राजा पृथु ने एक दिन सोचा कि भाई धरती पर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है तो क्यों न घरबैठे पुण्य में इन्वेस्ट करें. उन्होंने डिसाइड किया कि एक नहीं, दो नहीं, सौअश्वमेध यज्ञ करेंगे. 99वें यज्ञ तक आते आते इंद्र भगवान डरने लगे कि कहीं ये कल कालड़का सौ यज्ञ कर के मेरे जितना पावरफुल न हो जाए. इंद्र साधु बन कर चुप्पे से पृथुका यज्ञ वाला घोड़ा चुरा लाए. अत्रि ऋषि ने उन्हें भागते हुए देख लिया और लगा दियापृथु के बेटे को उसके पीछे. जब इंद्र ने देखा कि चोरी पकड़ी जा सकती है, तो घोड़े कोछोड़कर कट लिए. घोड़े को फिर पार्किंग में लगाया गया लेकिन इंद्र फिर उसे चुरा ले गए.ऐसे ही इंद्र बार बार घोड़ा चुराते और पृथु का बेटा बार बार उसे वापस ले आता. इसलिएउनके बेटे का नाम विजितश्व रखा गया. पृथु को इंद्र की करतूत के बारे में पता चला.पर यज्ञ के समय उन्होंने अश्वमेध व्रत लिया हुआ था. वरना इंद्र का तो कतल ही होजाना था. फिर उन्होंने दिमाग लगाया, और बोले कि यज्ञ के मंत्रो की पावर से इंद्र कोयहीं खींच लाएंगे और यज्ञ की आग में ही वो भस्म हो जाएंगे. जब इंद्र को नाम लेकरबुलाया गया, तब ब्रह्मा जी आए. उन्होंने पृथु से कहा भाई इंद्र तो देवता हैं. गलतीसे मिस्टेक हो गया होगा. उन्हें माफ कर दो. फिर भगवान विष्णु इंद्र को लेकर आए.पृथु ने इंद्र को माफ़ किया. भगवान विष्णु ने जब खुश होकर वरदान मांगने को कहा, तबपृथु ने एक हजार कान मांगे, जिससे वो भगवान का भजन सुन सकें. फिर पृथु ने पूरीसरकार विजितश्व के नाम कर दी और खुद संन्यासी बनकर जंगल में चले गए. (श्रीमद्भगवतमहापुराण)