रोग फिल्म देखी है आपने? उसमें इरफान अपने डॉक्टर से पिछले शनिवार का किस्सा बताताहै. कि वो कैसे अपनी जिंदगी खत्म करने जा रहा था. लेकिन नहीं किया. तीन वजहें.पहली- पिस्टल में सरकारी गोली. अपने सुकून के लिए पब्लिक का पैसा क्यों बरबाद करें.दूसरी- असिस्टेंट के घर रिश्तेदार आने वाले थे. दूसरे दिन होली थी. उसके त्योहारमें मिट्टी पड़ जाती. तीसरी- खिड़की के बाहर इंद्रधनुष. सही नहीं लगा वो नजारा मरनेके लिए. खिड़की बंद करके आए तो खुदकुशी का मूमेंट जा चुका था. अब नहीं मर सकता था.और खुदकुशी करने की तैयारी किन वजहों से थी, ये भी सुनो.https://www.youtube.com/watch?v=HNuN1fdLupA दूसरी फिल्म आंखों देखी भी देखी हीहोगी. जिसमें आखिरी में संजय मिश्रा उड़ने का अनुभव करने के लिए पहाड़ से नीचे कूदजाते हैं. इससे उड़ने का अनुभव और मरने का अनुभव एक साथ हो गया होगा. हुआ या नहीं,ये फिल्म में नहीं दिखा. अब वो बात जिसकी वजह से हम ये मरने की बात ले बैठे.सुसाइड. जिंदगी का खात्मा. न चाहते हुए भी खुद की इच्छा से. अनचाहे ही अपने मनचाहेतरीके से. हमारे पेशे में चौंकने की गुंजाइश बहुत कम है. हर सुबह-शाम-दिन-रात हमखबरें लिखने बैठते हैं. रोज न जाने ऐसी कितनी वारदातें आंख के सामने से गुजरती हैं.किसी की आत्महत्या हमें कभी न चौंकाए. ऐसा नहीं है. एक पल को झटका जरूर लगता है कियार कैसे? कैसे इतना बड़ा कदम उठा लिया? अपनी जान लेने के लिए बहुत कलेजा चाहिएहोगा. क्या इसका घर परिवार नहीं था? या उन सबके होते हुए ये अकेला था? ऐसी ही एकखुदकुशी आज ज़ेरे बहस है. रिटायर्ड फौजी रामकिशन. उनकी खुदकुशी को दो धड़ों नेभुनाया है. सत्ता पक्ष और विपक्ष. तीसरा पक्ष उनके अपनों का था. यानी वो फौजी. जोअभी तक वन रैंक वन पेंशन से दूर हैं. रामकिशन ने इस हेतु से जान दी कि उनके जानदेने से सरकार चेते और बाकियों को उनका हक मिले. ऐसा उनकी आखिरी बातचीत के फोनरिकॉर्ड में मौजूद है. लेकिन उन बाकियों के हक से ज्यादा हल्ला रामकिशन को शहीदबताने और पागल या कांग्रेस वर्कर बताने पर है. किसी नेता ने उनको चंद्रशेखर आजाद भीकहा है. उनको या रोहित वेमुला की खुदकुशी को शहादत किस बेस पर कहा जाए किस बेस परनहीं, उसके पहले शहीद या शहादत की जांच पड़ताल कर लेते हैं. शहादत का फौज से कोईसंबंध नहीं शहादत और शहीद ये शब्द अब पॉपुलर कल्चर में आते हैं. इतने ज्यादा चलनमें आ चुके हैं कि कोई भी किसी के लिए शहीद घोषित करने की मांग कर सकता है. फौज मेंऑन ड्यूटी मारे गए सैनिक के लिए भी ये टर्म भावनात्मक रूप से उसके परिवार या चाहनेवालों को सहारा देने के लिए यूज किया जाता है. उससे भी ज्यादा अब भावनाओं से खेलनेके लिए. लेकिन आर्मी में, पुलिस