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क्लोजिंग का मारा त्योहार हमारा

दसों दिशाओं में झक्क नशा तारी है. जो नशे में नहीं वो ज्यादा मजे में है. हर तरफ होली स्पेशल इंजॉय हो रही है. लेकिन किसी के कल्ले तकलीफ भी है.

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आशुतोष चचा
24 मार्च 2016 (Updated: 23 मार्च 2016, 02:28 AM IST)
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अभी मुंडी उठा के नजर घुमाओ तो दूर दूर तक, दसों दिशाओं में क्या दिखता है? टीवी में अंदर और अखबारों में बाहर क्या दिखता है? अमा होली दिख रही है. और क्या गांधी जी के बाल दिखेंगे. हर तरफ एक सुर ताल में भंपाड़ा बज रहा है. सीरियलों में महाएपिसोड चल रहे हैं "जब पिया ने पिहू के साथ खेली पहली होली" वाला ऐड पिछले महिन्ना भर से आ रहा है. आखबार अटे पड़े हैं "...ने मिल जुल कर मनाया रंगों का त्योहार". चीप नाम और चीप कामों वाली वेबसाइट्स पर ये हेडलाइन चल रही हैं "रंगों में भीगने के बाद ये क्या किया आलिया भट्ट ने". क्लिक करके खबर खोलो तो मिलेगा कि रंग धो लिया था रंग लगाने के बाद. इन लंपटों को फोटो नहीं मिली. लेकिन कुछ तो लगाना ही था. मने जिधर नजर मारो सब रंगा पड़ा है. आदमी इतना हवसी हो गया है कि थोड़े में पेट नहीं भरता. कल इंडिया मैच जीत गया. वो होली स्पेशल था. अगर हार जाता तो प्लेयर्स को हजार गालियां पड़ती. कि हमारी होली खराब कर दी सालों ने. नत्थू पनवाड़ी की दुकान पर दो गुटका एक्स्ट्रा सुपारी मांगने में शर्म नहीं आती आजकल. होली के बहाने मांग लेते हैं. ठरकियों की तो निकल पड़ी है. गोल्डन चांस है ये. उनके सामने साक्षात गांधी होकर नारा दे रहे हैं करो या मरो. ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा. माहौल ऐसा भाईबंदी वाला बन गया है कि कोई अपना पर्स मारते चोर पकड़ ले तो उसको भी प्यार से कहेगा "कोई नी, बेटर लक नेक्स्ट टाइम." ये सब होली का परताप है. अइसा नहीं है कि सब टुन्न हैं. सबने ठंडाई या देसी ठर्रा ले रखा है. असल में जो नशे में नहीं है वो ज्यादा एंजॉय कर रहा है. इनके दर्द को जाने कौन लेकिन हजरात. इस नशे से थोड़ा हल्का होइये. चंद दुवाएं बचा के रखिए. उनके लिए जो इस मर्डरर मार्च में फंस गए हैं. "क्लोजिंग चल रही है". इत्ती सी बात किसी हंसते खेलते बाबू की जिंदगी नर्क कर देती है. किसी शायर को इन बेचारों से कभी हमदर्दी नहीं हुई कि इनके लिए ऐसी दो लाइनें लिख दें.

ये मार्च नहीं आसां बस इत्ता समझ लीजैत्योहार है खोपड़ी पर और क्लोजिंग का महीना है.

इनकी हालत को इस समय सबसे बेहतर देवराज इंद्र समझते होंगे. उनको जैसे लगता है कि राक्षस हमारे सिंहासन पर घात लगाए बैठा है. उनका बॉस भी उसी तरह मुंह टेढ़ा किए बैठा होगा. अभी लंच के बाद मीटिंग के लिए कैबिन में बुलाएगा. कहेगा "होली की छुट्टी में घर जाना है? तो ये सन 1857 से अब तक की सारी फाइलें शाम तक निपटा कर मुझे रिपोर्ट करो." वो खुद ही कह देगा. "इस बार नहीं जा रहा सर. मैं होली के दिन भी ऑफिस आऊंगा." ये छुट्टीखोर बॉस जब तक इस दुनिया में हैं, शांति नहीं आ सकती. संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका विश्वशांति की जो दिखावटी कोशिशें कर रहे हैं. क्यों नहीं एक बार इन छुट्टीखोर बॉसेज पर लगाम लगाकर ट्राई करते. और प्लीज. ये क्लोजिंग वाला चक्कर मार्च से हटा कर किसी और महीने में ले जाओ. देश के हर हिस्से में अलग महीना हो. जैसे उत्तर भारत का देख लो. इस महीने में मौसम इत्ता फ्रेंडली होता है कि आदमी चाह कर भी बीमार नहीं पड़ सकता. अगर यही क्लोजिंग मई जून में हो तो देखो कितने लोगों को डायरिया और कालरा चढ़ बैठता है. तो प्लीज. इसे किसी बीमारू महीने में शिफ्ट कर दो. होली निपटने के बाद होली के पहले की तैयारियां तो सब करते हैं साब. लेकिन बाद का क्या? कल अखबार खोलोगे तो दो तरह की खबरें दिखेंगी. "जावेद ने कराया होली मिलन समारोह, पेश की हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल". और "...में होली खेलने के बाद दो गुटों में पथराव, सांप्रदायिक तनाव." इन दोनों स्थितियों से निपट लो बस. हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल पैदा करने की जरूरत अब भी पड़ रही है तो हम बच्चे हैं अभी. ये हमारे दिलो दिमाग में अपने मन से आ जानी चाहिए.बाकी सांप्रदायिक तनाव, उसका आप देख लो क्या करना है. हमारी तरफ से होली हैप्पी है जी.

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