साल 1969. सितंबर महीने की पहली तारीख़. सुबह के छह बजे थे. लीबिया के लोग अपनीदिनचर्या शुरू कर रहे थे. उस सुबह जब उन्होंने अपने रेडियो सेट ऑन किए तो उन्हें एकऐलान सुनाई पड़ा. ये तय रूटीन से कतई अलग था. उन्हें इस बारे में रत्ती भर जानकारीनहीं थी. लोगों की उत्सुकता का ग्राफ़ ऊपर चला गया था. उन्होंने अपने कान रेडियोसेट के स्पीकर पर सटा दिए थे. उधर से एक रौबदार आवाज़ आई - ‘लीबिया के मेरे प्यारेलोगों! आपकी सेना ने रुढ़िवादी और भ्रष्ट सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया है. अब सेलीबिया एक स्वतंत्र और संप्रभु देश होगा. इसे लीबियन अरब रिपब्लिक के नाम से जानाजाएगा. इसमें ना कोई मालिक होगा और ना कोई ग़ुलाम. इसकी बजाय सभी आपस में एक होंगेजो भाईचारे और समानता का झंडा बुलंद करेंगे.’ लीबिया की जनता ने ये आवाज़ पहले कभीनहीं सुनी थी. और, ना ही वे इसके पीछे के चेहरे को पहचानते थे. हालांकि, कुछ दिनोंबाद ऐसा नहीं रहा. तब लीबिया की गली-गली में मुअम्मार मोहम्मद अबू मिन्यार गद्दाफ़ीका नाम गूंज रहा था. 27 साल का वो नौजवान सैनिक बेदुयिन कबीले से ताल्लुक रखता था.पिता मामूली हैसियत वाले व्यक्ति थे. लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कसरनहीं छोड़ी. लीबिया में बेदुयिन कबीले को निचले दर्ज़े का माना जाता था. गद्दाफ़ीको स्कूल में काफी भेदभाव झेलना पड़ा. लेकिन उसने इन्हें इग्नोर किया. वो छोटी-मोटीबाधाओं को अपने बड़े मिशन के बीच में नहीं आने देना चाहता था. गद्दाफ़ी का बड़ामिशन क्या था? लीबिया के कच्चे तेल के भंडारों पर लीबिया की जनता का हक़ स्थापितकरना. और, विदेशी प्रभुत्व को चुनौती देना. लीबिया 1951 में ही आज़ाद हो चुका था.लेकिन ये आज़ादी कहने भर को थी. किंगडम ऑफ़ लीबिया के पहले राजा इदरिस कठपुतली थे.पश्चिमी देश चाबी भरते और राजा साहब करतब दिखाना शुरू कर देते. 50 के दशक के आख़िरमें लीबिया की किस्मत बदल गई. वहां कच्चे तेल के अकूत भंडार मिले. इदरिस ने येभंडार औने-पौने दाम पर पश्चिमी देशों की कंपनियों को बेच दिया. जो पैसे आए, उन्हेंअपने घर-परिवार में बांट दिए. लीबिया के संसाधनों की लूट जारी थी. आम लोगों तकबचा-खुचा टुकड़ा पहुंच रहा था. जो कोई राजा का विरोध करता, उसे मौत की सज़ा दी जातीथी. यही सब देखकर गद्दाफ़ी ने अपना मकसद तय कर लिया था. उसे प्रेरणा पड़ोसी मुल्क़ईजिप्ट से मिली थी. 