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बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे, तो CAA का क्या हुआ?

इतने विवाद के बाद इस कानून की क्या स्थिति है?

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बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के ख़िलाफ हिंसा के कारण तनाव बना हुआ है.
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सुरेश
19 अक्तूबर 2021 (Updated: 19 अक्तूबर 2021, 04:33 PM IST)
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दिसंबर 2019 में जब मोदी सरकार नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA लाई तो पूरे देश में खूब प्रदर्शन हुए. कानून का विरोध हुआ. संसद में विरोध हुआ, सड़क पर प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में करीब 80 लोग मारे गए. लेकिन मोदी सरकार अड़ी रही कि कानून वापस नहीं हो सकते. बहुत ही ज़रूरी कानून हैं. कानून के पक्ष में सरकार ने पड़ोसी देशों में हिंदुओं, सिखों के साथ क्या होता है, इसके खूब उदाहरण दिए. कुल मिलाकर सरकार ने ये जता दिया कि अगर कानून नहीं आया तो पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के साथ ज़ुल्म होते रहेंगे. अब बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हफ्तेभर से हिंसा हो रही है. और विपक्षी पार्टियों के नेता सरकार से पूछ रहे हैं कि आपका सीएए कहां हैं. प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल पूछे जा रहे हैं. तो सीएए कहां है और हिंदुओं पर अत्याचारों को लेकर भारत सरकार क्यों चुप है. ये बताएंगे आपको, लेकिन बांग्लादेश में हो क्या रहा है, पहले उसकी बात. हफ्तेभर से वो तस्वीरें वीडियो आ रहे हैं जिनमें कोई भीड़ मंदिर में तोड़फोड़ कर रही है, या किसी घर में आ लगा रही है. दुर्गापूजा के दौरान ये हिंसा शुरू हुई. 13 अक्टूबर को बांग्लादेश के कोमिल्ला शहर में अफवाह फैली कि दुर्गा पूजा के पंडाल में कुरान को मूर्ति के पैर के नीचे रखा गया है. सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल की गई. हालांकि बांग्लादेश की पुलिस की तरफ से कहा गया कि तस्वीरें 5 साल पुरानी हैं. लेकिन जिन्हें अफवाह ही फैलानी हो, उन्हें सच से क्या लेना. कुरान और इस्लाम के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ लोगों को भड़काया गया. इस हद तक कि भीड़ हाथों में पत्थर, लाठियां लिए सड़कों पर उतरी आई. फिर कई इलाकों में मूर्तियां तोड़ने की खबरें, तस्वीरें आई. पूजा पंडालों में आगजनी और हिंदुओं के घरों पर हमले हुए. 15 अक्टूबर को नोआखली इलाके में इस्कॉन मंदिर पर हमले की खबर आई. एक दिन श्रद्धालु पार्थ दास का शव पास के तालाब में मिला. 65 से ज्यादा घर जलकर खाक 16 अक्टूबर को पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने दंगाइयों को काबू में कर लिया है. लेकिन 17 अक्टूबर की देर रात एक और भयानक घटना हुई. रंगपुर के पीरगंज़ में अफ़वाह फैली कि एक हिंदू युवक ने फ़ेसबुक पर इस्लाम-विरोधी बातें लिखी हैं. इसके बाद भारी संख्या में दंगाई युवक के घर के पास इकट्ठा हो गए. पुलिस उसी समय मौके पर पहुंच गई. उन्होंने युवक को तो बचा लिया. लेकिन दंगाईयों ने आस-पास के घरों में आग लगा दी. इसमें 65 से ज्यादा घर जलकर खाक हो गए. आगजनी के बाद पुलिस और भीड़ में मुठभेड़ भी हुई. इस हिंसा के विरोध में 18 अक्टूबर को चिटगांव में सैकड़ों लोगों ने रैली निकाली. रैली में हिंदुओं के अलावा सेक्यूलर मुस्लिम भी शामिल थे. लेकिन उसी दिन रंगपुर ज़िले से खबर आई कि हिंदुओं के दो गांवों को