'भला है, बुरा है, जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है.' 'नसीब अपना अपना' फिल्म काये गाना आपने सुना होगा. साल 1986 में ये फिल्म आई थी. और उस दौर में गीतकार,हीरोइन के लिए गाना लिख देता है कि मेरा पति मेरा देवता है. शायद आज ना लिख नापाएं. क्योंकि इस गाने के 34 साल बाद आज इसी देश के कोर्ट में और मीडिया मेंमेराइटल रेप यानी वैवाहिक यौन शोषण पर बहस चल रही है. हम चेतना के उस स्तर तक आ गएहैं कि आज देश की महिलाएं अपने पति के भी जबरन संबंध बनाने पर उसे रेप की कैटेगरीमें शामिल करने की मांग कर रही हैं. कहने का मतलब वक्त के साथ हमारे विचार भी बदलतेहैं. पुरुषों के प्रभुत्व वाले समाज में महिलाएं अपने हक़ूक के लिए लगातार लड़ रहीहैं. और इस लड़ाई से बराबरी और आज़ादी का अपना दायरा बढ़ा भी रही हैं. और बात सिर्फमहिलाओं की नहीं है. समलैंगिकता, जातिवाद, पहनावा इन सब पर हमारे विचार बदलते हैं.बेहतरी वाले बदलाव के लिए हमारे देश में बहसो-मुबाहिसा होती हैं. लेकिन दिक़्क़त तबशुरू हो जाती है, जब बदलावों और समुदायों की लड़ाई सड़क पर आ जाती है. जैसा किहिजाब के मामले में हमें कर्नाटक में दिख रहा है. हिजाब के समर्थन वाले और विरोधवाले सड़कों पर भिड़ रहे हैं. जय श्री राम और अल्लाहू अकबर के नारों का टकराव देखनेको मिल रहा है. एक तरफ हिंदू दक्षिणपंथ और दूसरी तरफ मुस्लिम दक्षिणपंथ है. दोनोंके ही समर्थन में सोशल मीडिया के क्रांतिवीर खूब लिख रहे हैं. लेकिन असल में सहीकौन है. ये कोर्ट और कानून से तय होने वाली चीज़ है. तो तर्कों और कानून की नज़र सेही आज फिर हम इस मामले को समझने की कोशिश करेंगे. अब तक क्या हुआ? कर्नाटक के उडुपीइंटर कॉलेज से मामला शुरू. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में. 8 लड़कियों ने आरोप लगाया किउन्हें क्लास में हिजाब पहनकर नहीं बैठने दिया जा रहा है. लड़कियों ने दिसंबर मेंही क्लास में हिजाब पहनकर बैठना शुरू किया था. कॉलेज प्रशासन ने बताया कि लड़कियांकैंपस में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में नहीं पहन सकती और ये पहले सेनियम है. क्योंकि कॉलेज के ड्रेस कोड में हिजाब नहीं हैं. इसके खिलाफ लड़कियों काविरोध शुरू हुआ. फिर कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, जो पीएफआई से जुड़ा माना जाता है, उससंगठन ने लड़कियों के हिजाब पहनने की तरफदारी शुरू की. फिर स्थानीय बीजेपी विधायकऔर बजंरग दल जैसे हिंदू संगठन इसमें शामिल हुए. हिंदुओं छात्र-छात्राओं ने भगवास्कार्फ पहनकर इंटर कॉलेज में दाखिल होने की कोशिश की. उडुपी से मामला कर्नाटक केऔर भी इलाकों में फैल गया. टकराव इतना ज्यादा बढ़ गया कि मंगलवार को सरकार ने स्कूलऔऱ इंटर कॉलेजों को 3 दिन के लिए बंद कर दिया. उधर मुस्लिम छात्राओं ने कोर्ट सेहिजाब पहनने की मांग की. कल कोर्ट में जस्टिस कृष्ण दीक्षित की सिंगल बेंच इस मामलेकी सुनवाई की. कोर्ट के सामने दो बड़े सवाल थे. पहला ये कि क्या हिजाब मुस्लिम कीज़रूरी प्रैक्टिस का हिस्सा है? और दूसरा सवाल कि क्या क्लासेज़ में हिजाब पहनने सेरोकना लड़कियों को उनके बुनियादी अधिकार से वंचित करना है. कल जस्टिस दीक्षित नेकोर्ट रूम में कुरान की कॉपी मंगवाई थी. लेकिन शाम तक कुछ तय नहीं हो पाया तो आजफिर सुनवाई हुई. अब आगे की बात शुरू करते हैं. आज ढाई बजे हाई कोर्ट में सुनवाईशुरू हुई. लेकिन सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस दीक्षित ने कह दिया कि उन्हें लगता हैकि इस केस पर बड़ी बेंच को विचार करना चाहिए. माने एक से ज्यादा जजों की बेंच. जजसाहब ने सभी पक्षों के वकीलों की इस बात पर सहमति मांगी. इस पर, सीनियर एडवोकेटसंतोष हेगड़े ने कहा कि बड़ी बेंच