1952 का साल था. लेफ़्टिनेंट कर्नल गमाल अब्देल नासेर ने एकरक्तहीन क्रांति करके ईजिप्ट में राजशाही का चैप्टर क्लोज़ कर दिया था. गद्दाफ़ी,नासेर को अपना हीरो मानता था. इसलिए, उसने पहले आर्मी में दाखिला लिया. फिर नासेरकी ही तरह ‘फ़्री ऑफ़िसर्स’ नाम का एक गुट बनाया. ये कुछ चुनिंदा आर्मी ऑफ़िसर्स काग्रुप था. इनकी गुप्त मीटिंग होती थी और ये लोग अपनी सैलरी एक फ़ंड में जमा करतेथे. वे बस मौके का इंतज़ार कर रहे थे. क़यामत की वो रात आई 31 अगस्त, 1969 को. रातके ढाई बजे ऑपरेशन जेरूसलम शुरू हुआ. लीबिया के दूसरे सबसे बड़े शहर बेनग़ाज़ी कीबर्का छावनी में गद्दाफ़ी की एंट्री हुई. अफ़सरों पर हथियार ताने गए. जवाब मेंछावनी के अफ़सरों अपने हाथ खड़े कर दिए. ये सरेंडर का संकेत था. बिना ख़ून बहाएबेनग़ाज़ी गद्दाफ़ी के कब्ज़े में आ चुका था. तब तक उनके दूसरे साथी बेनग़ाज़ी औरराजधानी त्रिपोली के रेडियो स्टेशन, एयरपोर्ट, एंटी-एयरक्राफ्ट बैटरीज़ पर कब्ज़ाजमा चुके थे. राजा साहब इलाज कराने तुर्की गए हुए थे. उन्हें वापस आने का मौका तकनहीं मिला. बाद में निर्वासन में ही उनकी मौत हो गई. सितंबर 1969 की वो सुबह लीबियाऔर वहां के लोगों के लिए उम्मीदों का समंदर लेकर आई थी. लोगों को लगा, उन्हेंतानाशाही युग से मुक्ति मिल गई है. अब लीबिया में शांति ही शांति होगी. उन्हें फिरसे निरंकुशता नहीं झेलनी पड़ेगी. लेकिन ये सब महज एक दिवा-स्वप्न साबित हुआ.क्रांति के 42 बरस बाद. 22 फ़रवरी 2011. मुअम्मार गद्दाफ़ी एक बार फिर भाषण दे रहाथा. इस बार स्टेट टीवी पर. उसके चेहरे से गुस्से के साथ-साथ डर भी झलक रहा था. वोअपने ही लोगों को धमका रहा था. गद्दाफ़ी ने अपने भाषण में ‘ज़ेंगा-ज़ेंगा’ शब्द काइस्तेमाल किया. हिंदी में इसका मतलब होता है गली-गली. उसने कहा, ‘मेरे आदमी तुम्हेंगली-गली में, घर-घर में घुसकर मारेंगे. मैं लीबिया को अपने हाथों से जाने नहींदूंगा.’ ये भाषण देने के बाद ही उसे भागना पड़ा. ऊपर नाटो सेना के फ़ाइटर जेट्स थेऔर नीचे जनता उसके ख़ून की प्यासी हो चुकी थी. इसके कुछ दिनों बाद ही गद्दाफ़ी केक़ाफ़िले पर हमला हुआ. उसने भागकर छिपने की कोशिश की. लेकिन वो असफ़ल रहा. जिस जनताने उसे एक समय अपने सिर पर बिठाया था, उसी ने बड़ी बेरहमी से उसका क़त्ल कर दिया.एक समय क्रांति के नायक रहे मुअम्मार गद्दाफ़ी से लोगों का मोहभंग क्यों हुआ? उसेकुर्सी से उतारने के बाद लीबिया का क्या हुआ? और, आज के दिन हम लीबिया और गद्दाफ़ीकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे. पहले समझते हैं कि गद्दाफ़ी कीसत्ता का चाल और चरित्र कैसा था? इदरिस का तख़्तापलट करने के बाद रिवॉल्युुशनरीकमांड काउंसिल (RCC) की स्थापना की गई. ये काउंसिल लीबिया की अस्थायी सरकार थी.गद्दाफ़ी RCC का मुखिया बना. कहते हैं कि तख़्तापलट क्रांति एक बार में ख़त्म नहींहोती. इसकी कम से कम दो लहर तो ज़रूर आती है. गद्दाफ़ी के साथ भी ऐसा ही हुआ.सत्तानशीं होने के कुछ महीने बाद ही उसे उतारने की कोशिश हुई. गद्दाफ़ी चालाक था.उसे पहले से इसका अंदेशा था. वो एक कदम आगे की चाल चल चुका था. साज़िश नाकाम रही.