में, होमगार्ड्स में या किसी और फोर्स में मारे हुएजवान शाब्दिक आधार पर यानी लिटरली शहीद नहीं कहे जा सकते. वजह, शहीद शब्द इस्लामिकपरंपरा से आया है. जिसका मतलब होता होता है अल्लाह की राह में कुर्बान. हजरतमोहम्मद, हसन हुसैन और उन 72 परिजनों की कुर्बानी को शहादत कहा जाता है. उसी रास्तेपर अल्लाह के लिए कोई मरे तो वो शहीद होगा. जबकि फौजी देश के लिए लड़े हैं. सरहदोंके लिए लड़े हैं. अगर इस्लाम से ये शब्द उधार लिया है तो शब्द के साथ की परंपरा भीलेनी पड़ेगी. जिसमें अल्लाह के अलावा कोई और पूजनीय नहीं है. किसी के सामने सिरनहीं झुका सकते. सजदा नहीं कर सकते. देश को आप कितना भी बड़ा मान लें लेकिन देश केलिए मरना शहादत में नहीं आएगा. फिर खुदकुशी से कैसी शहादत सुसाइड का हाल भारत मेंदेख रहे हो? एक आंकड़े के हिसाब से यहां हर घंटे एवरेज 15 लोग सुसाइड करते हैं. येआंकड़ा बहुत बड़ा है. आत्महत्या का सीजन सबसे ज्यादा मार्च अप्रैल में होता है. तबएग्जाम्स के रिजल्ट निकलते हैं. और हर साल कितने ही लड़के लड़कियां जिंदगी कासंघर्ष शुरू करने से पहले ही खत्म कर लेते हैं. पूरे साल चलने वाली आत्महत्याओं मेंसबसे ज्यादा एवरेज कर्ज में दबे किसानों का रहता है. कहीं बाढ़ कहीं सूखे के मारेकिसान. इसके अलावा सुसाइड करने के तमाम कारण होते हैं. आर्थिक तंगी, अकेलापन, प्यारमें बिछोह, किसी नजदीकी का मरना, बिजनेस में अचानक घाटा, लंबे कानूनी पचड़े, लंबीबीमारी और भी बहुत से कारण. एक बहुत अजीब खुदकुशी का मसला बताते हैं. जिसे देखकरआदमी की खुद को मौत को गले लगाने वाली तमाम थ्योरीज छोटी पड़ जाएंगी. अब से तमामसाल पहले. 6 सितंबर सन 1992 में अमेरिका के डेनाली जंगल में एक 24 साल के लड़के कीलाश मिली. सूखी हुई, बिल्कुल हल्की. एक कबाड़ बस में. पाने वाला मूस मार आदम था.उसके बारे में तफ्तीश की गई तो नाम पता चला क्रिस्टोफर मेककैंडल्स. इस लड़के के मांबाप ने बताया कि इसको दुनिया के नियम कायदे समझ नहीं आ रहे थे. यहां होने वाला हरकाम उसे उल्टा पुल्टा लगता था. प्रेमचंद की कहानी बौड़म पढ़े होंगे. उसी के बौड़मकरेक्टर जैसा. नतीजतन उसने घर छोड़ा. शहर छोड़ा. जंगल निकल गया. वहां घूमते हुएशायद वो भूख से मर गया था. ये खुदकुशी थी. लेकिन इसको आम समझदार इंसान किस तरह सेले, ये तय नहीं हो पा रहा था. अमेरिका इस सोच में पड़ा था. इस कहानी को यहां लानेका मकसद सिर्फ इतना है कि सुसाइड से जुड़ी सारी थ्योरीज पर आपका ध्यान जाए. और आपकोलास्ट में पता चले कि इससे हासिल ही क्या होता है? मरने वाला क्यों, कैसे जैसे तमामछोड़कर चला जाता है. हर एक मरने वाले पर एक थ्योरी लिखी जा सकती है. ये मैं दावे सेकह सकता हूं. एकैडमी में समाजशास्त्र की किताबें घिसे और कागद कारे किए लोगों सेअगर इमाइल दुर्खीम का जिक्र नहीं करूंगा तो वो बुरा मान जाएंगे. 