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'देश के गद्दारों को, गोली मारों *लों को', इस नारे में दिक्कत क्या है?

क्यों इस तरह के नारे नहीं लगाए जाने चाहिए?

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4 मार्च 2020 (अपडेटेड: 4 मार्च 2020, 05:15 PM IST)
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कोलकाता में हुई अमित शाह की रैली में गोली मारो का नारा लगा था. (रैली की फाइल फोटो-बाएं) हाल फिलहाल में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने पहली बार ये नारा दिल्ली चुनावों के दौरान लगवाया था. (दाएं) फाइल फोटो
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एक विवादित नारा है. 'देश के गद्दारों को, गोली मारो...को'. नारा, जिसमें सीधे गोली मारने की अपील है. कुछ दिनों से ये नारा कई मौकों पर लगाया गया. हाल फिलहाल में ये नारा तब चर्चा में आया, जब केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने इसे चुनावी रैली में लगवाया. दिल्ली चुनाव प्रचार के दौरान. उसके बाद ये नारा कई मौकों पर लगाया गया.

कब-कब लगे ये नारे?

#नई दिल्ली के रिठाला एरिया में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा था, “देश के गद्दारों को…”. भीड़ ने शुरुआत में कुछ नहीं कहा. फिर से अनुराग ठाकुर ने आवाज़ लगाई. भीड़ ने कहा “गोली मारो सालों को”. अनुराग ठाकुर ने कहा कि पीछे तक आवाज़ आनी चाहिए. फिर से लगवाया नारा. भीड़ ने भी जवाब दिया.
# दिल्ली में हिंसा के दौरान 25 फरवरी को एक वीडियो वायरल हुआ. लक्ष्मी नगर के BJP विधायक अभय वर्मा के पैदल मार्च का. उनके पैदल मार्च में गोली मारो का नारा लगा था.
#29 फरवरी, 2020, दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर भीड़ में कुछ लोगों ने ये नारा लगाया. इसके बाद पुलिस ने छह लोगों को हिरासत में ले लिया.
#1 मार्च, 2020: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की कोलकाता रैली में देश के गद्दारों को...वाला नारा लगा था. इस मामले में कोलकाता पुलिस ने तीन बीजेपी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था.
आरोप है कि अमित शाह की रैली के दौरान गोली मारो का नारा लगा. (फोटो-पीटीआई) आरोप है कि अमित शाह की रैली के दौरान गोली मारो का नारा लगा. (फोटो-पीटीआई)

देश के गद्दारों को गोली मारने की बात हो रही है. लेकिन देश का गद्दार है कौन? सुप्रीम कोर्ट के वकील अनस तनवीर कहते हैं,
किसी के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलने और उसे दोषी करार दिए जाने के बाद, एक बार को आप उस व्यक्ति को गद्दार कह सकते हैं. आम बोलचाल की भाषा में. लेकिन ये कोर्ट तय करेगा कि देश का गद्दार कौन है. कानून किसी भी गद्दार को गोली मारने की बात नहीं कहता. और देश कानून और संविधान से चलता है.
CAA यानी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए. अब भी चल रहे हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने सीएए के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे लोगों को लेकर टिप्पणी की थी. कहा था कि उन्हें सिर्फ इसलिए गद्दार और देशद्रोही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे एक कानून का विरोध कर रहे हैं. सीएए की वजह से यह सरकार के खिलाफ सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन होगा.

देश से गद्दारी करने वालों के खिलाफ सजा का क्या प्रावधान है? 

देश से गद्दारी करने वालों के खिलाफ राजद्रोह का केस बनता है. इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) की धारा 124 ए में राजद्रोह की परिभाषा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है, ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है.
देश विरोधी संगठन के खिलाफ अगर कोई अनजाने में भी संबंध रखता है. संगठन का किसी भी तरीके से सहयोग करता है तो उसके खिलाफ भी राजद्रोह का मामला बन सकता है. इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकमत उम्र कैद की सजा का प्रावधान है.
ये धारा अंग्रेजों के जमाने की है. तब अंग्रेज इस कानून का इस्तेमाल उन भारतीयों के खिलाफ करते थे, जो अंग्रेजों की बात मानने से इनकार कर देते थे. ये धारा 1870 में वजूद में आई थी. 1908 में बाल गंगाधर तिलक को उनके लिखे एक लेख की वजह से छह साल की सजा सुनाई गई थी और ये सजा उन्हें इसी कानून के तहत दी गई थी. इसके अलावा अखबार में तीन लेख लिखने की वजह से 1922 में महात्मा गांधी को भी राजद्रोह का आरोपी बनाया गया था. तब से अब तक कानूनों में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन ये धारा बनी हुई है और पिछले कुछ सालों में इस धारा को लेकर खूब विवाद भी रहे हैं.