गद्दाफ़ी बच गया. 70 के दशक की शुरुआत में गद्दाफ़ी के सामने कोई चुनौती नहीं बची.तब उसने अपना ध्यान राज-काज पर लगाया. शासन के आरंभ में उसने तीन अहम काम किए.पहला, पश्चिम की तेल कंपनियों पर नकेल कसी गई. एंथनी सिम्पसन ने दुनिया की 7 सबसेबड़ी तेल कंपनियों पर ‘द सेवेन सिस्टर्स’ नामक एक किताब लिखी है. इसमें उन्होंने एकक़िस्से का ज़िक्र किया है. ‘लीबिया का प्रधानमंत्री अब्दुस्लाम जालौद, गद्दाफ़ी काकरीबी दोस्त था. जब वो तेल कंपनियों के साथ मीटिंग के लिए जाता, उसकी क़मर मेंबंदूक ठूंसी रहती थी. मीटिंग शुरू होते ही वो अपनी बंदूक निकालकर टेबल पर रख देताथा.’ इससे तेल कंपनियों में ख़ौफ़ बढ़ा. वो गद्दाफ़ी की शर्त पर काम करने के लिएतैयार हो गए. अब तेल भंडार पर पहला हक़ लीबिया के लोगों का था. इस आमदनी को जनता केलिए ख़र्च करना शुरू किया गया. इसके बदले में गद्दाफ़ी ने वफ़ादारी खरीदी. जो ख़िलाफ़गए, उनको किनारे कर दिया गया. दूसरा, जब आमदनी बढ़ी तो गद्दाफ़ी मल्टी-नेशनल होगया. उसने दुनियाभर में चरमपंथियों को पैसे और हथियार की सप्लाई की. चाड, फलीस्तीन,लेबनान, आयरलैंड, दक्षिण अफ़्रीका आदि. उसने आतंकी घटनाओं के दोषियों को अपने यहांशरण भी दी. बर्लिन के एक क्लब में बम धमाके और लॉकरबिल में पैसेंजर प्लेन को उड़ानेके पीछे भी गद्दाफ़ी का हाथ था. कई बरस बाद उसने इन घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजादेने का ऐलान किया. हालांकि, वो इनमें सीधे तौर पर अपनी संलिप्तता से इनकार करतारहा. तीसरा, गद्दाफ़ी ने लीबिया के शासन के लिए नई थ्योरी दी. उसने दावा किया कि येकैपिटलिज्म और कम्युनिज्म से अलग है. इसके लिए उसने एक किताब भी लिखी. इसका नाम था- ग्रीन बुक. लीबिया में हर किसी के लिए ये किताब पढ़ना और उसके लिखे को माननाअनिवार्य कर दिया गया. इसके अलावा, RCC को भंग कर दिया गया और ऐलान किया कि सरकारपीपल्स कांग्रेस की मदद से चलाई जाएगी. गद्दाफ़ी ने ख़ुद कोई पद नहीं लिया. उसनेख़ुद को ब्रदर लीडर और गाइड ऑफ़ द रिवॉल्युशन घोषित किया. बाहर से देखने पर तोलीबिया में लोकतंत्र नज़र आता था, लेकिन अंदर गद्दाफ़ी बॉस था. बाकी सारी संस्थाएंबस हां में हां मिलाने के लिए बची रह गईं थी. जब सत्ता के सामने चुनौती खत्म होजाती है, तब शासक घमंडी हो जाता है. उसकी आंखों के सामने सब कुछ एक रंग में दिखनेलगता है. ऐसे में अगर कोई शासक को आईना दिखाए तो वो बौखला जाता है. वो हर युक्तिलगाकर भरम कायम रखना चाहता है. साल 1984. जून का महीना. बेनग़ाज़ी के बास्टेकबॉलस्टेडियम में नौजवानों की भीड़ जमा थी. उन्हें कॉलेजों से बसों में भरकर लाया गयाथा. एक तमाशा दिखाने के लिए. जब स्टेडियम भर गया, तब एक व्यक्ति को स्टेज के बीचमें लाया