19वीं सदी के महानविचारक, मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री. उनकी खुद की बीवी ने सुसाइड कर लिया था. दोबच्चे थे उनके. खुशहाल परिवार था. अभी तक के इतिहास में दुर्खीम से ज्यादाआत्महत्या पर रिसर्च करने और लिखने वाला कोई और नहीं हुआ. उन्होंने आत्महत्या कीतमाम कैटेगरी बताई और पूरी साइंटिफिक थ्योरीज दीं. लेकिन आखिरी में उनका सिर्फ एकवाक्य उठाने लायक है. वो लिख गए कि "आत्महत्या कोई निजी घटना नहीं. ये एक सामाजिककांड है." माने जिस समाज में आत्महत्या हुई, सारा कुसूर उसका है. इस हिसाब सेरामकिशन या रोहित वेमुला की खुदकुशी के लिए सिर्फ सत्ता दोषी नहीं है. उस परपॉलिटिक्स करने के लिए विपक्ष दोषी नहीं है. ये समाज दोषी है, जिसे हमने बनाया है.रुको एक मिनट, वो हैं शहीद फिर से वापस अपनी तरफ मुड़ो. हम शहीद का दर्जा किसे देतेहैं? जो किसी कॉज, किसी उद्देश्य के लिए मरा हो. सिर्फ अपने सुकून के लिए नहीं.बॉर्डर पर मरने वाले फौजी का उद्देश्य बड़ा होता है. देश की रक्षा. पुलिस वाले काउद्देश्य होता है. देश की अंदर से रक्षा, दुश्मनों को उनके ठिकाने पहुंचाना.चंद्रशेखर आजाद ने आत्महत्या की. खुद को गोली मार ली. लेकिन उसके पीछे बड़ाउद्देश्य था. उनकी कसम थी कि जीतेजी अंग्रेज को हाथ नहीं लगाने देना है. अगर वोलगाने देते तो एक क्रांतिकारी की कसम टूट जाती. इससे खतरनाक संदेश जाता. इतने भर सेअंग्रेजों की आधी जीत हो जाती. भगत सिंह ने खुदकुशी की. खुद के बारे में पता था किकुछ भी हो सकता है. मौत की सजा हो सकती है. सजा होने के बाद अपील भी नहीं की. मरनागंवारा किया. पचासों लेखों में उनकी बात लिखी है कि वो चाहते थे उनकी मौत से भारतीयसमाज आंदोलित हो जाए. हो गया. उस हिसाब से रामकिशन का भी उद्देश्य बड़ा था. अपने घरपैसे भिजवाने के लिए उन्होंने जहर नहीं खाया. ऑडियो टेप में है कि वो चाहते थे किउनकी मौत से सरकार चेते और उनके साथियों को पेंशन का लाभ मिले. उनको पता नहीं था किकोई उन्हें शहीद बताकर एक करोड़ रुपए का मुआवजा दे देगा. कनक्लूजन ये है कि महजखुदकुशी मानो तो ये खुदकुशी है. शहीद मानो तो शहीद है. न मानो तो नहीं है. अगरकायदे से सब कुछ स्केल पर धरकर नापो तो शहादत भी भावुक करके बरगलाने का एक जरिया हैबस. तमाम खास इनपुट पत्रकार नितिन ठाकुर से मिले. टीवी वाले हैं लेकिन ये न पूछनाकि टीवी पर क्यूं नहीं आते. हमारी और पढ़ने वालों की तरफ से नितिन को थैंक्यू, ढेरसारा.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें: रामकिशन और रोहित को शहीद बता बात मत बदलो