअर कृष्णा पूनिया ने 2010 में हुए CWG में गोल्ड जीतकर ये रिकॉर्ड तोड़ा.# मिल्खा ने देश की तीन ओलंपिक्स में नुमाइंदगी की. पहला था 1956 में मेलबर्न ओलंपिक्स, फिर 1960 में रोम ओलंपिक्स और तीसरा 1964 का टोक्यो ओलंपिक्स.
# 1960 के रोम ओलंपिक्स में मिल्खा से बेहद उम्मीदें थी. हालांकि मिल्खा चौथे नंबर पर रहे मगर उनका 45.73 सेकंड्स का ये रिकॉर्ड अगले 40 साल तक इंडियन नेशनल रिकॉर्ड रहा.
# 1958 यानी रोम ओलंपिक्स से 2 साल पहले 200 मीटर औऱ 400 मीटर में नेशनल गेम्स जो ओडिशा के कट्टक में हुए थे, मिल्खा ने रिकॉर्ड टाइम में फिनिश किए थे.
# उसके बाद एशियन गेम्स में भी 200 और 400 मीटर की कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीते.
# इसी साल जब मिल्खा ब्रिटिश एंपायर एंड कॉमनवेल्थ गेस्म में पहुंचे तो वहां भी गोल्ड मेडल अपने नाम किया. 400 मीटर का ट्रैक मिल्खा ने 46.6 सेकंड्स में नाम लिया था. इसी के साथ मिल्खा कॉमनवेल्थ गेम्स में आजाद भारत के पहले गोल्ड मैडलिस्ट बने.
# रोम ओलंपिक्स के बाद 1962 में जर्काता में हुए एशियन गेम्स में भी मिल्खा ने 400 मीटर की रेस में अपना बादशाहत दिखाई.
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