गया. उसका नाम था, सादिक़ हमीद सुवैदी. उसकी उम्र 30 साल थी. सादिक़ कीपढ़ाई अमेरिका में हुई थी. वो अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर लीबिया वापस आया था. बहुतोंकी तरह वो भी गद्दाफ़ी के शासन से नाराज़ चल रहा था. एक दिन उसे उसके घर से उठालिया गया. फिर ट्रायल का ड्रामा हुआ. वहां सज़ा पहले से तय थी. बेनग़ाज़ी स्टेडियममें उसकी सज़ा की प्रदर्शनी लगाई गई थी. सादिक़ को गुनाह क़बूलने के लिए विवश कियागया. इसके बाद उसके गले में फांसी का फंदा डाल दिया गया. जब उसका शरीर छटपटा रहाथा, उस समय हुदा नाम की एक महिला भीड़ से निकल कर बाहर आई. और, वो सादिक़ का पैरपकड़कर झूल गई. कुछ ही सेकंड में सादिक़ का शरीर लाश में तब्दील हो चुका था. इसपूरी घटना का लाइव प्रसारण टीवी पर किया जा रहा था. गद्दाफ़ी को हुदा का रवैया पसंदआया. उसे सरकार में बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई. हुदा को आज भी ‘जल्लाद हुदा’ के नाम सेयाद किया जाता है. सादिक़ सुवैदी कांड के ज़रिए गद्दाफ़ी ने दो संदेश दिए थे. अगरविरोध किया तो सादिक़ की तरह ही सरेआम टांग दिए जाओगे. अगर साथ रहे तो हुदा के जैसाइनाम मिलेगा. एक और कहानी सुनिए. ये साल 1996 की बात है. राजधानी त्रिपोली की अबूसलीम जेल में तीन मुजाहिदीन लाए गए. ये लोग सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ने के लिएअफ़ग़ानिस्तान गए थे. बाद में वे पाकिस्तान में अरेस्ट हुआ. फिर उन्हें लीबियाडिपोर्ट कर दिया गया. इन तीनों ने जेल से भागने का प्लान बनाया. 28 जून को उन्होंनेकुछ सेल्स का ताला तोड़ दिया. क़ैदी भागने ही वाले थे कि गार्ड्स ने गोलीबारी शुरूकर दी. इसमें सात लोग मारे गए, जबकि 120 घायल हो गए. फिर जेल अधिकारियों औरक़ैदियों के बीच समझौता हुआ. जेल अधिकारी बस लेकर आए और घायलों को अपने साथ ले गए.उन्हें फिर कभी नहीं देखा गया. अगले दिन कुछ क़ैदियों को हटाकर दूसरी बैरक में रखदिया गया. जो बच गए, उनके ऊपर दो घंटे तक लगातार गोलियां बरसाईं गई. इसमें कम-से-कम12 सौ लोग मारे गए. इनमें छोटे-मोटे अपराधों के लिए बंद किए गए लोग भी थे. अधिकांशक़ैदियों ने अदालत का मुंह तक नहीं देखा था. मारे गए लोगों की लाशों को जेल के अंदरही दफ़्न कर दिया गया. ये नरसंहार कई सालों तक छिपा रहा. घरवाले अपने लोगों सेमिलने आते. उनसे सामान ले लिया जाता, लेकिन मिलने नहीं दिया जाता था. ग़रीबी,भ्रष्टाचार, महंगाई, दमन आदि कई कारण थे, जिनकी वजह से जनता त्रस्त आ चुकी थी. वेबस एकजुट नहीं हो पा रहे थे. फिर दिसंबर 2010 में एक चिनगारी फूटी. ट्यूनीशिया मेंएक फल-विक्रेता ने नगर-पालिका की ज़्यादती से आजिज़ आकर ख़ुद को आग लगा ली. इस घटनाने अरब स्प्रिंग को जन्म दिया. पूरे मिडिल-ईस्ट में दशकों से तानाशाही चल रही थी.