को केस ट्रांसफर करना तो कोर्ट तय करे. लेकिन उनछात्राओं को राहत मिलनी चाहिए जिनके पास अब सिर्फ दो महीने ही बचे हैं. इस साल कीपरीक्षाओं में. किसी भी लड़की को शिक्षा से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए. इस बातचीतमें कर्नाटक सरकार के वकील यानी एडवोकेट जनरल ने कहा कि हम मामले का जल्दी निपटाराचाहते हैं, फैसला चाहे जो भी हो. क्योंकि ये बड़ा मामला बन चुका है. एडवोकेट जनरलने ये भी कहा कि कई जजमेंट हैं जब हिजाब को धर्म के जरूरी हिस्से में नहीं मानागया. जबकि दूसरे वकील बच्चों को अतंरिम राहत देने की मांग कर रहे थे. सबकी बातसुनकर जस्टिस दीक्षित ने कहा कि चीफ जस्टिस जब बड़ी बेंच बनाएंगे, तो उसके बादअंतरिम राहत वाली याचिकाओं पर विचार किया जा सकता है. तो कुल मिलाकर इस मामले पर अबकर्नाटक हाई कोर्ट की बड़ी बेंच सुनवाई करेगी. अब यहां कई बातें समझने की हैं. पहलातो ये कि कॉलेज में ड्रेस कोड लागू करना, या हिजाब पहनने पर पाबंदी छात्राओं केबुनियादी अधिकारों का सीधा सीधा हनन नहीं है. अगर ऐसा होता तो कोर्ट की तरफ सेतुरंत इस मामले में छात्राओं के हक में फैसला दे दिया जाता है. दूसरी बात, कोर्ट कीसिंगल बेंच ये तय नहीं कर पाई की हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य प्रैक्टिस काहिस्सा है. अगर कोर्ट ऐसा मान लेता तो ये मामला अनुच्छेद 25 के तहत बुनियादीअधिकारों में आ जाता. और लड़कियों को हिजाब पहनने की अनुमति मिल जाती. लेकिन ऐसा भीनहीं हुआ. एक बात यहां समझने की और है. जिस तरह से छात्राओं को संविधान से बुनियादीअधिकार मिले हैं वैसे ही उस संस्थान को, यानी इंटर कॉलेज को भी अधिकार मिले हैं.कर्नाटक राज्य का कानून भी इंटर कॉलेज को स्वायतत्ता देता है. इस कानून का नाम है- Karnataka Education Act, 1983. इसके तहत संस्थानों को ड्रेस कोड तय करने काअधिकार है. और इसी अख्तियार से इंटर कॉलेज ने छात्राओं के लिए एक ड्रेस कोड बनाया,जिसके तहत कक्षाओं में हिजाब पहनने पर पाबंदी रखी. और इसके लिए कॉलेज ने छात्राओंसे लिखित में सहमति भी ली थी. माने यहां तक इंटर कॉलेज की हिजाब पर पांबदी सही है.लेकिन अगर कोर्ट ये तय कर देता है कि हिजाब पहनना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है, तो फिर अनुच्छेद 25 के तहत कॉलेज का हिजाब पाबंदी वाला नियम गलत हो जाएगा.बुनियादी अधिकारों के खिलाफ हो जाएगा. लेकिन अभी कोर्ट ने भी तो नहीं कहा कि हिजाबइस्लाम की अनिवार्य प्रैक्टिस है. इस पेचीदगी को और समझने के लिए हमने हैदराबादस्थित NALSAR University of Law के वायस चांसलर फैज़ान मुस्तफा से बात की. उन्होंनेकहा किसी भी शैक्षणिक संस्थान को यह अधिकार है कि वह अपने हिसाब से ड्रेस कोड रखसकता है. लेकिन यह अधिकार है ऐसा नहीं है कि कोई ऐसा रूल बना दिया जाए जो किसी केमौलिक अधिकार का हनन करे. संविधान के अनुच्छेद 25 में आप लोगों की धार्मिकस्वतंत्रता को वॉइलेट कर सकते हैं. तब जब ये समाज की नैतिकता, या किसी और मौलिकअधिकार से टकराए. अब कई लोगों का ये सवाल हो सकता है कि सिखों को तो पगड़ी पहनने कीछूट होती है. उनको क्यों नहीं रोका जाता. क्योंकि सिख धर्म में पगड़ी पहनना धर्म कीअनिवार्य प्रैक्टिस का हिस्सा है. हिजाब के मामले में अभी ये साबित नहीं हुआ. और कईधर्मों में बहुत सारी चीज़ें हैं जिनमें अभी कोर्ट को ये तय करना है कि क्या आवश्यकप्रैक्टिस है और क्या नहीं है. इसलिए सबरीमाला केस पर फैसला देते हुए तब के चीफजस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई ने 7 जजों की संवैधानिक बेंच बनाई थी. ये बेंचसबरीमाला केस के अलावा धार्मिक मामलों की कई सारी याचिकाओं पर विचार करेगी. ये तयकरेगी कि कौनसी प्रैक्टिस आवश्यक है