संज्ञा पाण्डेय क्योटो से हैं. माने काशी से. बीएचयू में पढ़कर पेट नहीं भरा तोदिल्ली के जेएनयू आ गईं. पीएचडी पूरी होने को है. खूब पढ़ी हैं, तो गाहे बगाहेफिरंगी भी इनसे हिन्दुस्तान का ताना-बाना समझने को आ जाते हैं. स्कॉलरशिप के पैसेसरोजिनी में उड़ाते हुए इन्होंने ज़िन्दगी का फलसफा खूब सीखा है. उनके दिल की बातयहां पेश है.--------------------------------------------------------------------------------बचपन में एक दौर था जब हैप्पनिंग वीकेंड का मतलब गोदौलिया शॉपिंग पर जाना होता था.गैर बनारसियों का गोदौलिया से इंट्रो करा दें- गोदौलिया एक ज़माने में बनारस के लिएवही था, जो कभी पुरानी दिल्ली के लिए मीना बाज़ार हुआ करता था. नई सड़क से शुरू हो करविश्वानाथ मंदिर को टच करते हुए सीधे दशाश्वमेध घाट पर जो रोड ख़तम होती है, उसी रोडको गुलजार करता है गोदौलिया मार्किट. मार्किट क्या पूरा पेरिस ! वेनिस !गोदौलिया मार्केट. पिक्चर: Quoraमार्किट यूपी हैंडलूम की एक दुकान से शुरू होता था और फिर मार्किट का नशा फैशनसाड़ी-घर, माधुरी सूट-घर, हीरालाल-पन्नालाल साडीज़ होते हुए गंगा जमुना फैशन शॉप परपरवान चढ़ता था. पता नहीं होता था कि क्या खरीदना है, पर मां-पापा के साथ जाना बहुतजरूरी था. चाहे वहां जाकर झख ही क्यों न मारें.गोदौलिया जाने के लिए ताने भी बहुत सुने पड़ते थे. "पकौड़ी की तरह लटक लिए", उनमेंसबसे ज्यादा चुभने वाला लगता था.वक़्त के साथ बदलाव आया और हम बनारस से दिल्ली आ गए. यहां तो गेम ही बदल गया, वहांएक शहर का एक मार्किट और यहां तो एक शहर में कई-कई मार्किट. रेसिडेंशियल एरिया केअन्दर इतना सघन स्वर्ग जैसा मार्किट होगा, हमें तो एहसास ही नहीं था. दिल्लीपहुंचते ही पापा जी से जिद की कि बस यहीं जाना है- सरोजिनी मार्किट.जून की शाम पसीने से तर-बतर होते जब एस एन मार्किट देखा तो आंख फाड़-फाड़ कर देखते हीरह गए. उस दिन तो संकोच रहा पर मार्किट देख कर लगा कि एक सरोजिनी मार्किट में तो100 गोदौलिया समा जाएगा. एस एन की पूरी महिमा को समझने में तो कई सारी ट्रिप लग गई.पिक्चर: mapsofindiaमुद्रिका पकड़ के नॉरोजी नगर आते थे और पैदल एस एन मार्किट चल देते थे. मार्किट कीजियोग्राफी समझी, फिर मार्किट की इकॉनमी समझी. फिर उसकी सोशियोलॉजी और आज तकसायकोलॉजी समझ रहे हैं. जैसे-जैसे समय बीता और हमारी परिपक्वता बढ़ी, तो लगा एस एनमार्किट बस शॉपिंग का स्वर्ग नहीं है, बल्कि ये अपने अंदर अनेकों समाज-शास्त्रीयसिद्धान्तों को समेटे हुए है और कई प्रचलित पूर्वाग्रहों को भी ध्वस्त करता है. एसएन मार्किट ने एक नए तरह के नारीवाद को बढ़ावा दिया है, जिसमें आज की नारीस्वच्छंदता से शॉपिंग का मजा ले सकती है.गोदौलिया मार्किट से उलट सरोजिनी मार्किट महिलाओं की सुप्रीमेसी को बढ़ावा देता है.कोई भी साइज़, शेप और स्टाइल हो- यहां सबके लिए सब कुछ है. मार्किट में घुसते ही सबओर से आवाज आती है “मैडम ज़ारा, डब्ल्यू, औरेलिया, शॉपर्स स्टॉप सबके कुर्तेहैं यहां”, “सेल-सेल, भारी सेल, 1000 की चीज 100 में.”आश्चर्य तो ये है कि यहां डब्ल्यू के मोज़े भी मिलते हैं (पहली बार सुना, कि डब्ल्यूमोजा भी बनता है). मार्किट की सबसे अच्छी बात ये है कि इसने तय मान्यताओं को तोड़ाहै. ये सस्ती और बेहतरीन हाफ-पैंट, पार्टी वियर ड्रेसेस, वन-पीस, यहां तक कि ब्राऔर पैंटी को भी खुल्लम-खुल्ला खरीदने की आज़ादी देता है.सरोजिनी मार्केट. पिक्चर: indianbeautycentralयहां के दुकानदार बिहार, यूपी के छोटे गांवों और कस्बों से आते हैं. उनका कपड़ों काबखान करने का अपना अलहदा अंदाज है, जो दिल को लुभा जाता है. अगर आप शॉपिंग मूड मेंन भी हों, तब भी कुछ न कुछ खरीद ही लेती हैं.शॉपिंग केवल एक फील-गुड फैक्टर ही नहीं दिलाता, बल्कि एक तरह का आत्मविश्वास भीजगाता है. यहां 50 रुपए से हजारों तक के मिलने वाले कपड़ों ने गरीबी-अमीरी की दीवारको तोड़ दिया है. यहां सब औरतें ऊंच-नीच, जात-पांत, हाई क्लास - लो क्लास को दीवारतोड़ कर एक ही दुकान पर बारगेनिंग करती नजर आती हैं. सरोजिनी नगर मार्किट, एकमार्किट बस नहीं है. ये एक नए तरह का नारीवाद है, जिस पर मार्क्स का वो मशहूरआह्वाहन सटीक बैठता है, जिसमें वो दुनिया के मजदूरों को एक होने को कहते हैं.एस एन मार्किट को देख कर मन से एक ही आवाज़ आती है, "देश की महिलाओं, एक होकरसरोजिनी मार्किट में शॉपिंग करो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने केलिए फैशन का चरम है."-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ेंबुलाकी ने लड़की के बाप से मेरी जान बचाईकिस्सा बुलाकी साव- 22, लवटोलिया पुल पर बुलाकी ने कंटीरबा को पीटा