लीबिया में तो 42 सालों से. आख़िरकार, अरब स्प्रिंग की आग लीबिया में भी पहुंची.इसने मुअम्मार गद्दाफ़ी को भस्म कर दिया. अरब स्प्रिंग के दौरान उसके तीन बेटे मारेगए. लेकिन जिस बेटे को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा थी, उसको लेकर हमेशा रहस्य बरकराररहा. उसका नाम था सैफ़ अल-इस्लाम अल-गद्दाफ़ी. उसने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स सेपीएचडी किया था. वो अपने पिता का सबसे चहेता था. उसे अगला ब्रदर लीडर माना जा रहाथा. सैफ़ ने अपने पिता की ग़लत नीतियों का विरोध भी किया था. लेकिन अरब स्प्रिंग केसमय वो प्रोटेस्टर्स के ख़िलाफ़ हो गया. पिता की हत्या के कुछ दिनों बाद उसे भीगिरफ़्तार कर लिया गया. उसके ऊपर मुकदमा चला. फांसी की सज़ा सुनाई गई. और, फिर एकदिन माफ़ी भी दे दी गई थी. जिस ग्रुप ने उसको अरेस्ट किया था, उसने 2017 में उसेरिहा भी कर दिया. इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) आज भी सैफ़ अल-इस्लाम की तलाश कररही है. मानवता के ख़िलाफ़ अपराध का मुकदमा चलाने के लिए. लंबे समय तक ये चर्चाचलती रही कि सैफ़ ज़िंदा है भी या नहीं. फिर जुलाई 2021 में एक इंटरव्यू सामने आया.सैफ़ ने न्यू यॉर्क टाइम्स से किसी गुप्त जगह पर बात की थी. इसमें उसने लीबिया परशासन करने की इच्छा जताई थी. आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं? वजह है, सैफ़अल-इस्लाम का पर्दे से बाहर आना. सैफ़ ने दिसंबर 2021 में होने वाले राष्ट्रपतिचुनाव के लिए अपना नाम रजिस्टर करवाया है. ये चुनाव 2019 में ही होना था. लेकिनअलग-अलग पक्षों के बीच चल रहे मनमुटाव के चलते इसमें देरी होती गई. इस बार चुनाव केलिए 24 दिसंबर की तारीख़ तय हुई है. हालांकि, अभी भी नियमों को लेकर पार्टियों मेंएकरुपता नहीं है. पिछले हफ़्ते ये तय किया गया कि जो कोई इस चुनाव को रोकने कीकोशिश करेगा, उस पर बैन लगा दिया जाएगा. गद्दाफ़ी के सत्ता से हटने के बाद सेलीबिया सिविल वॉर से जूझ रहा है. कहा जा रहा है कि ये चुनाव इस मुल्क़ को स्थिरताप्रदान करेंगे. चुनाव के बाद बाहरी सेनाओं को भी बाहर जाना होगा. क्या सैफ़अल-इस्लाम के चुनाव जीतने का कोई चांस है? इसकी संभावना बेहद कम है. लीबिया में एकबड़ा धड़ा आज भी गद्दाफ़ी के प्रति वफ़ादार है. लेकिन उसके सताए लोगों की संख्याकहीं अधिक है. बाकी कैंडिडेट्स के पास आम लोगों का सपोर्ट भी है. और, वे लंबे समयसे लीबिया की पॉलिटिक्स का हिस्सा रहे हैं. उनकी तुलना में सैफ़ को बहुत कम लोगजानते हैं. इंटरनैशनल स्टेज पर भी बैकअप की कमी है. उसके पास पिता की विरासत केअलावा कुछ और नहीं है. और, वो विरासत कैसी है, इसके बारे में लीबिया की जनता सेबेहतर कौन जानता होगा.