आग लगा दी गई. अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है. अब ये हिंसा कर कौन रहा है. जमात-ए-इस्लामी गुट के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर का नाम आ रहा है. बांग्लादेश के गृह मंत्री ने कहा है कि हिंसा के पीछे जमात और बीएनपी का हाथ हो सकता है. आज गृह मंत्री ने ये भी कहा है कि ये घटनाएं सांप्रदायिक नहीं हैं, बल्कि साजिश के तहत करवाई गई हैं, ताकि बांग्लादेश की इमेज खराब की जा सके. TMC-BJP आमने-सामने अब बांग्लादेश में जो रहा है, उसे लेकर भारत में भी सहूलियत की राजनीति शुरू हो गई है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी आपस में भिड़ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में इसी महीने विधानसभा की चार सीटों पर उपचुनाव होना है. शांतिपुर, खरदाह, गोसाबा और दिनहाटा. यहां 30 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे और 2 नवंबर को नतीजे आएंगे. इसलिए टीएमसी और बीजेपी दोनों बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे को भुना रही हैं. ममता बनर्जी का तो इन घटनाओं पर कोई बयान नहीं आया है, लेकिन टीएमसी के नेता प्रवक्ता कह रहे हैं इन घटनाओं में बीजेपी अपना फायदा उठाने में लगी है. जबकि बीजेपी पूछ रही है कि बंगाली हिंदुओं की बात करने वाली ममता बनर्जी इन घटनाओं पर चुप क्यों हैं. सवाल तो प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर भी उठ रहे हैं. भारत सरकार का कोई आधिकारिक बयान बांग्लादेश की घटनाओं पर नहीं आया है. हालांकि बांग्लादेश में भारत के उच्चायोग ने इन घटनाओं को लेकर शेख हसीना की सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखी थी. और ये बात गुरुवार को विदेश मंत्रालय ने अभी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताई थी. हालांकि जिस तरह के बयान की उम्मीद इन घटनाओं के बाद होनी चाहिए थी, वो नहीं हुआ. शायद सरकार बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहती. वो आतंरिक मामले जिनकी लंबी लाइन भारत सरकार ने ही कुछ दिन पहले खींची थी. किसान आंदोलन पर जब कई देशों के नेताओं ने बयान दिए थे, तब भारत की सरकार ने कहा था कि दुनिया हमारे आंतरिक मामलों में दखल ना दे. उस हिसाब से अब बांग्लादेश के मामले में भारत सरकार का बोलना भी आंतरिक मामलों में दखल जैसा ही कहा जा सकता है. शायद इसलिए सरकार कुछ नहीं बोल रही. हालांकि आज गृह राज्य मंत्री निषित प्रमाणिक इस मुद्दे पर सवाल पूछा गया. उन्होंने कहा कि जैसे किसी देश पर प्राकृतिक आपदा आती है, वैसे ही ये बांग्लादेश पर एक आपदा है. कहा कि भारत उनसे बात करके सहयोग करने के लिए तैयार है. गृह राज्य मंत्री कह रहे हैं कि शेख हसीना सरकार की कार्रवाई पर संतुष्टि जता रहे हैं. 15 अक्टूबर को प्रधानमंत्री हसीना ने ढाकेश्वरी मंदिर में जुटे हिंदू समाज के लोगों से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से बात की थी. उन्होंने दोषियों पर कार्रवाई करने का भरोसा दिया था. 19 अक्टूबर को यानी आज भी शेख हसीना ने अपने गृह मंत्री असदुज़मान को निर्देश दिए हैं कि धर्म के नाम पर हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो. शेख हसीना की नसीहत इन घटनाओं पर शेख हसीना ने भारत को भी एक नसीहत दी है. उन्होंने कहा कि भारत को भी उपद्रवियों को लेकर सतर्क रहना चाहिए. भारत में भी ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिससे हमारा मुल्क प्रभावित हो. हमारे हिन्दुओं को मुश्किलों का सामना करना पड़े. भारत में कुछ होता है तो हमारे यहां के हिन्दू प्रभावित होते