और कौनसी नहीं. तो बहुत मुमकिन है कि कर्नाटकहाई कोर्ट की लार्जर बेंच का जो फैसला आए, उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में चलाजाए. और फिर सुप्रीम कोर्ट तय करे कि हिजाब इस्लाम में अनिवार्य है या नहीं. ये तोहुई आईन और कानून की बात. अब दीन के मसले पर आते हैं. क्या इस्लाम के जानकार हिजाबको अनिवार्य मानते हैं. ये समझने के लिए हमने दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामियायूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे जुनैद हैरिस का रुख किया. जामिया के इस्लामिक स्टडीज़सेंटर में फेकल्टी हैं जुनैद साहब. उन्होंने हमें बताया हिजाब का ज़िक्र क़ुरान औरहदीस दोनों में है.मोहम्मद साहब के वक़्त भी औरतें हिजाब किया करती थीं. मतभेद इसबात को लेकर है कि औरतें उस वक़्त चेहरा खोलकर हिजाब करती थी या उनका चेहरा भी ढकारहता था. यह दोनों तरीक़े से प्रेक्टिस किया जाता है. प्रोफेसर साहब के बताने सेबात ये समझ आई कि कुरान में कई आयत हैं जिनमें परदे का ज़िक्र है. महिला को देखकरमर्द की नियत ना बिगड़ जाए इसलिए पर्दा है. यानी मर्दों से महिलाओं से बचाने के लिएपर्दा. लेकिन क्या मर्दों की नियत के हिसाब से महिलाओं को पर्दा करना चाहिए. इस परकई महिलाएं अलग विचार रखती हैं. हमने बात की महिला अधिकारों के लिए काम करने वालीशबनम हाशमी से. उन्होंने हमें बताया हिजाब या घूँघट पहनने से औरत की सुरक्षा होजाएगी यह एक बकवास तर्क है. सुरक्षा का कपड़ों से कोई लेना देना नहीं है. महिलाओंको अगर सुरक्षित रखना है तो इस सामाजिक ढांचे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानीपड़ेगी. यानी कई महिलाएं पर्दे को बंधन की तरह देखती हैं. हमने कई मुस्लिम बहुलदेशों में हिजाब के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन देखे. ये भी देखा कि ईरान औरअफगानिस्तान में इस्लामिक सरकारें आने से पहले हिजाब या बुर्के को लेकर ज्यादासख्तियां नहीं थीं. सरकारों के हिसाब से ये पाबंदियां बढ़ जाती हैं. हालांकि कईमहिलाएं ये भी मानती हैं कि महिलाओं को अपनी इच्छा से कुछ भी पहनने का हक होनाचाहिए, वो हक नहीं छीना जा सकता है. इस बारे में हमने अक्सा शेख से बात की. येहमदर्द इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एसोसिएट प्रोफेसर हैं. और ट्रांसजेडर राइट्सएक्टिविस्ट भी हैं. उन्होंने हमें बताया इस्लाम में जब हमें जो हिजाब की बात करतेहैं तो हमें इसका कोई साफ़ साफ़ रूल नहीं मिलता है. कई लोग इसमें कहेंगे कि आप कोसर ढँकना लाज़मी है, कई लोगों का कहना है कि चेहरा भी ढकना ज़रूरी है. ये एकइंडिविजुअल पे डिपेंड करता है कि वो हिजाब को किस तरीक़े से समझती हैं. कर्नाटक मेंहिजाब के लिए मुस्लिम कट्टरपंथ को उभरता देखकर उन महिलाओं को भी निराशा है,जिन्होंने महिलाओं के हकों के लिए, उनकी आज़ादी के लिए, उलेमाओं के कट्टरपंथ केखिलाफ लंबा संघर्ष किया. इनमें एक नाम है शीबा असलम फ़हमी का. उन्होंने हमें बतायाऔरतों के हिजाब और सुरक्षा का जो सवाल आज है वह राजनैतिक ज़्यादा है. और इसकाफ़ायदा उठाने वाले दोनों तरफ़ के लोग हैं. अब सारे विद्वानों को देखकर, और तथ्योंको देखकर हमें ये समझ आ रहा है कि हिंदू दक्षिणपंथ के खिलाफ एक मुस्लिम दक्षिणपंथतैयार हो रहा है. भगवा गमछे वाले, और सड़क पर बुर्के वाली लड़की के खिलाफ नारेबाज़ीकरने वाले लोग बिल्कुल भी सही नहीं है. लेकिन सही तो बुर्के की मांग वाली भी नहींहैं. उसके पीछे भी एक खास किस्म की राजनीति है. जो किसी के हित में नहीं हैं. किसीको इस्लामोफोबिक या संघी या हिंदुत्ववादी कह देना समस्या का हल नहीं है. उम्मीद हैआप जज्बात से इतर, एक साइंटिफिक टेम्परामेंट के साथ सारी बात समझेंगे.