राजद्रोह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

# 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर टिप्पणी करने भर से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संवैधानिक बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि राजद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्व मौजूद होना चाहिए. महज़ नारेबाजी करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता.
सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में कई फैसले दे चुका है. (सांकेतिक फोटो) सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में कई फैसले दे चुका है. (सांकेतिक फोटो)

# बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में कहा था कि महज़ नारेबाजी करना राजद्रोह नहीं है. दो लोगों ने उस समय खालिस्तान की मांग के पक्ष में नारे लगाए थे. और सुप्रीम कोर्ट ने उसे राजद्रोह मानने से इनकार कर दिया था.

संविधान में गोली मारने का अधिकार किसको है?

किसी को नहीं. हां अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस एनकाउंटर कर सकती है. लेकिन इसके भी कुछ नियम हैं. पुलिस मैनुअल कहता है कि सामने से गोली चले बिना पुलिस फायरिंग नहीं कर सकती है. मतलब कोई आरोपी या दोषी भाग रहा है, तो पुलिसकर्मी उसे पकड़ने के लिए भाग सकते हैं. गाड़ी, बाइक या जहाज, जो मुनासिब हो, उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन जब तक सामने से गोली नहीं चलती है, या जानलेवा हमला नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस गोली नहीं चला सकती है. गोली चलाकर घायल करना और गोली चलाकर मार देना, ये दो अलग-अलग बातें हैं. पुलिस द्वारा गोली घायल करने, निहत्था करने, हथियार छीनने या रफ़्तार धीमी करने की नीयत से चलाई जाती है. लेकिन अगर पुलिस की गोली से आरोपी या दोषी की मौत होती है, तो वो केवल आत्मरक्षा के लिए ही किया सकता है.
भारत का संविधान. भारत का संविधान.

एनकाउंटर में मौत को लेकर कोर्ट ने कुछ ज़रूरी बातें कही हैं. 1999 में सामाजिक संस्था ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़’ (PUCL) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका में साल 1995-97 के दौरान मुंबई पुलिस द्वारा अंजाम दिए गए 99 मुठभेड़ों पर सवाल उठाए गए थे. इन कथित मुठभेड़ों में 135 लोगों की मौत हुई थी. साल 2014 में आदेश आया. जस्टिस R M लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने 16 बिंदुओं का दिशानिर्देश जारी किया. कहा कि अगर पुलिस मुठभेड़ में मौत होती है, तो FIR दर्ज की जानी चाहिए. मजिस्ट्रेट जांच, मेडिकल जांच, केस की एक अलग CID टीम से जांच करवाए जाने के साथ-साथ मृत व्यक्ति के वारिस को उचित मुआवज़ा दिया जाना चाहिए.
मार्च 1997. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC). इस बरस NHRC के तत्कालीन चेयरमैन थे जस्टिस M N वेंकटचलिया. उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को खत लिखा. कहा कि बहुत सारे राज्यों से झूठी मुठभेड़ों की शिकायतें मिल रही हैं. जस्टिस वेंकटचलिया ने लिखा कि अगर पुलिसकर्मी की गोली से कोई मारा जाता है, तो पुलिस वाले पर सजायोग्य हत्या यानी Culpable Homicide का केस दर्ज किया जाना चाहिए. ऐसा इसलिए कि पुलिस के पास किसी भी व्यक्ति की जान लेने का कोई अधिकार नहीं है. जान ली, तो पुलिसवाले पर केस दर्ज़ करके मामले की तहकीकात की जाएगी. इस बात की जांच होगी कि पुलिसकर्मी द्वारा की गई कार्रवाई क़ानून के दायरे में है कि नहीं.

इस नारे से दिक्कत क्या है?.

इस नारे में हिंसा है. किसी को भी खुलेआम गोली मारने की बात कैसे कही जा सकती है? खुलेआम ऐसी बात कहना किसी को भड़काना है. दिल्ली हिंसा के बाद इस तरह के नारे लगना तो और भी खतरनाक है. वो किसी नेता की रैली में लगें हो या पैदल मार्च में. देश संविधान से चलता है. कानून से चलता है. और कानून एक तय प्रकिया के तहत किसी को सजा देता है. अगर किसी ने देश से गद्दारी की भी तो उसे सजा देने का काम कानून का है न कि भीड़ का.


अमित शाह की बंगाल में हुई प्रो-CAA रैली में भीड़ ने 'गोली मारो'' वाला नारा लगाया

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