हैं. शायद शेख हसीना का इशारा उन घटनाओं की तरफ था जिनमें हमारे देश के अंदर मुस्लिमों को निशाना बनाया जाता है. किसी अफवाह के आधार पर मुस्लिमों की मॉब लिचिंग हो जाती है. फिर मॉब लिंचिंग के आरोपी जेल से बाहर आते हैं तो केंद्र सरकार का कोई मंत्री उनका स्वागत करता है. या फिर वो घटनाएं जब भीड़ नाम पूछकर किसी को पीट देती है, और आरोपियों की बचाव में राज्य के गृह मंत्री उतर आते हैं. हमारे देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं, इसलिए ये सब चल जाता है, पार्टियां इसका राजनीतिक फायदा उठा लेती हैं. लेकिन जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं, उन्हें कट्टरपंथियों का खामियाजा भुगतना पड़ता है. फिर चाहे वो कश्मीर हो या बांग्लादेश. बांग्लादेश की घटनाओं पर आज वीएचपी समेत कई हिंदू संगठनों के प्रदर्शन हुए. आप इन संगठनों की राजनीति और इनके पुराने बयान निकालकर देखिए. एक समुदाय विशेष के खिलाफ ये किस तरह की बयानबाज़ी करते हैं. नवरात्र पर मीट की दुकानें नहीं खुलने देंगे, हिंदू इलाके में मुस्लिम को दुकान नहीं चलाने देंगे. बांग्लादेश की घटना से इन संगठनों को भी समझना चाहिए कि बहुसंख्यकों बनकर वो जो करते हैं, उनका खामियाजा किसी और को भुगतना पड़ सकता है. अब आते हैं CAA पर कांग्रेस और शिवसेना जैसी विपक्षी पार्टियां पूछ रही हैं कि CAA पर इतना माहौल बनाया था, अब कहां गई. इस पर शिव सेना की नेता प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं -
"जिस तरीके से बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक पर हमले हो रहे हैं और हमारी सरकार चुप है. चार दिन पहले ये बांग्लादेश सरकार की प्रशंसा में लगे थे कि उन्होंने सब काबू में कर लिया. बार-बार CAA का हवाला देने वाले, CAA पर वोट बटोरने वाले, चुनावी हिंदू बनने वाली पार्टी भाजपा कुछ भी अपने मुंह से बोल नहीं रही. उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बांग्लादेश सरकार से कहे कि अल्पसंख्यक पर इस तरह के हमले बंद होने चाहिए."
दिसंबर 2019 में मोदी सरकार ने सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट पास कराया. भारत के तीन पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का ये कानून है. इसमें हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाइयों को शामिल किया गया है. कानून के मुताबिक 31 दिसंबर 2014 तक तीन पड़ोसी देशों से आए 6 समुदायों के लोगों को घुसपैठिए नहीं माना जाएगा. तो ये कानून 12 दिसंबर 2019 को नोटिफाई कर दिया गया था. 10 जनवरी 2020 से कानून लागू हुआ. नोटिफाई करने के बाद 6 महीने के भीतर नागरिकता संशोधन कानून के नए नियम बनाए जाने थे. लेकिन अब तक नहीं बने. सरकार कई बार संसद से एक्सटेंशन मांग चुकी है. पहले डेडलाइन अप्रैल 2021 तक की थी, फिर जुलाई 2021 तक डेडलाइन दी गई. सरकार ने फिर संसद की कमेटी को चिट्ठी लिखी और 9 जनवरी 2022 तक का एक्सटेंशन मांगा है. यानी तेजी सरकार ने कानून पास करने में दिखाई थी, उतनी लागू करने में नहीं रही. इसलिए सीएए पर सवाल उठाना भी लाजिमी हैं. हालांकि जब पड़ोसी देशों में हिंदू अल्पसंख्यों के साथ ज़ुल्म की बात होती है तो अफगानिस्तान के उन हज़ारा अल्पसंख्यकों का भी जिक्र होना चाहिए. जो तालिबान आने के बाद घर छोड़कर भाग रहे हैं, और वो सीएए के दायरे में भी नहीं आते हैं. कुल मिलाकर हर तरफ राजनीतिक फायदों के लिए संप्रदायवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. जिसका नुकसान हम दक्षिण एशिया में देख रहे हैं.

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