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  • When Hindu Uncle helped Muslims going for Ijtema, Story By Himanshu Bajpai

जब हिंदू चाचा ने इज़्तेमा जा रहे मुस्लिमों की मदद की

कहानी सीतापुर के सेक्यूलर चाचा की.

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8 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 8 जनवरी 2020, 02:08 PM IST)
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फोटो: PTI
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himanshu singhहिमांशु बाजपाई किस्सागो हैं. लखनऊ से आते हैं. देश-दुनिया में दास्तानगोई करते हैं. वेब सीरीज़ सेक्रेड गेम्स 2 में भी दिखे थे. किताब भी आ चुकी है, 'किस्सा किस्सा लखनउआ, लखनऊ के आवामी किस्से’. मौजूदा हालत पर इन्होंने एक किस्सा लिखा. उनकी इज़ाज़त से आपको पढ़वा रहे हैं.
कुछ साल साल पहले की बात है. मैं यूपी रोडवेज़ की बस से लखनऊ से शाहजहांपुर जा रहा था. अगले दिन से सीतापुर के पास लहरपुर में तबलीग़ी इज़्तेमा (धार्मिक आयोजन) होने वाला था. सो पूरे हिन्दुस्तान से हज़ारों-हज़ार मुसलमान सीतापुर की तरफ आ रहे थे. क़ैसरबाग़ बस अड्डे पहुंचते ही मुझे अपने आस पास इज़्तेमा की साम्प्रदायिक नज़रिए से आलोचना सुनाई देने लगी. बस सीतापुर रोड पर कुछ आगे बढ़ी तो एक जगह से 5-7 मुसलमानों का एक समूह चढ़ा और भीड़ की वजह से आगे ही खड़ा हो गया. बस में आगे की तरफ जितने लोग थे सब उनको घूर घूर कर शक भरी निगाहों से देखने लगे. फिर बुदबुदाहट शुरू हो गई. मेरे पड़ोस वाले हज़रत अपने साथी से बोले- बाहर से पैसा आता है, देश के खिलाफ बोलने के लिए. फिर उसको लगा मैं उसकी तरफ देख रहा हूं तो चुप हो गया. इधर इस ग्रुप का एक आदमी बार बार किसी को फोन लगा रहा था मगर फोन लग नहीं रहा था. ये लोग पंजाब से आए थे और इनको ये नहीं पता था कि लहरपुर में इनके रूकने का इंतज़ाम कहां हुआ है. सो ये बार बार किसी न किसी को फोन करके पंजाबी लहजे वाली उर्दू में उस आदमी से बात करने को कहते थे जिसने इनके रूकने का इंतज़ाम लहरपुर या सीतापुर में कहीं किया था और सीतापुर में कहीं इनको लेने आने वाला था. मगर उस आदमी से बात नहीं हो पा रही थी. इधर बस में सब उनको घूरे जा रहे थे.सबकी आंखों में उस लोगों को लेकर अविश्वास साफ देखा जा सकता था. उस ग्रुप के हर आदमी ने फोन पर कोशिश की मगर मसला हल नहीं हुआ. फिर एक आदमी ने खुद को लगातार घूर रहे आदमी से विनम्रता सेे कहा कि ज़िंदगी में पहली बार यूपी आए हैं. इधर का कुछ नहीं पता. किसी को जानते भी नहीं. सीतापुर के आसपास कोई लेने आने वाला था, उससे बात ही नहीं हो पा रही. आगे की तरफ सब ख़ामोश रहे. मगर इस बार पीछे से एक शख़्स चिल्ला के बोलो- भाई साहब! आप लोग परेशान न होइए. सीतापुर में हमारे घर रूक जाइएगा. हिन्दू हैं हम लोग मगर दिक्कत कोई नहीं होगी. दाढ़ी वाले आदमी ने औपचारिकतावश मना किया तो पीछे वाले ने कहा- अरे अपना मकान है. मियां-बीवी दो ही लोग रहते हैं. लड़का बाहर है. उसी ने बनवाया. ऊपर वाली मंज़िल पे आप सब हो जाइएगा. सुबह लहरपुर के लिए सवारी दिलवा देंगे. आख़िरकार दाढ़ी वाला आदमी मान गया कि अगर सीतापुर पहुंचने तक बात नहीं हो पाई तो वो उनके यहां रूक जाएगा. आगे वाले सब लोग अब मुड़ कर उस पीछे वाले आदमी को घूर रहे थे. उसने कहा कि और क्या! ज़रूरत तो किसी को भी पड़ सकती है. इंसान ही इंसान के काम आता है. और फिर कुछ देर में सब सामान्य हो गया. बुदबुदाहट भी बंद हो गयी. उस शकभरी बुदबुदाहट के बीच इस फराख़दिल आदमी को देखकर मुझे हैरत भी हुई, अच्छा भी लगा. एकदम अनजान लोगों को, जिनको सब शक़ की नज़र से देख रहे थे, जिनकी न भाषा इसकी जानी पहचानी थी न वेश-भूषा, कितनी सहजता से अपने घर रूकने का न्योता दे दिया.धर्मनिरपेक्षता वाकई एक ज़िन्दा लफ़्ज़ है. बातचीत में पता चला कि ये कोई सैनी साहब थे जो लखनऊ में किसी प्राइवेट दफ्तर में चपरासी थे. मैने पूछा ये बताइए कि आपको डर नहीं लगा ऐसे अनजान लोगों को अपने घर रोकते. उसने जवाब दिया- मेरा बेटा केरल में है. मुसलमानों का ही इलाका है वो. उसे भी किसी अनजान ने भरोसा करके अपने घर रखा है न. वहां ज़रूरत पड़ती है तो वही लोग काम आते हैं. अगर मैं इसे घर में जगह न दूं तो फिर कैसे उम्मीद करूंगा कि परदेस में मेरे बेटे को जगह मिल जाएगी. मैंने पूछा पर आजकल तो माहौल इतना हिन्दू-मुस्लिम वाला चल रहा है. ज़रा भी संकोच नहीं हुआ. बोले- अगर सब आतंकवादी ही होते तो हम ज़िंदा न होते. अच्छे-बुरे हर जगह होते हैं. हम भरोसा करेंगे तभी कोई हमपे भरोसा करेगा. लखनऊ तो फेमस रहा है भाईचारे के लिए. मैने कहा- चाचा सेक्यूलर हैं आप. जवाब मिला- वो क्या होता है? मैने कहा- वो जो किसी आदमी को उसके धर्म के आधार पर अच्छा या बुरा नहीं मानता, धर्म के आधार पर इंसान और इंसान में भेद-भाव नहीं करता. बोले- हां बेटा वो तो मैं हूं.
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